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होली विशेष- रंग सिर्फ रंगते नहीं, जीवन को संदेश भी देते हैं

हर आदमी की चाहत जिंदगी में रंग भरने की होती है। हर आदमी और समाज के अपने-अपने पसंदीदा रंग होते हैं। जिन रंगों से वह अपने लिए खुशी, उमंग, उल्लास जैसे तमाम ऐसे अर्थ ग्रहण करता है जो उसके जीवन की गति को बढ़ाते हैं।जो उसके जीवन को उत्सवमय बनाते हैं।जो उसके एक-दूसरे से जुड़ने के

Anoop Ojha

Anoop OjhaBy Anoop Ojha

Published on 2 March 2018 12:55 AM GMT

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योगेश मिश्र योगेश मिश्र

हर आदमी की चाहत जिंदगी में रंग भरने की होती है। हर आदमी और समाज के अपने-अपने पसंदीदा रंग होते हैं। जिन रंगों से वह अपने लिए खुशी, उमंग, उल्लास जैसे तमाम ऐसे अर्थ ग्रहण करता है जो उसके जीवन की गति को बढ़ाते हैं।जो उसके जीवन को उत्सवमय बनाते हैं।जो उसके एक-दूसरे से जुड़ने के लिए प्ररित करते हैं। जो बताते हैं कि उसके अंदर भी वसंत हैं। वैसे जिस तरह वसंत बहार होता है, वैसा ही भीतर भी होता है। पर यह भी एक हकीकत है कि जितना पतझड़ बहार होता है, उतना ही पतझड़ भीतर भी होता है।अंतर महज इतना ही है कि अंदर के पतझड़ और वसंत का कोई निश्चित चक्र नहीं है।कोई निश्चित समय नहीं है।कभी भी उसकी जिंदगी में वासंती पवन के मादक झोंके आ सकते है।कभी गुलमोहर, रातरानी मोंगरे सुगंध बिखेरने लग सकते है।कभी आम बौराने लग सकते हैं।लेकिन पतझड़ के साथ ही ऐसा ही हो सकता है।

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हालांकि पतझड़ आए तो बहार आएगी यह शुभ संदेश छिपा रहता है।पतझड़ आशा का प्रतीक है।पतझड़ वसंत के आशावादी सोच को अमरता प्रदान करता है।वसंत यौवनावस्था है।आभा का सर्वोत्तम केंद्र है। भीतर के राग का रूपक है।हमारी निरंतर यह कोशिश होती है कि हम इसे सुरक्षित रखें।यह हमारे उत्तर आधुनिक, उतरोत्तर आधुनिक और निरंतर आधुनिक हो रहे कर्तव्य का भी हिस्सा होता है। लेकिन हम इसे करने में उतनी शिद्दत से नहीं जुटते जितना भीतर के वसंत के लिए जरूरी है।

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यह सच है कि रंगों के बिना सौंदर्य अधूरा है।लेकिन रंग सिर्फ आपके होने चाहिए यह बहुत स्वार्थी सौंदर्य है। होली इस स्वार्थी सौंदर्य से मुक्ति का संदेश देती है। तभी तो होली के रंग सामाजिक संकीर्णताओं को तोड़ते हैं।उनकी व्यर्थता का बोध कराते हैं।हमारी संस्कृति का जो वैशिष्ठ लीलाभाव है वह होली में अपनी संपूर्णता के साथ खिलता है, चहूंओर खिलता है।उसमें कोई कपटी व स्वार्थी संदेश नहीं होता।तभी तो प्रकृति महारास करती है।उसके अंग-प्रत्यंग में उल्लास होता है।रंग ठिठोली करते हैं।हमजोली करते हैं।हंसते हैं।बोलते हैं और पास बुलाते हैं।जिंदगी के रंगों का सपना है होली।होली रंगों का वर्तमान है रंगों का भविष्य है।आप न केवल इस दिन रंग चुनते हैं बल्कि पूरे भाव से रंगों में सरोबार भी रहते हैं।रंग सबसे पहले उसे लगाना चाहिए जो सबसे अधिक फीका हो।यह क्षमा पर्व है।क्षमा देने का और क्षमा मांगने दोनों का।

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प्राचीन भारत में वसंत उत्सव काल था।कामसूत्र में इस कालखंड में कई उत्सवों का जिक्र है।इस दौरान सांसों में संगीत और पांवों में थिरकन होती है।भीतर के वसंत में अंदर के सौंदर्य, अंदर के रस, अंदर की प्रीति को व्यक्त करने का अवसर मिलता है।तभी तो जीवन श्रृंगारमय हो उठता है,जीवन की छलक, ललक और पुलक देखते बनती है। प्रेम के उदय की अभिच्छा की अभ्यर्थना करने का मन करने लगता है।फाग और राग भीतर से लेकर बाहर तक बजने लगते हैं। ये दोनों हमारी संस्कृति के मंगलेच्छा के दीप हैं। किसानों के खेतों की हरियाली हुलस उठती है।

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पर आज जीवन की ललक और छलक छिन गई है। उमंग की उपासना खत्म हो गई है।फाग और राग के बोल बेसुरे हो गये हैं। जीवन ठगा से है।मिट्टी से होली खेलने का विज्ञान यह है कि साल में कम से कम एकबार शरीर में मिट्टी जरूर मिलनी चाहिए।लेकिन मिट्टी की जमीन हम से कब की खिसक गई है।सहजीविता जो हमारे समाज का आधार था वह भंग हो गई है।व्यक्ति प्रतियोगिता, प्रतिस्पर्धा और घृणा के मायावी युद्ध में फंस गया है।जबकि वसंत में सहचर्य आज भी है, महारास आज भी है।उसकी रंग-भाषा अंदर तक आज भी तर करती है।गीता संदेश देती है कि काम से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से संदेह। हम निरंतर काम की चपेट में आते जा रहे हैं। संतृप्त न होने की कामना बढ़ती जा रही है।उल्लास और उत्सवधर्मिता न हो तो हम जड़ हो जाएं। पर यह भी हकीकत है कि हमारे अंदर से यह सब तिरोहित हो रहा है।हमारे अंदर के इस ठस ढांचे की वर्जनाओं को तोड़ने के लिए ही हमारे पर्व बने हैं।जिनमें अलग-अलग रंग हैं।जो अलग-अलग तरह के ठसपन को तोड़ते हैं। पर होली में सब रंग एक साथ है।

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मतलब साफ है कि होली भीतर के पतझड़ को एक साथ वसंत में बदल सकती है। होली वसंत के आने का जो संदेश देती है, उसकी सकारात्मकता की समझ स्वीकार करनी चाहिए।यह आशावादी सम्प्रेषण उम्मीद का बड़ा फलक है।जो बताती है कि फूलों में गंध जो भरी है वही जीवन में सुंगध भरती है। होली के रंग अस्मिता की एक नई आभा सृजित करते हैं।उत्प्रेरणा की उपस्थिति जताते हैं। आपके भीतर एक वसंत गढ़ते हैं।यह वसंत कब तक पतझड़ में नहीं बदलेगा यह केवल इसपर निर्भर करता है कि आप कितनों के अंदर वसंत बनाने में मदद करते हैं। कितनों के आस-पास वसंत बनाते हैं। सिर्फ रंग भर लगा देना होली नहीं है। होली रंगना है। ऐसे रंगों से जो रंगे जाने वाले के लिए मुफीद हों। सूट करते हों। जरूरी हों। पर हम सिर्फ रंग लगा रहे हैं।रंग भर नहीं रहे हैं।यदि ऐसा नहीं करेंगे तो रिश्तों के गुनगुनेपन को महसूस नहीं कर पाएंगे। और इसके बिना अंदर तक वसंत नहीं उतर पाएगा।

Anoop Ojha

Anoop Ojha

Excellent communication and writing skills on various topics. Presently working as Sub-editor at newstrack.com. Ability to work in team and as well as individual.

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