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केवल स्नान पर्व ही नहीं है कुंभ, जनमानस की आत्मशुद्धि का भी है देवपर्व

Admin
Updated on: 22 April 2016 10:47 AM GMT
केवल स्नान पर्व ही नहीं है कुंभ, जनमानस की आत्मशुद्धि का भी है देवपर्व
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पूनम नेगी पूनम नेगी

लखनऊ: धर्मग्रंथों में तीर्थों की अलौकिक महिमा और उनके पुण्य प्रभावों का विशद वर्णन मिलता है। हमारे तत्वदर्शी ऋषियों, मनीषियों का कहना है कि जैसे काल विशेष या स्थान विशेष में किये गये किसी भी कार्य का प्रभाव और महत्व बढ़ जाता हैए उसी तरह विभिन्न काल योगों में विशिष्ट तीर्थों में होने वाले धार्मिक आयोजनों का पुण्य प्रभाव भी कई गुना हो जाता है। ऐसे ही पर्वों में एक अति विशिष्ट पर्व है। महाकाल की नगरी उज्जैन का वर्तमान सिंहस्थ कुंभ पर्व।

विश्व की सात प्राचीनतम नगरियों में शुमार ये नगरी अपनी तमाम विशिष्टताओं के लिए जानी जाती है। कुश स्थली अर्थात उज्जैन को अत्यन्त पवित्र तीर्थस्थली माना गया है और क्षिप्रा नदी ने इस नगरी की महत्ता को और भी बढ़ा दिया है। यूं तो प्रत्येक साल वैशाख मास की पूर्णिमा को किया गया क्षिप्रा स्नान पुण्यफलदायी माना जाता है

किन्तु प्रति बारहवें वर्ष पड़ने वाले सिंहस्थ कुम्भ महापर्व के दौरान यह स्नान पर्व सहज ही मोक्ष प्रदान कर देता है। क्षिप्रा तट पर इस स्नान पर्व का आयोजन इस साल 22 अप्रैल से 21 मई 2016 तक किया जाएगा। खास बात ये है कि इस बार सिंहस्थ कुंभ महापर्व में पहली बार श्रद्धालुओं को क्षिप्रा के साथ नर्मदा के भी प्रवाहमान जल में स्नान का सुअवसर मिलेगा।

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दुनियाभर के इतिहासवेत्ता हमारे कुंभ पर्वों को दुनिया का सबसे बड़ा पर्व मानते हैं। यूं तो यदि विश्व स्तर पर देखें तो स्वीडन में स्टॉकहोम, ऑस्ट्रेलिया में ब्रिसबेन अमेरिका में हडसन आैर कनाडा में ओटावाय दुनिया के अनेक देशों में भी बड़ी-बड़ी नदियों के किनारे मेलों के आयोजन होते रहते हैं, किन्तु इनमें कोई भी कुंभ जैसा नहीं है।

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ये बात बिल्कुल सच है। कुंभ का यह स्नान पर्व अपने आप में अनूठा है। अमीर-गरीब और राष्ट्र की सरहदें भी इस आयोजन में कोई मायने नहीं रखतीं। यहां आकर लगता ही नहीं कि हम कभी भिन्न थे। किसी को कोई न्योता नहीं गया, फिर भी लाखों-करोड़ों आ गए। सदियां बीत गईं ऐसा होते-होते फिर भी हम भारतवासियों को कोई भी आश्चर्य नहीं होता।

हां विदेश के लोग जरूर अचरज करते हैं। मगर हम सबके मन में ये विचार जरूर आना चाहिए कि अरबों-खरबों के खर्च का ये आयोजन क्या सिर्फ स्नान के लिए है या फिर इसके मूल मंतव्य आैर सिद्धांत कुछ आैर भी हैं।

हमारी धर्मप्राण संस्कृति की पुरुषार्थ चातुष्ट्य की अवधारणा में धर्म-अर्थ-काम इन तीनों को साधन माना गया है और मोक्ष को साध्य। हमारे यहां कहा गया है कि कुंभ स्नान से मोक्ष की प्राप्ति सहज ही हो जाती है, इसीलिए कुंभ स्नान के इस अमृत पर्व के प्रति भारतीय जनमानस की आस्था की जड़ें काफी गहरी पैठी हुई हैं। इस पर्व के पौराणिक आख्यान से तो हम सभी सुपरिचित हैं। कहा जाता है कि जब देवों आैर दानवों ने मिलकर समुद्र मंथन किया तो उसमें से चौदह रत्न निकले थे।

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जिनमें से एक था अमृत कुंभ। अमृत कुंभ के निकलते ही पहले हम कहते हुए उसे प्राप्त करने के लिए देवों आैर दानवों में संग्राम छिड़ गया। तब अमृत जैसे महत्वपूर्ण तत्व की रक्षा के लिए भगवान विष्णु के संकेतानुसार देवगुरु बृहस्पति के नेतृत्व में इंद्रपुत्र जयंत ने उसे उठा लिया आैर उस अमृत घट की रक्षा के लिए आकाश मार्ग से वहां से चल दिये। इस दौरान पृथ्वी पर चार स्थानों प्रयाग हरिद्वार, नासिक और उज्जैन पर उस अमृत कुंभ की बूंदे गिर पड़ीं।

जिससे वह भूमि विशिष्ट बन गई आैर उस भूमि पर 12 और 6 साल के अंतराल में पूर्णकुंभ और अर्धकुंभ के आयोजन शुन्य डिग्री हो गया। ध्यान रखना चाहिए कि कुंभ केवल स्नान पर्व नहीं है। ये पर्व जन सामान्य को आत्मशुद्धि और आत्मकल्याण की दिव्य प्रेरणा देनेे वाला देवपर्व माना गया है। प्राचीन काल में साधु-संत नगरों से दूर गुफाओं और जंगलों में निवास करते थे। ऐसे पर्वो पर ही वे आम लोगों के बीच आते थे आैर इनके सानिध्य में आकर आम लोग अपने लौकिक जीवन की समस्याओं का समाधान खोजते थे और अपने जीवन को ऊर्ध्वगामी बनाकर मुक्ति का पथ प्रशस्त करते थे।

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दुर्भाग्यवश कुंभ का ये पुण्य पर्व आज अपने मूल मंतव्य से भटक गया है। भटकाव के इस दौर में धर्माचारिर्यों के एक ऐसे वर्ग का उदय हुआ है जिनके आभूषण सोने के हैं आैर आसन चांदी के। छप्पन भोगों से परिपूर्ण रसोई के साथ आधुनिक सुख सुविधाओं के तमाम साधन भी इन्हें सहज उपलब्ध हैं।

शाही स्नान के नाम पर कुं भ अब अखाड़ों संप्रदायों मतों के धर्माचार्यों के वैभव प्रदर्शन का माध्यम बन गए हैं। वाकई दुख होता है कि जो संत समाज कभी कुंभ के दौरान समाज को निर्देशित कर एक नैतिक अनुशासित और गौरवमय राष्ट्र के निर्माण का दायित्वपूर्ण कार्य करता था।

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आज उसी संत समाज के कुछ नुमाइन्दों ने कुंभ को महज दिखावटी आयोजन बना दिया है। प्रकृति के साथ समाज के व्यवहार के नियमन और नियोजन का यह चिंतन पर्व आज सिर्फ स्नान व नदियों में गंदगी बहाने वाला पर्व बनकर रह गया है।

वस्तुत: कुंभ को ठीक से जाने बगैर कुंभ उत्सव का समझदारी भरा उपयोग कर पाना असंभव है। इसलिए आइए हम सब मिलकर इस पर चिंतन और विमर्श करें। ताकि आस्था के इस अमृत पर्व की गरिमा कायम रह सके।

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