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कहानी: गांव, जवानी में वैरागी के दो बेटे हुए, शिवपाल और बुद्दुर

raghvendra

raghvendraBy raghvendra

Published on 14 Oct 2017 8:47 AM GMT

कहानी: गांव, जवानी में वैरागी के दो बेटे हुए, शिवपाल और बुद्दुर
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हरिकांत त्रिपाठी

अगहन की रात में खिली चांदनी पांच वर्षीय बालक अपने घर के आंगन में अपनी माँ के साथ खटिया पर लेटे लेटे तारों से बनी आकृतियों को बड़ी ललक से निहार रहा है। माँ ने बताया है कि लोग मरने के बाद तारे बन जाते हैं, वह कल्पना कर रहा है कि पिछले साल गांव में गुजर गये लोग कौन-कौन से तारे में तब्दील हुए हैं। तभी घर के पिछवाड़े गड़ही की दूसरी ओर दक्षिण टोले से कबीरपंथी प्रवचन की जोर जोर से आवाजें आनी शुरू हो गयीं। वैरागी स्वयं वक्ता और स्वयं श्रोता थे। वे खुद प्रश्न करते थे और खुद ही कबीरपंथी समाधान बताते थे।

बच्चे की समझ में ज्ञान की बातें नहीं आ रहीं थीं, उसने माँ से पूछा, - ये वैरागी रात भर क्यों बड़बड़ाते रहते हैं?

मां - वैरागी कुछ दिनों के लिए घर छोडक़र साधु बन गये थे और कबीरपंथी साधुओं के साथ रहा करते थे। अब फिर से गृहस्थी में वापस लौट आये हैं। जिस रात खाने को कुछ नहीं मिलता है तो उन्हें नींद नहीं आती है और वे निर्गुण बड़बड़ाते रहते हैं।

बालक को वैरागी की अनबूझ बातें लोरी की तरह सुला देती हैं। वह सबेरे जागता है तो घर की औरतें खेतों की ओर जा चुकी होतीं हैं। तब विद्या बालन की तरह सोचने वाले लोग नहीं होते थे सो गांवों में शौचालय नहीं हुआ करते थे। दरअसल लोग बाहर खेतों में शौच के लिए जाना ही उचित मानते थे, जिस घर में रहना, रसोई करना, उसी में शौचालय जाना अशौचवत माना जाता था। मेरे मित्र बाबा राम विशाल आज शौचालयों के गांवों में निर्माण के खिलाफ हैं कि वे उसी ऊपरी सतह के भूजल को प्रदूषित करते हैं जिसका प्राय: गांव वाले पीने और नहाने में उपयोग करते हैं।

बाहर बांस बंसवारी से महोख की आवाज आ रही थी - पूत पूत पूत। अब गावों में न बंसवारियां बचीं और न महोख पक्षी क्योंकि किसी मूर्ख विकास-पुरुष ने गांवों को शहर बनाने का स्वप्न देखा था। अब घर ही में शौचालय है और देर रात तक टीवी देखी जाती है सो आराम से सोकर लोग देर दिन चढ़े उठते हैं। शारीरिक श्रम और सहनक्षमता खत्म हो गयी है।

हाँ ! याद आया , मैं मुद्दे से भटक रहा था। जवानी में वैरागी के दो बेटे हुए, शिवपाल और बुद्दुर।

शिवपाल की पत्नी उन्हें छोड़ कर पता नहीं क्यों चली गयी और बुद्दुर की शादी एक अत्यंत खूबसूरत महिला से हुई। बुद्दुर अपनी पत्नी को बेहद प्यार करते थे और उसके शौक पटार को पूरा करने के लिए उन्होंने कलकत्ते के चापाकल में नौकरी कर ली थी। बुद्दुर नियमित घर को मनीआर्डर भेजते पर साल दो साल में तब ही आते जब उन्हें पता चलता कि वे एक और बच्चे के बाप बन चुके हैं। घर आने पर वे अपनी पत्नी पर बहुत नाराज होते कि उसने बिना उनकी सहभागिता के ही बच्चा क्यों पैदा कर दिया।

दिनभर काम धाम निबटाने के बाद शाम को भोला चौधरी की अध्यक्षता में तीन - चार दिनों तक पंचायत होती रहती। दोनों तरफ से मजबूत से मजबूत तर्क अपने पक्ष में रखे जाते पर कोई सहमति न बन पाती। बुद्दुर परदेसी आदमी था और वह विभिन्न धार्मिक ग्रंथों से दृष्टांत देकर अपनी पत्नी को त्यागने पर अड़ा रहता। बुद्दुर कहता कि राम ने तो सिर्फ धोबी के लांछन लगाने पर ही सीता को त्याग दिया था, यहाँ तो बिना मेरे मौजूद रहे बच्चा भी पैदा हो गया है।

चार रात लगातार सुनवाई करते ऊब चुके चौधरी ने फैसला सुनाया - देख बुद्दुर ! न तो यह त्रेता है और न तू राम की तरह राजा। तेरी पत्नी तेरे ही साथ रहना चाहती है तो तुझे उसे रखना ही पड़ेगा। बच्चा शिवपाल का और पत्नी तेरी रहेगी। क्योंकि तेरी पत्नी और शिवपाल ने समाज के नियम तोड़े हैं तो तुम दोनों भाइयों को अलग अलग बिरादरी भोज करना पड़ेगा। बुद्दुर गड़ही के कगार पर पैर लटका कर विलाप करता और उसकी पत्नी उसे समझाकर कि बिरादरी का फैसला तो मानना ही पड़ता है, संभालते हुए घर के अन्दर ले जाती है।

एक महीने तक दांपत्य-सुख का आनन्द उठाने के बाद और बिरादरी को शानदार भोज दे चुकने के बाद बुद्दुर पुन: अपनी नौकरी पर कलकत्ते वापस चले जाते और फिर थोड़ा फेरबदल के साथ इतिहास दुहराया जाने लगता है।.... मेरा गांव जाने कहाँ खो गया है...।

(लेखक रिटायर्ड आईपीएस हैं)

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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