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Bihar Assembly Elections 2025: बिहार की राजनीति में महिला वोटर, सशक्तिकरण, विभाजन और निर्णायक भूमिका
Bihar Assembly Elections 2025: बिहार की महिला मतदाता अब सिर्फ वोट बैंक नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति की निर्णायक शक्ति बन चुकी हैं।
Bihar Assembly Elections 2025 Women Voters 2025 Political Trend and Impact
बिहार की राजनीतिक फिज़ा में एक गहरा बदलाव दिख रहा है, और इस बदलाव की सबसे बड़ी वाहक हैं राज्य की महिला मतदाता। पुरुषों से अधिक संख्या में वोट डालने वाली बिहार की महिलाएं अब सिर्फ एक 'वोट बैंक' नहीं, बल्कि एक 'निर्णायक शक्ति' बन चुकी हैं। यह रिपोर्ट बिहार की महिला मतदाता के मन, मुद्दों और राजनीतिक समीकरणों को गहराई से समझने का प्रयास है।
महिला वोटरों की संख्या और बुनियादी विभाजन
2023 के अंत तक के निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, बिहार में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 7.6 करोड़ है। इनमें लगभग 3.9 करोड़ पुरुष और लगभग 3.7 करोड़ महिला मतदाता हैं। हालांकि संख्या में थोड़ा अंतर है, लेकिन पिछले कई चुनावों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों के बराबर या कई बार उनसे अधिक रहा है। यह स्पष्ट संकेत है कि महिलाएं मतदान केंद्रों पर अधिक संख्या में पहुंच रही हैं।
क्या महिला वोटरों में विभाजन है?
हां, बिल्कुल है। लेकिन यह विभाजन एकसार नहीं है। यह सामाजिक-आर्थिक, शैक्षणिक और क्षेत्रीय स्तर पर देखने को मिलता है।
· शहरी बनाम ग्रामीण विभाजन: शहरी, शिक्षित महिलाएं रोजगार, शिक्षा और सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देती हैं, जबकि ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार गारंटी (मनरेगा), राशन, बिजली, सड़क और स्वास्थ्य सुविधाएं बड़े मुद्दे हैं।
· शैक्षणिक विभाजन: पढ़ी-लिखी महिलाएं राजनीतिक दलों के घोषणापत्र और विकास के वादों को जांच-परखकर वोट देती हैं, जबकि कम पढ़ी-लिखी महिलाएं अक्सर परिवार और समुदाय के प्रभाव में वोट करती हैं, हालांकि यह प्रवृत्ति तेजी से बदल रही है।
क्या महिला वोटरों में जातीय विभाजन हैं?
यह सबसे जटिल सवाल है। सतही तौर पर हां, लेकिन गहराई में जाएं तो यह विभाजन धूमिल पड़ रहा है।
बिहार की राजनीति जाति के इर्द-गिर्द घूमती है, और महिलाओं के वोटिंग पैटर्न पर भी इसका असर है। एक सामान्य प्रवृत्ति यह देखने को मिलती है कि महिलाएं भी अक्सर उसी जाति के उम्मीदवार को वोट देती हैं, जिसे उनके पति, पिता या परिवार का पुरुष तबका समर्थन कर रहा होता है। EBC, SC/ST और अति पिछड़ी जातियों की महिलाएं अक्सर नीतीश कुमार के 'समता' और 'अल्पसंख्यक-पिछड़ा गठजोड़' के प्रति आकर्षित दिखती हैं, जबकि ऊंची जातियों (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण) की महिलाओं में भाजपा के प्रति समर्थन अधिक देखा गया है। यादव और मुस्लिम महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के साथ जुड़ा हुआ है।
हालांकि, एक नया और महत्वपूर्ण ट्रेंड उभर रहा है। महिलाओं के एक बड़े वर्ग में अब ‘जाति से ऊपर उठकर सोचने’ की प्रवृत्ति देखी जा रही है। सीता देवी, एक 45 वर्षीय मनरेगा मजदूर पटना के निकट एक गांव में कहती हैं, "हमारे लिए तो रोज का राशन, बच्चों की पढ़ाई और शराब से छुटकारा ही बड़ा मुद्दा है। जाति-पाति से क्या फर्क पड़ता है? जो हमारा काम करे, उसे ही वोट देंगे।"
यह 'विकास' और 'सुरक्षा' का मुद्दा अब जातीय समीकरणों को काट रहा है। शराबबंदी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
नीतीश की शराबबंदी का महिला वोटरों पर सीधा असर
2016 में लागू की गई शराबबंदी नीतीश कुमार की सबसे बड़ी और सबसे साहसिक राजनीतिक पहलों में से एक रही है, और इसका सबसे सीधा और सकारात्मक असर महिलाओं पर पड़ा है।
ग्राउंड रिपोर्ट: गांव-गांव जाएं तो महिलाओं से बात करने पर एक स्वर सुनाई देता है - "शराबबंदी ने हमारा जीवन बदल दिया।"
· घरेलू हिंसा में कमी: शराबबंदी से पहले पुरुषों की शराब की लत के कारण घरों में हिंसा, मारपीट और आर्थिक तंगी एक आम समस्या थी। मंजू कुमारी, मुजफ्फरपुर की एक युवा महिला कहती हैं, "पहले पति की तनख्वाह शराब में उड़ जाती थी। घर का खर्च चलाना मुश्किल होता था। अब पैसा बचता है, बच्चों को पढ़ा रहे हैं। घर में शांति है।"
· आर्थिक सशक्तिकरण: शराब पर खर्च होने वाला पैसा अब घर के खर्च, बच्चों की शिक्षा और महिलाओं की बचत में इस्तेमाल हो रहा है। इससे महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है।
· सुरक्षा की भावना: शराब के नशे में सार्वजनिक स्थानों पर होने वाली उत्पाती घटनाओं में कमी आई है, जिससे महिलाओं को बाहर निकलने में अधिक सुरक्षा महसूस होती है।
हालांकि, इस नीति की आलोचना भी होती है। विपक्षी दल इसे 'विफल' बताते हैं और कहते हैं कि इससे शराब का अवैध धंधा फल-फूल रहा है और गरीबों को सजा मिल रही है। लेकिन महिला वोटर्स के एक बड़े sections में यह नीतीश कुमार के प्रति एक गहरी कृतज्ञता पैदा करती है, जो सीधे तौर पर वोट में तब्दील होती है।
महिलाओं के बीच मुख्य मुद्दे और दलों की घोषणाएं
महिलाएं अब सिर्फ 'राशन' और 'बिजली' तक सीमित नहीं हैं। उनके एजेंडे में व्यापकता आई है।
प्रमुख मुद्दे:
1. सुरक्षा: घरेलू हिंसा से लेकर बलात्कार और छेड़छाड़ तक, सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा है।
2. शिक्षा और रोजगार: बेटियों की उच्च शिक्षा और स्वयं के लिए रोजगार के अवसर चाहती हैं।
3. स्वास्थ्य सुविधाएं: प्रसव के दौरान अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं, संस्थागत डिलीवरी और कुपोषण से मुक्ति।
4. आर्थिक स्वावलंबन: स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के माध्यम से आय के स्रोत, जेबखर्च के लिए पैसा।
दलों की घोषणाएं और उनका असर:
· जेडी(यू) + भाजपा गठबंधन: इस गठबंधन ने महिला सशक्तिकरण को केंद्र में रखा है।
· घोषणाएं: 50 फ़ीसदी महिला आरक्षण (पंचायत से विधानसभा तक) का वादा, स्वयं सहायता समूहों को और मजबूत करना, 'मुख्यमंत्री बालिका प्रोत्साहन योजना' जैसी योजनाओं का विस्तार, और शराबबंदी को जारी रखना।
· असर: इन योजनाओं का लाभ सीधे तौर पर ग्रामीण और गरीब महिलाओं को मिल रहा है, जिससे उनमें एक 'लाभार्थी वोट बैंक' तैयार हुआ है।
· राजद + कांग्रेस गठबंधन: यह गठबंधन सरकार पर महिलाओं के लिए किए गए 'अपर्याप्त' काम का आरोप लगाता है।
· घोषणाएं: बेरोजगारी भत्ता, महिलाओं के लिए 33 फ़ीसदी सरकारी नौकरियों में आरक्षण, शिक्षा और स्वास्थ्य पर अधिक खर्च, और लैंगिक न्याय की बात करता है।
· असर: शहरी और युवा महिलाओं में इन वादों की गूंज अधिक है, खासकर रोजगार के मुद्दे पर।
प्रमुख महिला नेता और उनकी भूमिका
बिहार की राजनीति में कुछ महिला नेता अपनी अलग पहचान रखती हैं।
1. राबड़ी देवी (RJD): पूर्व मुख्यमंत्री और RJD प्रमुख लालू प्रसाद यादव की पत्नी। उनकी पृष्ठभूमि एक गृहिणी की रही है, लेकिन वह RJD के Yadav-Muslim core vote bank में अत्यधिक लोकप्रिय हैं। उनकी उपस्थिति पार्टी के परिवारवाद और 'लालू परिवार' के प्रति वफादारी को दर्शाती है।
2. मीसा भारती (RJD): लालू प्रसाद यादव की बेटी और सांसद। वह RJD की एक मुखर चेहरा हैं और महिलाओं के मुद्दों, खासकर दलित और पिछड़ी महिलाओं के हक की लड़ाई लड़ती हैं। उनकी पृष्ठभूमि एक राजनीतिक परिवार से आने की है, जिसने उन्हें जनाधार दिया है।
3. नीतीश कुमार की बहू (जेडी(यू)): जेडी(यू) अध्यक्ष और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे की पत्नी, वह पार्टी में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। हालांकि उनका राजनीतिक अनुभव कम है, लेकिन वह पार्टी के भीतर एक नए चेहरे के रूप में उभरी हैं और महिला कार्यक्रमों में सक्रिय हैं।
4. सुषमा सिंह (भाजपा): एक वरिष्ठ भाजपा नेता और विधायक। उनकी पृष्ठभूमि एक सामाजिक कार्यकर्ता और जमीनी नेता की है। वह पार्टी के भीतर एक मजबूत आवाज मानी जाती हैं और OBC वर्ग में उनकी अच्छी पकड़ है।
इन नेताओं का असर: ये नेत्रियां अपने-अपने दलों के जनाधार को मजबूत करती हैं, महिला मतदाताओं तक पहुंचने का काम करती हैं और पार्टी के एजेंडे को आगे बढ़ाती हैं। हालांकि, अभी भी उनकी भूमिका पार्टी के शीर्ष पुरुष नेतृत्व के समक्ष सीमित ही है।
टिकट का वितरण और महिला उम्मीदवारों की स्थिति
चुनावों में महिलाओं को टिकट देने के मामले में बिहार के दल अभी भी पीछे हैं। 2020 के विधानसभा चुनाव में कुल 243 सीटों में से महिलाओं को मिले टिकटों की संख्या लगभग 10% (24-26) के आसपास थी। भाजपा, जेडी(यू), RJD सभी ने लगभग 10-12 महिला उम्मीदवार उतारे थे।
इन महिला उम्मीदवारों की स्थिति मिश्रित रहती है। कुछ 'पारिवारिक विरासत' वाली सीटों पर लड़ती हैं, जहां उनके पति या पिता का दबदबा होता है। कुछ ऐसी सीटों पर टिकट पाती हैं जहां पार्टी की जीत की संभावना कम होती है। लेकिन कुछ मजबूत महिला नेता ऐसी भी हैं जो अपनी मेहनत और जनाधार के बल पर जीतती हैं, जैसे कि भाजपा की सुषमा सिंह।
इस बार महिला वोटरों का ट्रेंड और भविष्य का अनुमान
वर्तमान ट्रेंड: 2024 के लोकसभा चुनाव और भविष्य के विधानसभा चुनावों में महिला वोटरों का ट्रेंड कुछ इस प्रकार दिख रहा है:
1. सशक्तिकरण से जुड़ाव: महिलाएं उन्हीं दलों और नेताओं के साथ जुड़ाव महसूस कर रही हैं जो उन्हें सशक्त बना रहे हैं, चाहे वह शराबबंदी के जरिए हो या आर्थिक योजनाओं के माध्यम से।
2. जाति से ऊपर उठकर वोट: एक बड़ा वर्ग अब विकास और सुरक्षा के मुद्दे पर जातीय समीकरणों को नजरअंदाज कर रहा है।
3. युवा महिलाओं का उभार: शिक्षित युवा महिलाएं रोजगार और करियर के अवसरों को लेकर अधिक जागरूक और मुखर हैं।
भविष्य के चुनावों में दलवार अनुमान:
· जेडी(यू)+भाजपा गठबंधन: महिला वोटों का एक बड़ा हिस्सा, खासकर ग्रामीण और EBC/SC वर्ग की महिलाओं का समर्थन इस गठबंधन के पक्ष में रहने की संभावना है। शराबबंदी और स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी योजनाएं इसकी वजह हैं।
· राजद+कांग्रेस गठबंधन: यह गठबंधन यादव और मुस्लिम महिलाओं के बीच अपना मजबूत जनाधार बनाए रखेगा। साथ ही, बेरोजगारी और रोजगार के मुद्दे पर यह युवा महिलाओं का एक हिस्सा अपनी ओर खींच सकता है।
· अन्य दल: छोटे दल और वाम दल शहरी, शिक्षित महिलाओं के एक छोटे से section को आकर्षित कर सकते हैं।
निष्कर्ष: बिहार की महिला मतदाता अब राजनीतिक फैसलों की सबसे बड़ी धुरी बन चुकी हैं। वह पारंपरिक जातिगत लकीरों को पार करते हुए, अपने और अपने परिवार के बेहतर भविष्य के लिए वोट कर रही हैं। जो दल इस बदलाव को समझेगा और महिलाओं के वास्तविक मुद्दों पर केंद्रित अपनी नीतियां बनाएगा, उसके लिए बिहार की सत्ता का रास्ता आसान होगा। आने वाला समय बिहार की 'नारी शक्ति' का समय है।


