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लघु कहानी, कानून के समक्ष पेश होने की इजाजत माँगता आम आदमी

raghvendra

raghvendraBy raghvendra

Published on 7 Oct 2017 7:55 AM GMT

लघु कहानी, कानून के समक्ष पेश होने की इजाजत माँगता आम आदमी
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कानून के द्वार पर रखवाला खड़ा है। उस देश का एक आम आदमी उसके पास आकर कानून के समक्ष पेश होने की इजाजत माँगता है। मगर वह उसे भीतर प्रवेश की इजाजत नहीं देता।

आदमी सोच में पड़ जाता है। फिर पूछता है - क्या कुछ समय बाद मेरी सुनी जाएगी? देखा जाएगा- रखवाला कहता है - पर इस समय तो कतई नहीं! कानून का दरवाजा सदैव की भाँति आज भी खुला हुआ है। आदमी भीतर झाँकता है।

उसे ऐसा करते देख रखवाला हँसने लगता है - मेरे मना करने के बावजूद तुम भीतर जाने को इतने उतावले हो तो फिर कोशिश करके क्यों नहीं देखते; पर याद रखना - मैं बहुत सख्त हूँ, जबकि मैं दूसरे रखवालों से बहुत छोटा हूँ। यहाँ एक कक्ष से दूसरे कक्ष तक हर दरवाजे पर एक रखवाला है और हर रखवाला दूसरे से ज्यादा शक्तिशाली है। कुछ के सामने जाने की हिम्मत तो मुझमें भी नहीं है।

आदमी ने कभी सोचा भी नहीं था कि कानून तक पहुँचने में इतनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। वह तो यही समझता था कि कानून तक हर आदमी की पहुँच हर समय होनी चाहिए। फर कोटवाले रखवाले की नुकीली नाक, बिखरी-लंबी काली दाढ़ी को नजदीक से देखने के बाद वह अनुमति मिलने तक बाहर ही प्रतीक्षा करने का निश्चय करता है। रखवाला उसे दरवाजे के एक तरफ स्टूल पर बैठने देता है।

वह वहाँ कई दिनों तक बैठा रहता है। यहाँ तक कि वर्षो बीत जाते है। इस बीच वह भीतर जाने के लिए रखवाले के आगे कई बार गिड़गिड़ाता है। रखवाला बीच-बीच में अनमने अंदाज में उससे उसके घर एवं दूसरी बहुत-सी बातों के बारे में पूछने लगता है, पर हर बार उसकी बातचीत इसी निर्णय के साथ खत्म हो जाती है कि अभी उसे प्रवेश नहीं दिया जा सकता।

आदमी ने सफर के लिए जो भी सामान इकट्ठा किया था और दूसरा जो कुछ भी उसके पास था, सब रखवाले को खुश करने में खर्च कर देता है। रखवाला उससे सब कुछ इस तरह से स्वीकार करता जाता है मानो उस पर अहसान कर रहा हो। वर्षो तक आशा भरी नजरों से रखवाले की ओर ताकते हुए वह दूसरे रखवालों के बारे में भूल जाता है! कानून तक पहुँचने के रास्ते में एकमात्र वही रखवाला उसे रुकावट नजर आता है।

वह आदमी जवानी के दिनों में ऊँची आवाज में और फिर बूढ़ा होने पर हल्की बुदबुदाहट में अपने भाग्य को कोसता रहता है। वह बच्चे जैसा हो जाता है। वर्षों से रखवाले की ओर टकटकी लगाए रहने के कारण वह उसके फर कॉलर में छिपे पिस्सुओं के बारे में जान जाता है।

वह पिस्सुओं की भी खुशामद करता है ताकि वे रखवाले का दिमाग उसके पक्ष में कर दें। अंतत: उसकी आँखें जवाब देने लगती है। वह समझ नहीं पाता कि दुनिया सचमुच पहले से ज्यादा अँधेरी हो गई है या फिर उसकी आँखें उसे धोखा दे रही है। पर अभी भी वह चारों ओर के अंधकार के बीच कानून के दरवाजे से फूटते प्रकाश के दायरे को महसूस कर पाता है।

वह नजदीक आती मृत्यु को महसूस करने लगता है। मरने से पहले एक सवाल, जो वर्षो की प्रतीक्षा के बाद उसे तंग कर रहा था; रखवाले से पूछना चाहता है। वह हाथ के इशारे से रखवाले को पास बुलाता है, क्योंकि बैठे-बैठे उसका शरीर इस कदर अकड़ जाता गया है कि वह चाहकर भी उठ नहीं पाता। रखवाले को उसकी ओर झुकना पड़ता है क्योंकि कद में काफी अंतर आने के कारण वह काफी ठिगना दिखाई दे रहा था।

अब तुम क्या जानना चाहते है- रखवाला पूछता है - तुम्हारी चाहत का कोई अंत भी है? कानून तो हरेक के लिए है। आदमी कहता है - पर मेरी समझ में ये नहीं आ रही कि इतने वर्षो में मेरे अलावा किसी दूसरे ने यहाँ प्रवेश हेतु दस्तक क्यों नहीं दी?

रखवाले को समझते देर नहीं लगती कि वह आदमी अंतिम घड़ियाँ गिन रहा है। वह उसके बहरे होते कान में चिल्लाकर कहता है - किसी दूसरे के लिए यहाँ प्रवेश का कोई मतलब नहीं था, क्योंकि कानून तक पहुँचने का यह द्वार सिर्फ तुम्हारे लिए ही खोला गया था और अब मैं इसे बंद करने जा रहा हूँ।

-फ्रांज़ काफ्का

(अनुवाद - सुकेश साहनी)

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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