खुशी गम का मिला-जुला एहसास है अलविदा जुमे की नमाज, जानिए क्यों है खास

लखनऊ: रमजान के महीने में आखिरी जुमा (शुक्रवार) को ही अलविदा जुमा कहते है। इस दिन के बाद से लोग ईद की तैयारियों में लग जाते है। जुमा अलविदा रमजान माह के आखिरी 10 दिन में पड़ता है।  इस जुमा को साल भर पड़ने वाले सभी जुमे से बेहतरीन माना जाता है।

हजारों इबादत का फल एक साथ
अलविदा जुमे की नमाज का विशेष महत्व है। ये अफजल जुमा होता है। इससे जहन्नम से निजात मिलती है। ये आखिरी असरा है, जिसमें एक ऐसी रात होती है, जिसे तलाशने पर हजारों महीने की इबादत का लाभ एक साथ मिलता है।

वैसे तो जुमे की नमाज सालभर होती है, लेकिन रमजान का आखिरी जुमा  सबसे खास होता है। अलविदा की नमाज में साफ दिल से जो भी दुआ की जाती है, वो जरूर पूरी होती है। जमात-उल-विदा इबादत का दिन है। इस दिन की इबादत की बहुत अहमियत है। कुछ लोग तो अलविदा का पूरा दिन कुरान पढ़ने में लगा देते हैं।

इसके बाद ईद की तैयारी
अलविदा जुमा रमजान महीने के आखिर में पड़ा है इसके बाद ही लोग ईद की तैयारी में लग जाते है। अलविदा जुमें के बाद से बाजार में देर रात तक लोग सामान खरीदारी करते है। रमजान का अलविदा जुमा आते ही मसजिदों में सहरी के वक्त अलविदा, अलविदा ए माहे रमजान अलविदा के तराने गूंजने लगे हैं। ईद के करीब आने की खुशी और रमजान के जाने का गम मुसलमानों के दिलों में एक अजीब कैफियत पैदा कर जाता है। खुशी और गम के मिले जुले अहसास के साथ मुसलमाननों ने  शुक्रवार (आज) अलविदा की नमाज अदा किया।