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सोने सा दिन, चांदी सी रात चमकती है, गांव की यही तस्वीर दिल में बसती है

Admin
Published on 29 Feb 2016 10:20 AM GMT
सोने सा दिन, चांदी सी रात चमकती है, गांव की यही तस्वीर दिल में बसती है
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Zohheb Farooqui Zohheb Farooqui

भारत वर्ष एक ऐसा देश जिसके वासी इस भूमि को मां का दर्जा देते है 'भारत माता' कहते हैं और आज आज़ादी के 68 सालों बाद भी भारत माता के लगभग 70 प्रतिशत बच्चे ग्रामीण क्षेत्रों में बसते हैं। वो ग्रामीण क्षेत्र जो हमारी भारत मां की पावन गोद सी है।

जहां लोगों के दिलों में आज भी एक-दूजे के लिए हमदर्दी पलती है।

जहां सोने से दिन को विदा कर चांदी सी चमकती रात निकलती है ।।

जहां मनुष्य पेड़-पौधों से प्यार करता है, उनकी हत्या नहीं ।

जहां प्रदूषण,शोर शराबा, अशांति जैसी कोई समस्या नहीं ।।

जहां की शीतल वायु छू ले तो माँ की ममता जैसी लगती है ।

जहां लोगों को सुला कर तारों की टोली सारी रात जगती है ।।

जहां जल और वायु के संगीत पर पंछी गुनगुनाते हैं ।

जहां प्रौद्योगिकी को हरा कर प्रकृति को जिताते हैं।।

जहां रिश्ते आज भी रिश्तों से लगते हैं

जहां के लोग भी फरिश्तों से लगते हैं

वो खेत-खलियान,लोगों के दिल बड़े भले ही छोटे मकान

हमारी संस्कृति को जीवित रखता है ये ग्रामीण हिन्दुस्तान ।

हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। इस सिक्के का भी दूसरा पहलू है जो इस ग्रामीण हिन्दुस्तान को संपूर्ण होने के बावजूद भी पिछड़ा बताता है। ये शायद हमारे देश की राजनीति और सरकारी विभागों में फैले भ्रष्टाचार का दुष्प्रभाव है। दरअसल, इन ग्रामीण क्षेत्रों का विकास उन योजनाओं के अनुसार बिल्कुल भी नहीं हुआ, जिसे सरकार ने इन क्षेत्रों को विकसित करने के इरादे से बनाई हैं।

ग्रामीण इलाकों की समस्याओं को दूर करने के लिए योजनाएं तो बनी, लेकिन भ्रष्टाचार के चलते कभी लागू नहीं हो सकीं। शिक्षा केंद्र तो बने, लेकिन शिक्षा का स्तर नहीं बदला। सरकार ने वादे तो बहुत किए लेकिन दरिद्रता के निवास में रोज़गार की लालटेन जलने न पाई। उनके घरों के चूल्हे रोने लगे। घर में एक ओर भूख से बिलखते बच्चे हैं तो दूसरी ओर लाचारी के बिस्तर पर लेटे वो बूढ़े मां-बाबा जिनकी दवाएं तो क्या निवाले भर के भी पैसों का मंहगा हो चला पूत किस-किस का मुंह देखे।

अपने बच्चों का, मां-बाबा का या उस पत्नी का जो खेती-बाड़ी के 4 पैसों से किसी तरह 2 रोटी के 8 हिस्से करके घर को चलाए जा रही है। अब उस पूत की आंखों में नमी से उम्मीदें धुंधली पड़ने लगीं। वो अकेला भला किस-किस का दर्द बांटे? किस-किस को जवाब दे? कहां जाए, क्या करे? मस्तिष्क में सैकड़ों सवाल हैं जब हृदय से एक ही आवाज़ आती है ‘शहर’ और उस पूत को दिखाई देता है गांव की ऊबड़-खाबड़ पगडंडी से होकर शहर को जाने वाला वो सुनहरा रास्ता जो सपनों की एक नगरी को ले जाता है। उसने सुना है कि वहां सपने पूरे भी होते हैं।

उसकी उम्मीदों के अंगने में एक नई रोशनी हो जाती है ।

कोई अनसुनी सी दुआ जैसे मुद्दतों बाद सुनी हो जाती है ।।

उसके सपने उस सपनों की दुनिया में जाने के लिए मचलने लगते हैं ।

वो चोट खाए, लड़खड़ाते हुए, उसके अरमान फिर संभलने लगते हैं ।।

अपनी पलकों पे सपने, कंधों पे ज़िम्मेदारी, हाथ में एक बस्ता और जेब में चंद पैसे लिए वो शहर की ओर निकलता है ।

पीछे छोड़ अपनी पहचान, मां-बाबा, पत्नी-बच्चे और वो टूटा मकान। वो एक अंजान शहर की भीड़ में अकेला चलता है ।।

अब उसको तलाश है तो बस काम की, मेहनत के अंजाम की, खुशियों वाली शाम की ।

लेकिन उसने ये नहीं जाना कि शहर की सड़कों पे लिखी हैं कई ठोकरें उसके नाम की ।।

उसे रहने की जगह तो मिलती है लेकिन ऐसी जो रहने के लायक नहीं।

और काम भी मिला तो ऐसा जो उसकी आशा जितना लाभदायक नहीं ।।

अब वो जीवन को शायद समझने लगा और शहर को भी ।

उसने मेहनत करने की ठानी सुबह, शाम, दोपहर को भी ।।

मेहनत करता है वो, पैसे भी कमाता है, लेकिन शहर में होने वाले खर्चे कितने हैं ।

क्या घर को भेजे जब ये गिनती भी नहीं होती कि जेब में क़र्ज़ वाले पर्चे कितने हैं ।।

वो दिन-रात मेहनत कर के भी तो हारने लगा है ।

बेगाने शहर में किसी अपने को पुकारने लगा है ।।

लेकिन अपने तो गांव के उस कच्चे मकान में ये आस लगाये जी रहे हैं ।

कि अबकी दिवाली घर में खुशियों का दिया जलेगा।।

कहीं उनकी आस बस एक आस ही ना रह जाए।

कि उस पूत की गुल्लक में खनकते चंद सिक्कों से किसको क्या मिलेगा?।।

अब तो वो सपने भी आंसू बन के उसकी आखों से बहने लगे हैं।

उसके अरमान डरे, सहमे से, दिल के अंधेरे कोनों में रहने लगे।

अब वो ना गांव लौट सकता है और ना ही शहर में उसका गुज़ारा है।

और नौकरी भी कैसे छोड़े जो 2 वक़्त की रोटी का एकमात्र सहारा है।।

बस इसी चक्रव्यू में फंसकर वो ग़रीब बस एक ग़रीब ही रह जाता है।

फ़िक्र और दर्द की लहरों संग उसके जीने का हौसला भी बह जाता है।

अब उसको फ़र्क़ भी क्या पड़ता है, गांव हो या शहर जब वो समझ चुका है कि जीवन कठिनाइयों में ही बीतना है और इस दलदल से निकल पाना असंभव है। वो ये भी जानता है कि गलती ना उसकी है, ना गांव की और ना ही शहर की, बल्कि गलती है तो देश के रक्षक बने भक्षकों की, जो हमारे देश को विकास के नाम पर बस नोचते रहे, खाते रहे। लेकिन इन सबके बावजूद वो आज भी उनके झूठे वादों पर विश्वास करता है और वो आज भी वोट देने जाता है ये सोचकर कि शायद उसके गांव की स्थिति बदले और उसके जैसे नाजाने कितने लोगों का जीवन नष्ट होने से बच सके।

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