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NOTA का उदय: 26 सीटों पर हार-जीत से बड़ा जन-आक्रोश
Bihar Election 2025 में 26 सीटों पर NOTA ने हार-जीत के अंतर को पार किया। बढ़ता जन-आक्रोश, उम्मीदवार चयन पर जनता की नाराजगी और राजनीतिक बदलाव के संकेत।
Bihar Election 2025: बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में इस बार एक ऐसी ख़ामोश गूँज सुनाई दी, जिसका शोर किसी रैली की भीड़ से कहीं अधिक तीक्ष्ण था। यह गूँज थी—NOTA की। वह बटन जिसे दबाने का मतलब होता है—“हम सब देख रहे हैं, पर किसी पर भरोसा नहीं है। इस चुनाव में 26 विधानसभा सीटों पर यह गूँज इतनी तीव्र हो गई कि उसने सीधे-सीधे उम्मीदवारों की हार-जीत के अंतर को पार कर लिया। यानी जीत या हार किसी उम्मीदवार की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की उस बेचैनी की थी जो वर्षों से अनसुनी रह गई है। सबसे तीखी तस्वीर कल्याणपुर की रही, जहाँ NOTA ने 8634 वोट बटोरे। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस जनता की सामूहिक घोषणा है जो कह रही है,“हमने विकल्प खोजे, पर हमें कोई विकल्प नहीं मिला।”
चुनाव का नया भूगोल: जहाँ NOTA निर्णायक बना
इन 26 सीटों का भूगोल दिलचस्प है, यह वे क्षेत्र हैं जहाँ चुनावी संघर्ष कड़ा था, वोटों का अंतर मामूली था, और जनता का असंतोष भारी। वारिसनगर, पुपरी, संग्रामपुर, सोनपुर, हसनपुर, जाले, मानसी, कटोरिया, जमुई, जहानाबाद, चेनारी, सूची लंबी है और हर नाम अपने भीतर वही प्रश्न छिपाए है, “जब जनता हजारों वोट NOTA को देती है और हार-जीत कुछ सौ वोटों से तय होती है, तब किसे विजेता माना जाए?”
कई सीटों पर तो हार-जीत का अंतर सिर्फ 150–200 वोट रहा, जबकि NOTA के मत 3000 से 8000 तक पहुँच गए। यह वह क्षण है जब लोकतांत्रिक आँकड़े चुपचाप संकेत देते है, “परिणाम भले जो भी हो, जनमत किसी और दिशा में है।”
तीन चुनाव, एक प्रवृत्ति: असंतोष स्थायी हो चुका है
यह पहली बार नहीं है। 2015, 2020 और अब—तीनों चुनाव एक ही कहानी कह रहे हैं।
2015 – NOTA का विस्फोट
• कुल NOTA वोट: 9,47,279
• 7959 ऐसे वोट, जो कई सीटों का परिणाम बदल सकते थे।
2020 – मौन विरोध की निरंतरता
• कुल NOTA वोट: 7,06,293
• लगभग हर जिले में NOTA ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
और आज 2025 में भी कहानी वही है—
जनता का असंतोष न तो कम हुआ है, न ही कोई दल उसे समझ पाने में सक्षम हुआ है।
आखिर यह संकेत किसके लिए है?
राजनीतिक दलों के लिए यह चेतावनी है कि उम्मीदवार चयन, राजनीति का चरित्र और जनता से संवाद—तीनों पर गंभीर पुनर्विचार की आवश्यकता है।
क्योंकि:
• जब जनता NOTA को चुनती है, वह अनिच्छा का नहीं, बल्कि प्रतिरोध का अधिकार इस्तेमाल करती है।
• जब 26 सीटों पर NOTA हार-जीत के अंतर को पार कर जाता है, तो असल सवाल जीतने वाले का नहीं, बल्कि लोकतंत्र में घटते विश्वास का हो जाता है।
• और जब तीन चुनावों में लगातार NOTA की भूमिका निर्णायक हो जाए, तो यह मान लेना चाहिए कि जनता अब सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि समीक्षक बन चुकी है। बिहार के राजनीतिक दलों के लिए यह समय है अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करने का, क्योंकि जनता ने बहुत स्पष्ट कह दिया है,“अगर आप हमें विकल्प नहीं देंगे, तो हम अपना विकल्प बना लेंगे… और उसका नाम है,NOTA।


