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ADR रिपोर्ट: चुनावी चंदा बटोरने में BJP अव्वल, 2014 में मिला सबसे ज्यादा

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amanBy aman

Published on 17 Aug 2017 1:11 PM GMT

ADR रिपोर्ट: चुनावी चंदा बटोरने में BJP अव्वल, 2014 में मिला सबसे ज्यादा
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ADR रिपोर्ट: चुनावी चंदा बटोरने में BJP अव्वल, 2014 में मिला सबसे ज्यादा
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लखनऊ: निर्वाचन आयोग को हर साल राजनीतिक दलों को 20,000 रुपए या इससे ज्यादा मिले चंदे की पूरी जानकारी देनी होती है। हर साल से मतलब वित्तीय वर्ष से है, जो 1 अप्रैल से शुरू होकर अगले साल के 31 मार्च तक होता है। राजनीतिक दलों को ऐसे चंदा देने वालों का पूरा नाम, पता, चंदे के तरीके मतलब चेक, ड्राफ्ट या नकद भुगतान और पैन नंबर भी देना होता है।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्मस यानि एडीआर ने 8 जनवरी 2014 को अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 8 सालों के वित्तीय वर्ष 2004-05 से 2011-12 तक विभिन्न व्यावसायिक संगठनों ने राष्ट्रीय दलों को 378.89 करोड़ रुपए का चंदा दिया, जो राजनीतिक दलों को मिले कुल चंदे का 87 प्रतिशत था।

बसपा को विश्लेषण में शामिल नहीं किया

राष्ट्रीय दलों से मतलब बीजेपी, कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, भाकपा और माकपा से है। एक और राजनीतिक दल बहुजन समाज पार्टी भी इसमें शामिल है, लेकिन पार्टी ने इस बात से मना कर दिया कि 2012-13 से 2015-16 तक उसने किसी भी व्यक्ति या संस्था से 20,000 रुपए से ज्यादा का चंदा नहीं लिया। इसीलिए एडीआर ने बसपा को अपने विश्लेषण में शामिल नहीं किया।

आगे की स्लाइड्स में पढ़ें पूरी खबर...

बीजेपी को मिला सबसे ज्यादा धन

विश्लेषण से ये पता चलता है कि विभिन्न व्यावसायिक संगठनों से इन चार सालों में राजनीतिक दलों को 956 करोड़ 77 लाख रुपए मिले, जो ज्ञात श्रोतों से मिले चंदे का 89 प्रतिशत था। राष्ट्रीय दलों को मिलने वाले चंदों में सबसे ज्यादा बीजेपी को मिला। बीजेपी को 2,987 कॉरपोरेट घरानों से 705 करोड़ 81 लाख रुपए प्राप्त हुए। वहीं, कांग्रेस को 167 कॉरपोरेट घरानों से 198 करोड़ 16 लाख रुपए मिले।

कांग्रेस दूसरे नंबर पर

वित्तीय वर्ष 2012-13 से वित्तीय वर्ष 2015-16 तक बीजेपी को कॉरपोरेट घरानों से मिले चंदे में 20,000 या उससे अधिक 92 प्रतिशत, जबकि कांग्रेस को 85 प्रतिशत मिले। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को 4 प्रतिशत और माकपा को 17 प्रतिशत चंदा 20,000 या उससे अधिक में मिला।

सबसे ज्यादा चंदा लोकसभा चुनाव के दौरान

राष्ट्रीय दलों को कॉरपोरेट घरानों से सबसे ज्यादा चंदा वित्तीय साल 2014-15 में मिला, क्योंकि उस साल लोकसभा के चुनाव हुए थे। साल 2012-13 से 2015-16 तक राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को जितना चंदा मिला उसका 60 प्रतिशत 2014-15 में मिला। इसका कारण लोकसभा का चुनाव था।

तीन सालों में 35 बार दिया चंदा

सत्या इलेक्टोरल ट्रस्ट ने साल 2012-13 से साल 2015-16 तक तीन सालों में 35 बार राजनीतिक दलों को चंदे के रूप में 260 करोड़ 87 लाख रुपए दिए। बीजेपी की घोषणा के अनुसार उसे ट्रस्ट से 193 करोड़ 62 लाख, कांग्रेस को 57 करोड़ 25 लाख और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को 10 करोड़ रुपए मिले। जबकि, जनरल इलेक्टोरल ट्रस्ट इन चार सालों में बीजेपी को 70 करोड़ तो कांग्रेस को 54 करोड़ एक लाख रुपए चंदे में दिए। वामपंथी दल सीपीआई और सीपीएम को ट्रेड यूनियन और संगठनों से ज्यादा चंदा मिला। सीपीआई को 14 लाख 64 हजार रुपए और सीपीएम को एक करोड़ 9 लाख रुपए मिले।

सबसे ज्यादा चंदा रियल इस्टेट सेक्टर ने दिया

एडीआर ने कॉरपोरेट घरानों और व्यावसायिक संगठनों को 14 सेक्टर में बांटा है। इसमें ट्रस्ट, मैन्युफैक्चरिंग, आयल और पावर, खनन, रीयल इस्टेट, आयात-निर्यात को रखा गया है। कॉरपोरेट और व्यावसायिक घरानों का वर्गीकरण इसलिए किया गया, ताकि विश्लेषण में आसानी हो। साल 2012-13 में रियल इस्टेट से सबसे ज्यादा चंदा राजनीतिक दलों को मिला, जो रकम 16 करोड़ 95 लाख थी। इसमें बीजेपी को सबसे ज्यादा 15 करोड़ 96 लाख, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को 95 लाख और सीपीएम को 4 लाख मिले थे। ट्रस्ट, ग्रुप ऑफ कंपनी, पावर और रियल इस्टेट ने 2013-14 से 2015-16 तक राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को 419 करोड़ 69 लाख रुपए का चंदा दिया।

मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर से पांच दलों को मिला चंदा

मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर ने 2012-13 से 2015-16 तक पांच राष्ट्रीय राजनीतिक दलों को 123 करोड़ 67 लाख रुपए दिए। बीजेपी, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को ट्रस्ट और ग्रुप ऑफ कंपनी से सबसे ज्यादा चंदा मिला। बीजेपी को 287.69 करोड़, कांग्रेस को 129.16 करोड़ और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को 15.78 करोड़ रुपए मिले।

1,546 चंदे में देने वाले का पता नहीं था

बीजेपी को सभी 14 सेक्टर से सबसे ज्यादा चंदा मिला। इसमें रियल इस्टेट से 105.20 करोड़, खनन, निर्माण और आयात निर्यात से 83.56 करोड़ एवं केमिकल से 31.94 करोड़ रुपए मिले। राष्ट्रीय दलों को 384.04 करोड़ की राशि 1,933 लोगों से मिली जिनका पैन नंबर उपलब्ध नहीं था।

कई चंदा देने वाली कंपनियों का कोई अता-पता नहीं

इसी तरह 355.08 करोड़ के मिले 1546 चंदे में देने वाले का पता नहीं था। बिना पैन नंबर और पते वाले चंदे में सबसे ज्यादा 159.59 करोड़ बीजेपी को मिले। राजनीतिक दलों को 10.48 करोड़ का चंदा 262 ऐसी कंपनियों से मिला जिनका पता इंटरनेट पर नहीं के बराबर है। साथ इसके बारे में भी कोई जानकारी नहीं है कि वो क्या काम करते हैं। ऐसी कंपनियों से सम्पर्क का पता भी उपलब्ध नहीं है।

एडीआर की सिफारिश:

1. सुप्रीम कोर्ट ने 13 सितम्बर 2013 के अपने फैसले में कहा था, कि 20,000 या उससे अधिक का चंदा लेने पर दिए गए फॉर्म का कोई भी हिस्सा खाली नहीं रखा जाना चाहिए। मतलब, हर कॉलम में पूछे गए सवाल का पूरा जवाब हो।

2. दानकर्ता का अपना पैन नंबर देना अनिवार्य है।

3. दानकर्ता को वो तारीख भी बताना जरूरी है जिस तारीख को चंदा दिया गया। इसके लिए भरे जाने वाले फॉर्म 24- ए है इसका जिक्र जरूरी है।

4. यदि कोई राजनीतिक दल 31 अक्तूबर तक निर्वाचन आयोग के समक्ष चंदे के बारे में पूरी जानकारी नहीं रखता है तो उसपर दंड लगाया ला सकता है और मिले चंदे पर आयकर की छूट भी प्रभावी नहीं मानी जाएगी।

5. राष्ट्रीय दलों को 159.57 करोड़ रुपए 1,062 कॉरपोरेट घरानों से मिले, जिसमें पैन नंबर और पते का जिक्र नहीं है। निर्वाचन आयोग को चाहिए कि ऐसे फार्म राजनीतिक दलों को लौटाए और उसे पूरा कर भेजने का आदेश दे।

6. कॉरपोरेट घराने को चाहिए कि वो राजनीतिक दलों को दिए चंदे को अपने वेबसाइट पर जारी करे, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

7. राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अनाधिकृत राजनीतिक पार्टी को मिलने वाले चंदे की वार्षिक जांच करनी चाहिए ताकि फर्जी कंपनियों से आने वाले दान और चंदे पर रोक लग सके।

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अमन कुमार, सात सालों से पत्रकारिता कर रहे हैं। New Delhi Ymca में जर्नलिज्म की पढ़ाई के दौरान ही ये 'कृषि जागरण' पत्रिका से जुड़े। इस दौरान इनके कई लेख राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और कृषि से जुड़े मुद्दों पर छप चुके हैं। बाद में ये आकाशवाणी दिल्ली से जुड़े। इस दौरान ये फीचर यूनिट का हिस्सा बने और कई रेडियो फीचर पर टीम वर्क किया। फिर इन्होंने नई पारी की शुरुआत 'इंडिया न्यूज़' ग्रुप से की। यहां इन्होंने दैनिक समाचार पत्र 'आज समाज' के लिए हरियाणा, दिल्ली और जनरल डेस्क पर काम किया। इस दौरान इनके कई व्यंग्यात्मक लेख संपादकीय पन्ने पर छपते रहे। करीब दो सालों से वेब पोर्टल से जुड़े हैं।

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