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प्रेम का प्रतीक है ये बावड़ी, 10-11वीं सदी में हुआ था निर्माण

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Updated on: 18 April 2016 10:41 AM GMT
प्रेम का प्रतीक है ये बावड़ी, 10-11वीं सदी में हुआ था निर्माण
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पाटण: पाटण कभी गुजरात की प्राचीन राजधानी हुआ करती थी। यहां का रानी वाव (10-11वीं ई.) प्राचीन समय की वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है, जिसकी तारीफ शब्दों में करना शायद संभव ही नहीं। इसी के चलते इस बावड़ी (सीढ़ीदार कुआं) को 23 जून, 2014 को यूनेस्को ने विश्व विरासत स्थल में शामिल किया है।

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10-11वीं सदी में निर्माण

'रानी की वाव' की नक्काशी आधुनिक इंजीनियरिंग की दुनिया को भी आश्चर्यचकित करती है। इसका निर्माण 10-11वीं सदी में सोलंकी राजवंश की रानी उदयमती ने पति भीमदेव सोलंकी की याद में करवाया था।ये प्रेम का प्रतीक भी है। राजा भीमदेव ही सोलंकी राजवंश के संस्थापक थे। भीमदेव गुजरात के सोलंकी वंश के शासक थे। उन्होंने वडनगर (गुजरात) पर 1021-1063 ई. तक शासन किया।

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27 मीटर गहरी बावड़ी

लगभग 64 मीटर लंबी और 20 मीटर चौड़ी यह बावड़ी 27 मीटर गहरी है। ज्यादातर सीढ़ी युक्त कुओं में सरस्वती नदी के जल के कारण कीचड़ भर गया है। निर्माण कार्य में नक्काशीदार पत्थरों का प्रयोग किया गया है। अभी भी वाव के खंभे और उन पर उकेरी गईं कलाकृतियां सोलंकी वंश और उनके वास्तुकला को दर्शाती है।

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स्तंभों पर भगवान विष्णु के अवतार की नक्काशी

वाव की दीवारों और स्तंभों पर अधिकांश नक्काशियां, राम, वामन, महिषासुरमर्दिनी, कल्कि, आदि जैसे अवतारों के विभिन्न रूपों में भगवान विष्णु को समर्पित हैं। मूल रूप से बावड़ी सात मंजिल की थी, किन्तु इसकी पांच मंजिलों की ही संरक्षित रखा जा सका है।

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सीढ़ियों की बनावट सीधी

रानी वाव की बनावट विशिष्ट श्रेणी की है। इसकी सीढ़ियां सीधी हैं, लेकिन इस पर बनी कलाकृतियां अपने-आप में अनूठी हैं। सीढ़ियों पर बने आलिए तथा मेहराब हालांकि अब टूट-फूट चुके हैं, लेकिन फिर भी वे तत्कालीन समय की समृद्ध कारीगरी के दर्शन करवाते हैं। वाव की दीवारों पर लगी कलात्मक खूंटियां भी दिलकश हैं।

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