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कविता: काहे को ब्याहे बिदेस, अरे, लखिय बाबुल मोरे काहे को ब्याहे बिदेस

raghvendra

raghvendraBy raghvendra

Published on 17 Feb 2018 9:44 AM GMT

कविता: काहे को ब्याहे बिदेस, अरे, लखिय बाबुल मोरे काहे को ब्याहे बिदेस
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अमीर खुसरो

काहे को ब्याहे बिदेस,

अरे, लखिय बाबुल मोरे काहे को ब्याहे बिदेस

भैया को दियो बाबुल महले दो-महले

हमको दियो परदेस अरे, लखिय बाबुल मोरे

काहे को ब्याहे बिदेस

हम तो बाबुल तोरे खूँटे की गैयाँ

जित हाँके हँक जैहें अरे, लखिय बाबुल मोरे

काहे को ब्याहे बिदेस

हम तो बाबुल तोरे बेले की कलियाँ

घर-घर माँगे हैं जैहें अरे, लखिय बाबुल मोरे

काहे को ब्याहे बिदेस

कोठे तले से पलकिया जो निकली

बीरन ने खाए पछाड़ अरे, लखिय बाबुल मोरे

काहे को ब्याहे बिदेस

हम तो हैं बाबुल तोरे पिंजरे की चिडिय़ाँ

भोर भये उड़ जैहें अरे, लखिय बाबुल मोरे

काहे को ब्याहे बिदेस

तारों भरी मैंने गुडिय़ा जो छोड़ी

छूटा सहेली का साथ अरे, लखिय बाबुल मोरे

काहे को ब्याहे बिदेस

डोली का पर्दा उठा के जो देखा

आया पिया का देस अरे, लखिय बाबुल मोरे

काहे को ब्याहे बिदेस

अरे, लखिय बाबुल मोरे

काहे को ब्याहे बिदेस अरे, लखिय बाबुल मोरे

raghvendra

raghvendra

राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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