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कविता : क्यों हर इक की कृपा मुझपर, बरस जाती है रह-रह कर...

raghvendra

raghvendraBy raghvendra

Published on 27 Jan 2018 1:09 PM GMT

कविता : क्यों हर इक की कृपा मुझपर, बरस जाती है रह-रह कर...
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क्यों हर इक की कृपा मुझपर,

बरस जाती है रह-रह कर !

मैं सोऊँ तो जगा देता,

मैं बैठूं तो उठा देता ।

खड़ा होता मैं पलभर, वो

बढ़ा देता कदम खरतर!

अहैतुक दे रहा कोई---

अजाने रूप धर-धर कर !!1!!

मुझे रुकने की आदत है,

मगर हमराह गतिमय है!

वही चैतन्य भर देता --

मैं होता चूर जब थककर ।

मैं पड़ रहता जो आलस में,

चला देता कोई आकर ।।2।।

वही हमराह-जो चिरकाल से

साथी हमारा है;

थके-हारे, दु:खी-वंचित,

सभी का हृदयतारा है!

सभी में व्यक्त है, सबमें

सुसंगत काल रमता है;

वही आनन्दमय! आनन्द-

जो भरता हमें पाकर ।।3।।

क्यों हर इक की कृपा मुझपर

बरस जाती है रह - रह कर !

अहैतुक दे रहा कोई---

अजाने रूप धर-धर कर !!

raghvendra

raghvendra

राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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