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Bihar Elections: बिहार चुनाव में 'जीविका योजना' का रंग, महिलाओं की ताकत बनी नई वोट बैंक की पहचान
Jeevika Scheme in Bihar Elections: बिहार चुनावों में इस बार महिलाओं की भूमिका सबसे अहम हो चली है। जीविका योजना के ज़रिए आत्मनिर्भर बनी महिलाएं अब नई वोट बैंक की पहचान बन रही हैं।
Jeevika Scheme in Bihar Elections
बिहार: चुनावी माहौल में डूबे बिहार की हवाएं अब नई इबारत गढ़ रहीं हैं। यहां गांव की पगडंडियों से लेकर गलियों में इन दिनों सिर्फ राजनीतिक नारों की गूंज नहीं, बल्कि महिलाओं की आत्मनिर्भरता की गूंज भी सुनाई दे रही हैं। पुरुषों की कमाई पर निर्भर रहने वाली महिलाएं अब हनक के साथ कहती नजर आ रहीं है कि, 'अब हम किसी पर निर्भर नहीं, अपना कमाते हैं और अपने फैसले खुद लेते हैं'। यह आत्मविश्वास मौजूदा समय में बिहार की लाखों महिलाओं के चेहरों पर झलकता देखा जा सकता है।
दरअसल, सरकार की जीविका योजना अब सिर्फ ग्रामीण विकास का प्रतीक नहीं रही, बल्कि मौजूदा चुनावों में यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनकर उभर रही है। जिन महिलाओं ने इस योजना के ज़रिए आर्थिक ताकत पाई है, वे अब मतदान में भी अपनी भूमिका और ताकत को समझने लगी हैं। यही वजह है कि, ग्रामीण इलाक़ों में आधी आबादी के बीच यह चर्चा आम हो चली है कि, 'जीविका ने हमें पहचान दी, अब हमारी आवाज़ भी सुनी जाती है।' इस बदली बयार को भांपते हुए अब चुनावों में राजनीतिक दल भी इस महिला शक्ति को नज़रअंदाज़ नहीं कर पा रहे। हर पार्टी अपने वादों में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और जीविका जैसी योजनाओं के विस्तार की बात कर रही है। यानी इस बार चुनावी समीकरणों में जीविका सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि एक नया ‘सशक्त वोट बैंक’ बनकर उभर रही है। आइए जानते हैं क्या है जीविका योजना?
क्या है जीविका योजना और कैसे करती है काम
जीविका बिहार सरकार की एक महत्वाकांक्षी ग्रामीण विकास योजना है, जिसे विश्व बैंक का भी सहयोग मिला है। इसका उद्देश्य है गांव की महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना। इस योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं मिलकर स्वयं सहायता समूह (सेल्फ हेल्प ग्रुप) बनाती हैं, जिनमें लगभग 10 से 15 सदस्य होते हैं।
ये महिलाएं हर महीने थोड़ी-थोड़ी बचत करती हैं और ज़रूरत पड़ने पर एक-दूसरे को कम ब्याज पर ऋण देती हैं। यह व्यवस्था न केवल उनकी बचत की आदत बढ़ाती है, बल्कि उन्हें बैंकों और सरकारी योजनाओं से सीधे जोड़ती है। इसी के माध्यम से कई महिलाएं अपने छोटे व्यापार जैसे, सिलाई, बुनाई, पापड़ या अचार बनाना, मुर्गी पालन या खेती से जुड़े काम शुरू कर चुकी हैं।
अब तक कितनी महिलाओं को मिल रहा है लाभ
आज बिहार के लगभग हर ज़िले में जीविका योजना का असर फलीभूत होते देखा जा रहा है। आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार, अब तक 10 लाख से ज़्यादा महिला समूह बनाए जा चुके हैं, जिनसे करीब 1.2 करोड़ ग्रामीण परिवार जुड़े हैं।
इन महिलाओं को न सिर्फ बचत करने का मौका मिला है, बल्कि वे अब बैंक से ऋण लेकर अपने छोटे-छोटे व्यापार चला रही हैं। पहले जहां महिलाओं की आमदनी लगभग शून्य थी, वहीं अब कई महिलाओं की मासिक आय 8 हज़ार से 15 हज़ार रुपये तक पहुंच चुकी है। कुछ ज़िलों जैसे गया, नालंदा, मुज़फ्फरपुर और मधुबनी में तो महिला समूहों ने मिलकर सामूहिक उत्पादन केंद्र भी शुरू किए हैं।
योजना से महिलाओं की ज़िंदगी में आए बड़े बदलाव
जीविका ने महिलाओं को आर्थिक रूप से मज़बूत करने के साथ-साथ उनके आत्मविश्वास में भी बड़ा बदलाव लाया है। पहले जहां बिहार ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं घर के कामों तक सीमित थीं, अब वे गांव की आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा बन चुकी हैं। वे बैंक जाती हैं, अपने पैसे का हिसाब रखती हैं और ज़रूरत पड़ने पर ऋण लेकर काम बढ़ाती हैं। इससे उन्हें अपने परिवार के खर्च में योगदान देने का गर्व महसूस होता है।
साथ ही अब महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाते हुए गांव की बैठकों में अपनी राय रखती हैं, पंचायत स्तर पर फैसलों में शामिल होती हैं और कई जगहों पर समूह की अध्यक्ष या सचिव जैसी ज़िम्मेदारियां निभा रही हैं। इस योजना ने उन्हें मजबूरी और लाचारी से सुरक्षित कर आत्मविश्वास के साथ समाज में नई पहचान दी है।
रोज़गार और हुनर ने बढ़ाया इनका आत्मविश्वास
जीविका न केवल महिलाओं को पैसे कमाने का अवसर देती है, बल्कि उन्हें नए हुनर सिखाने की ट्रेनिंग भी देती है। महिलाओं को सिलाई-कढ़ाई, ब्यूटी पार्लर, डेयरी, बकरी पालन, फूड प्रोसेसिंग और डिजिटल लेन-देन जैसी ट्रेनिंग दी जाती है।इन प्रशिक्षणों से महिलाएं न सिर्फ काम सीखती हैं बल्कि अपने बनाए हुए सामान को बाज़ार तक पहुंचाने का तरीका भी जानती हैं। सरकार इन समूहों को बाज़ार से जोड़ने की कोशिश कर रही है ताकि उनका बना हुआ सामान आसानी से बिक सके। इस तरह महिलाएं अब आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी दोनों बन रही हैं।
संकट की घड़ी में सहारा बन चुकी है 'जीविका'
जीविका की सबसे बड़ी ताकत है साथ मिलकर आगे बढ़ना। अगर किसी महिला को अचानक पैसों की ज़रूरत होती है, तो उसे बाहर से महंगे ब्याज पर कर्ज नहीं लेना पड़ता। उसका अपना समूह उसकी मदद करता है। यह व्यवस्था महिलाओं को साहूकारों के चंगुल से बचाती है और उन्हें आर्थिक सुरक्षा का अहसास कराती है। इन समूहों में एक-दूसरे के प्रति विश्वास और सहयोग की भावना बढ़ती जा रही है। यही वजह है कि यह अब ग्रामीण समाज में महिला एकजुटता की मिसाल बन रही है।
क्यों बढ़ रहा है महिलाओं का जीविका पर भरोसा
महिलाओं के बीच इस योजना की लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह है, सुरक्षा, सम्मान और आत्मनिर्भरता का अनुभव। पहले जहां महिलाएं केवल घर तक सीमित थीं, अब वे कमाई कर रही हैं, बच्चों की पढ़ाई में खर्च कर रही हैं और कई जगह परिवार की मुखिया बन चुकी हैं। जीविका ने उन्हें यह एहसास कराया है कि वे केवल घर की ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की भी ताकत हैं। अब गांवों में महिलाएं आत्मविश्वास के साग परिवार के बड़े फैसले खुद ले रहीं हैं।
इस राह में अभी भी हैं कुछ चुनौतियां
इस बात में कोई दोराय नहीं कि जीविका योजना ने बिहार की तस्वीर काफ़ी बदल दी है, फिर भी कुछ चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं। जिसमें सबसे बड़ी समस्या है कि, कई महिला समूहों को अपने बनाए उत्पादों को बाज़ार तक पहुंचाने में दिक्कत आती है। कुछ ज़िलों में बैंक से ऋण लेने की प्रक्रिया अभी भी जटिल है। कई कागजों के अपूर्ण होने से या बैंक के नियमों के अनुरूप न होने पर महिलाएं आसानी से कर्ज नहीं ले पातीं।
इसके अलावा, कुछ समूहों में नियमित प्रशिक्षण और निगरानी की कमी भी देखने को मिलती है। हालांकि सरकार अब इन समस्याओं को दूर करने की दिशा में काम कर रही है ताकि हर महिला तक योजना का पूरा लाभ पहुंच सके। इन तमाम चुनौतियों के बावजूद भी इस जीविका योजना ने यह साबित कर दिया है कि अगर महिलाओं को मौका और भरोसा मिले, तो वे न केवल अपना बल्कि पूरे समाज का भविष्य बदल सकती हैं।
डिस्क्लेमर-
इस आलेख में दी गई जानकारी सार्वजनिक स्रोतों, सरकारी रिपोर्टों पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार केवल जानकारी और जागरूकता के उद्देश्य से प्रस्तुत किए गए हैं। इसका किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध नहीं है।


