जिसके दोनों पैर काट दिए गए, जो जिंदा न रहे, यही चाहा था दुश्मनों ने… आज वो राज्यसभा में बन गया देश की आवाज़

Sadanandan master joins rajya sabha: अपने दोनों पैर गंवाने के बाद भी हार न मानने वाले सदानंदन मास्टर अब राज्यसभा में देश की आवाज़ बने। पढ़ें साहस, संघर्ष और प्रेरणा की कहानी।

Harsh Srivastava
Published on: 13 July 2025 3:47 PM IST (Updated on: 13 July 2025 7:59 PM IST)
जिसके दोनों पैर काट दिए गए, जो जिंदा न रहे, यही चाहा था दुश्मनों ने… आज वो राज्यसभा में बन गया देश की आवाज़
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Sadanandan master joins Rajya Sabha: यह कहानी है एक ऐसे इंसान की, जिसने मौत को बहुत करीब से देखा, जिसने अपने सपनों को बेरहमी से कुचले जाते देखा, जिसने अपने ही घर में जश्न के माहौल को एक ही पल में मातम में बदलते देखा। लेकिन, यह कहानी सिर्फ दुख और दर्द की नहीं है। यह कहानी है उस अदम्य साहस की, उस अटूट इच्छाशक्ति की, जिसने शारीरिक विकलांगता को अपनी सोच पर कभी हावी नहीं होने दिया। यह कहानी है एक ऐसे योद्धा की, जिसने अपने जीवन के सबसे काले दिन में अपने दोनों पैर खो दिए, लेकिन फिर भी समाज सेवा का रास्ता नहीं छोड़ा। आज, जब पूरा देश इस शख्स की अविश्वसनीय यात्रा की तारीफ कर रहा है, तो हर कोई हैरान है कि आखिर कोई इतनी क्रूरता का शिकार होने के बाद भी कैसे इतनी ऊँचाइयों तक पहुँच सकता है? आखिर कौन है ये शख्स, जिसके जीवन की घटनाएँ किसी थ्रिलर फ़िल्म की स्क्रिप्ट से कम नहीं लगतीं? जानने के लिए पढ़िए यह दिल दहला देने वाली कहानी और जानिए कैसे एक साधारण शिक्षक ने राजनीति के सबसे बड़े मंच, राज्यसभा तक का सफ़र तय किया।

जश्न के माहौल में फैला मातम

साल 1994, जनवरी का महीना। केरल के कन्नूर जिले में एक घर खुशियों से गुलज़ार था। घर की बेटी की शादी तय हो चुकी थी और चारों तरफ बस जश्न का माहौल था। सदानंदन, जो उस वक़्त महज़ 30 साल के थे, अपनी बहन की शादी का कार्ड देने के लिए निकले थे। शाम ढल रही थी और वो शादी का न्योता देकर वापस अपने घर लौट रहे थे। गाड़ी से उतरकर वो जैसे ही घर की तरफ़ बढ़े, तभी अंधेरे में घात लगाकर बैठे कुछ लोगों ने उन पर अचानक हमला कर दिया। घर के अंदर उनकी बहन की सगाई की तैयारियाँ ज़ोरों पर थीं, जिसे 6 फरवरी को होना था। लेकिन घर के बाहर, इंसानियत की सारी हदें पार हो रही थीं। हमलावर कोई और नहीं, बल्कि सीपीआई-एम के कार्यकर्ता थे। उन्होंने सदानंदन को बुरी तरह घसीटा, और फिर जो किया वो सुनकर किसी की भी रूह काँप जाए। उन्होंने हंसिया और तलवारों से सदानंदन के दोनों पैर बेरहमी से काट दिए। और हैरानी की बात ये थी कि इतना करने पर भी उनका मन नहीं भरा। उन्होंने कटे हुए पैरों को सड़क पर रगड़ा, ताकि किसी भी तरह से सर्जरी या दोबारा उन्हें जोड़ा न जा सके। मानो वो उन्हें सिर्फ अपंग नहीं, बल्कि हमेशा के लिए बेबस बना देना चाहते थे। इस घटना ने एक पल में उस परिवार की खुशियों को मातम में बदल दिया।

जिस पार्टी से था खून का रिश्ता, उसी ने काटे पैर

यह हमला और भी चौंकाने वाला इसलिए था, क्योंकि सदानंदन का परिवार दशकों से कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ा हुआ था। उनके घर के ज़्यादातर सदस्य इसी विचारधारा से प्रभावित थे। लेकिन, कुछ समय पहले, सदानंदन का सीपीआई-एम के कुछ नेताओं से मतभेद हो गया था। यह मतभेद इतना बढ़ा कि उन्होंने इस पार्टी से अलग होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की विचारधारा को अपना लिया। मट्टानूर, जिसे सीपीआई-एम का गढ़ माना जाता था, वहाँ सदानंदन ने एक आरएसएस कार्यालय की स्थापना कर दी। यह बात पार्टी के नेताओं को बिल्कुल रास नहीं आई। उन्हें शायद ये लग रहा था कि उनका अपना ही एक सदस्य उनकी पार्टी के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल रहा है। इसी के बदले के रूप में, उन्होंने सदानंदन पर 25 जनवरी, 1994 को वो भयानक हमला करवाया। यह एक राजनीतिक विद्वेष का सबसे क्रूर और जघन्य उदाहरण था, जहाँ विचारधारा के लिए एक इंसान को ज़िन्दगी भर के लिए अपाहिज बना दिया गया।

संघर्षों से हार नहीं मानी, और शिक्षा को बनाया हथियार

जिस दिन यह हमला हुआ, उसी दिन से सदानंदन की परीक्षा शुरू हो गई। उनके पास दो ही रास्ते थे। या तो वो अपनी शारीरिक विकलांगता को स्वीकार करके हार मान लें, या फिर इससे लड़कर अपने आप को और मज़बूत बनाएँ। उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। उन्होंने हिम्मत जुटाई, कृत्रिम पैर लगवाए और एक बार फिर ज़िन्दगी की दौड़ में शामिल हो गए। सदानंदन ने कभी अपने दुख को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उनका मानना था कि उनके पैरों को भले ही काटा जा सकता है, लेकिन उनकी सोच को कोई नहीं रोक सकता। इसी सोच के साथ उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक शिक्षक के रूप में की। साल 1999 में, उन्हें त्रिशूर जिले के पैरामंगलम में एक माध्यमिक विद्यालय में सामाजिक विज्ञान के शिक्षक के रूप में नौकरी मिली। अगले 25 साल तक, उन्होंने अपनी पूरी लगन और मेहनत से छात्रों को पढ़ाया। उनके लिए शिक्षा सिर्फ़ ज्ञान बाँटने का ज़रिया नहीं थी, बल्कि यह युवाओं को सशक्त बनाने का एक माध्यम था। उन्होंने अपने जीवन से यह सबक सीखा था कि सिर्फ ज्ञान ही एक ऐसा हथियार है, जो आपको हर मुश्किल से लड़ने की ताकत देता है। 2020 में वो शिक्षक के पद से रिटायर हो गए, लेकिन उनका जीवन का संघर्ष अभी भी जारी था।

राजनीति में बढ़ाया कदम, और मिला बड़ा सम्मान

शिक्षक की नौकरी से रिटायर होने के बाद, सदानंदन मास्टर पूरी तरह से राजनीति और सामाजिक कार्यों में सक्रिय हो गए। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने उनके साहस और लगन को पहचाना और उन्हें 2021 में विधानसभा चुनाव का उम्मीदवार बनाया। इससे पहले उन्होंने 2016 में भी बीजेपी के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था। भले ही उन्हें चुनावी जीत नहीं मिली, लेकिन उनकी मेहनत और लोगों के प्रति उनकी निष्ठा कम नहीं हुई। और फिर आया एक और गौरवशाली पल। हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राज्यसभा के लिए 4 सदस्यों को मनोनीत किया। इन सदस्यों में प्रख्यात वकील उज्जवल निकम, पूर्व विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला, शिक्षाविद मीनाक्षी जैन के साथ-साथ, सी. सदानंदन मास्टर का नाम भी शामिल था।

जब उन्हें इस सम्मान के बारे में पता चला तो उन्होंने इसे अपने लिए गौरव का क्षण बताया। सदानंदन ने कहा, "यह मेरे लिए गर्व का क्षण है क्योंकि पार्टी ने मुझ पर भरोसा दिखाया और इस काबिल समझा।" उन्होंने यह भी कहा कि वह विकसित केरल और विकसित भारत के नारे को बुलंद करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। उन्होंने राजनीतिक विरोधियों द्वारा किए गए अत्याचारों को याद करते हुए कहा कि उनके जीवन का मकसद पार्टी के उन कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास बढ़ाना है, जिन्होंने केरल में पार्टी के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने की जमकर तारीफ़

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सदानंदन मास्टर के संघर्ष और उनकी असाधारण यात्रा की सराहना करते हुए कहा कि उनका जीवन "साहस और अन्याय के आगे न झुकने की भावना का प्रतीक" है। मोदी ने कहा कि हिंसा और धमकी "राष्ट्र के विकास के प्रति उनके जज़्बे को रोक नहीं सकी।" प्रधानमंत्री ने उन्हें युवा सशक्तिकरण में उनकी गहरी आस्था के लिए भी सराहा। सदानंदन मास्टर का जीवन हम सभी के लिए एक प्रेरणा है। यह हमें सिखाता है कि कितनी भी बड़ी मुश्किल क्यों न आ जाए, हमें हार नहीं माननी चाहिए। एक साधारण शिक्षक से लेकर राज्यसभा के सदस्य तक का उनका सफ़र यह साबित करता है कि सच्ची हिम्मत और लगन से कुछ भी हासिल किया जा सकता है। उनकी कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि जीवन में सिर्फ जीत ही नहीं, बल्कि संघर्षों से सीखने की क्षमता भी मायने रखती है।

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Harsh Srivastava

Harsh Srivastava

Content Writer Mail ID - harshsri764@gmail.com

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