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कोरोना के खिलाफ मुम्बई मॉडल की हो रही वाहवाही, तीसरी लहर के खिलाफ कमर कसी
मुंबई प्रशासन ने जिस तरह कोरोना के खिलाफ जंग को लड़ा और हालात को काबू किया, उसकी अब वाहवाही हो रही है।
मुंबई: महाराष्ट्र की राजधानी मुम्बई (Mumbai) कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर (Corona Virus Second Wave) में बहुत बुरी तरह चपेट में आ गया था लेकिन जिस तरह मुंबई प्रशासन ने इस युद्ध को लड़ा और हालात को कंट्रोल किया, उसकी अब वाहवाही हो रही है और सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने तो मुंबई मॉडल (Mumbai Model) को दिल्ली में लागू करने का सुझाव दिया है। कोरोना की दूसरी लहर में मुम्बई म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन ने बेहतरीन रणनीति बनाई और उसे सफलतापूर्वक लागू किया। यही वजह थी कि मुंबई से दिल दहलाने वाली फोटो नहीं आईं।
बृहनमुंबई म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन (BMC) के प्रमुख इकबाल सिंह चहल (Iqbal Singh Chahal) बताते हैं कि युद्ध में सफलता के पीछे सही प्रबंधन और विकेंद्रीकृत व्यवस्था को लागू करना है। मुंबई में हॉस्पिटल बेड और ऑक्सीजन की उपलब्धता को बनाये रखने के लिए क्राइसिस मैनेजमेंट टीमें (Crisis Management Teams) बनाई गईं। उन अस्पतालों की गहन मॉनिटरिंग की गई, जहां से आपात मदद की सबसे ज्यादा कॉल आती थीं।
क्राइसिस टीमों ने अस्पतालों के संग मिलकर काम किया और सरप्लस ऑक्सीजन (Surplus oxygen) को उन अस्पताल में शिफ्ट करते रहे जहां उसकी कमी थी। जो अस्पताल अपनी ऑक्सीजन कैपेसिटी से ज्यादा मरीज भर्ती कर रहे थे उन्हें ऐसा न करने को कहा गया।
ऑक्सीजन की कमी
पहली लहर में मुम्बई में ऑक्सीजन की जरूरत करीब 210 मीट्रिक टन थी। दूसरी लहर में ये डिमांड 270 टन तक पहुंच गई। एक वाकया तो ये हुआ कि ऑक्सीजन की कमी के चलते सरकारी अस्पतालों में भर्ती 168 मरीजों को अन्य फील्ड अस्पतालों में शिफ्ट करना पड़ा। कई निजी अस्पतालों को भी मरीज शिफ्ट करने पड़े और नई भर्तियां बन्द करनी पड़ीं। पता चला कि शहर के लिए आवंटित ऑक्सीजन अन्य जगहों पर चली जा रही है। ऐसे में बीएमसी ने ऑक्सीजन टैंकर ट्रैक करने शुरू किए और सिलेंडर रीफिलिंग केंद्रों पर अपनी टीमें तैनात कीं। इसके अलावा ऑक्सीजन का उचित और सावधानीपूर्वक इस्तेमाल किया गया। अस्पतालों से कहा गया कि वे किसी भी प्रकार के लीकेज रोकें।
महाराष्ट्र के कोविड टास्क फोर्स ने अनुशंसा की थी कि ऑक्सीजन के ज्यादा इस्तेमाल करने वाली हाई फ्लो नेज़ल ऑक्सीजन मशीन का प्रयोग बंद करें और बिना ऑपरेशन वाले वेंटिलेशन का प्रयोग करें। इसका फायदा भी मुंबई को हुआ। नतीजा ये हुआ कि जहां पिछले महीने के बीच में एक्टिव केस 80 से 90 हजार थे, वो अब 51165 रह गए हैं और शहर में ऑक्सीजन की खखपत करीब 240 मीट्रिक टन रह गई है। ये खपत एक समय तो 270 टन तक पहुंच गई थी।
सिर्फ तुलना के लिए देखें तो दिल्ली में 8 मई को 87 हजार से ज्यादा एक्टिव केस थे और 700 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की डिमांड की जा रही थी। दिल्ली जैसी स्थिति में होते हुए भी मुंबई ने 270 मीट्रिक टन ऑक्सीजन में कैसे काम चलाया, ये समझने के लिए अब दिल्ली सरकार के अधिकारी मुम्बई के अधिकारियों से संपर्क में हैं।
संपूर्ण प्रबंधन
बीएमसी प्रमुख इकबाल सिंह चहल का कहना है कि मुंबई मॉडल सिर्फ ऑक्सीजन प्रबंधन के बारे में नहीं है बल्कि विभिन्न उपायों और पहल का कॉम्बिनेशन है। चहल ने कहा कि कोरोना की पहली लहर में स्थापित सिस्टम की बदौलत ही हम दूसरी लहर से इसीलिए निपट सके। इन उपायों में शहर के मुख्य आपदा कंट्रोल रूम को 24 वॉर रूम में बदलना शामिल था। इस विकेंद्रीकरण से काम सही ढंग से चलता रहा।
शहर में पिछले साल विशाल फील्ड अस्पताल बनाये गए थे जो इस लहर में बहुत मददगार साबित हुए। मरीजों का बहुत लोड इन अस्पतालों ने ले लिया। इसके अलावा बीएमसी ने निजी अस्पतालों के 80 फीसदी से ज्यादा बेड टेकओवर कर लिए थे जिनको वॉर रूम के जरिये मरीजों को एलॉट किया जा रहा था। निजी अस्पतालों को बिजनेस का बड़ा नुकसान होने के बावजूद ये सिस्टम अब भी जारी है। इसके साथ ही सभी अस्पतालों में बेड का एलॉटमेंट वॉर रूम के जरिये एक केंद्रीयकृत तरीके से किया गया।
बीएमसी ने एक बोल्ड कदम उठाया एन्टीवायरल दवा रेमडेसिविर को 300 गुना ज्यादा दाम पर खरीदने का टेंडर जारी करके। चहल कहते हैं कि किसी भी कीमत पर जानें बचाने के लिए ऐसा किया गया।
तीसरी लहर की तैयारी
मुंबई ने अब कोरोना की तीसरी संभावित लहर से निपटने की तैयारी कर ली है। इसके तहत तीन और बड़े फील्ड अस्पताल बनाये जा रहे हैं। इसके अलावा अब सभी सरकारी अस्पतालों में अपना ऑक्सीजन उत्पादन संयंत्र होगा जहां वायुमंडल की हवा से मेडिकल ग्रेड ऑक्सीजन बनाई जाएगी। ससाथ ही अब और ज्यादा संख्या में आईसीयू बेड्स का इंतजाम किया जा रहा है।