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गज़ल: दीप खुशियों के जलाकर, टिमटिमाती है दिवाली, तम घना मन से मिटाकर

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raghvendraBy raghvendra

Published on 14 Oct 2017 8:34 AM GMT

गज़ल: दीप खुशियों के जलाकर, टिमटिमाती है दिवाली, तम घना मन से मिटाकर
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शशि पुरवार

दीप खुशियों के जलाकर, टिमटिमाती है दिवाली,

तम घना मन से मिटाकर,जगमगाती है दिवाली।

फर्श पर रंगोली सजी है, द्वार बंदनबार झूलें,

भीत पर लडिय़ां चमकतीं, झिलमिलाती है दिवाली।

मुल्क से अपने सभी घर, लौटकर आने लगे हैं,

फासले होने लगे कम, दिल मिलाती है दिवाली।

मग्न है सब खेलने में, ताश, बूढ़े और बच्चे

मिल ठहाकों के पटाखे, खिलखिलाती है दिवाली।

झोपड़ी में एक दीपक रोज जलता हौसलों का,

पेट भर भोजन मिला जो, मुस्कुराती है दिवाली।

एक साया ढूंढता है, अधजले से कागजों में,

काश मिल जाये फटाका, मन लुभाती है दिवाली।

फिर अमावस रात काली, खो गयी है रौशनी में,

सत्य का जगमग उजेरा, गीत गाती है दिवाली।

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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