पुलिसिया पौरुष पर उठता एक बड़ा सवाल, तो फिर कौन करेगा रक्षा

निरीह चिकित्सा सेविकाओं पर आघात करने वालों को उचित सबक सिखाने से पुलिस चूक गई। यदि पर्याप्त सुरक्षा के अभाव में अब डॉक्टर और नर्सें हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में जाने से इंकार कर दें तो ? सैकड़ों कोरोना मरीजों की कौन प्राण रक्षा करेगा?

के. विक्रम राव

भारतीय पुलिस चुनिन्दा तौर पर अपना शौर्य दर्शाती है। वर्ना उनकी क्षमावन्तता, धैर्यशीलता, निर्वेग, दरगुजर, तितिक्षु आदि बड़े मशहूर हैं। यह सब काफूर हो जाते हैं जब विरोधी राजनेताओं का जुलूस, छात्र-प्रदर्शन, श्रमजीवी की रैली, रिक्शावाले या फुटपाथी हाेकर मिल जायें तो। मगर हाल ही के कोरोनाजन्य घटनाओं में एक भिन्न नजारा दिखा। नारियों की आबरू पर तबलीगी जमात के अराजक मौलवियों ने हमला किया तो इन पुलिस वालों के मोटे सोटे कन्धों से ही सटे रहे, भुजबल उनके नितम्ब पर ही टिके रहे।

आग्नेय अस्त्र को मोरचा लग गया था। इंदौर में महिला डॉक्टरें गयीं थीं कोरोना की जाँच करने। वहीँ छिपे तबलीगी जमात के मजहबी अराजकों ने उन्हें घायल कर दिया, यदि तहसीलदार न बचाता तो मोहतरमा डॉक्टर जकिया सैय्यद तो कब्रिस्तान कूच कर गयीं होतीं। उन्हें भीड़ ने गिराकर मारा। इधर गाजियाबाद पुलिस के सामने ही तबलीगी मुसलमानों ने नर्सों के सामने लुंगी ढीली कर दी और पतलून के बटन खोल डाले तो ये सशत्र बांके निहारते रहे। लखनऊ के सदर में कुछ मिलता जुलता मंजर था।

याद दिला दूँ यह सब हुआ ऐसी भूमि पर जहाँ सिरफिरे राजकुमारों ने अपनी भाभी का दरबार में चीर हरण कराया था। तब भारत महान बन गया था, कुरुक्षेत्र की जंग हुई थी। गौर कीजिए, जलियाँवाला बाग की घटना। क्यों बर्बर हुई थी ब्रिटिश पुलिस? अमृतसर में एक ब्रिटिश स्कूल की प्राध्यापिका कुमारी मार्सेला शेरवूड साईकिल पर अपने मिशनरी स्कूली छात्राओं को सुरक्षित बचाने हेतु घूम रही थीं। तभी रोलेट एक्ट के विरोधी प्रदर्शनकारियों ने कूचा कुर्रीछान की गली में उसे मारा। कुछ भारतीयों ने इस गोरी युवती को बचाकर छावनी पहुंचा दिया। वहाँ जनरल रेजिनाल्ड डायर कमांडर था। श्वेतान्गिनी मास्टरनी पर आघात का बदला इन अश्वेतों और हिन्दुस्तानियों से लेने का संकल्प उसने तभी लिया। जनरल डायर ने उस स्थल को स्मरणीय बनाया जहाँ भारतीयों ने कुमारी मार्सेला को मारा था। उस सड़क से जो भी भारतीय गुजरता था उसे पेट के बल दो सौ गज रेंगकर (19 अप्रैल से 25 अप्रैल 1919) जाना पड़ता था।

(पूरा विवरण और सौ साल पुराना चित्र नीचे देखें।)

जनरल डायर के इस जूनून को हाउस ऑफ़ कॉमंस (लोकसभा) में भारत विषय के काबीना मंत्री एडवर्ड सैमुअल मोंटेग्यू ने निंदनीय कदम करार दिया था। उस वक्त उदार पार्टी के सर डेविड लायड जार्ज प्रधान मंत्री थे। मगर जनरल डायर के दिमाग में हमवतनी प्राध्यापिका पर बर्बर हमले के लिए आक्रोश मंडरा रहा था। तीन दिन बाद (13 अप्रैल 1919) उसने जलियाँवाला बाग के प्रदर्शनकारियों पर अमानवीय व पैशाचिक गोलीबारी करवायी थी।
परन्तु भारतीय पुलिस कानून की सीमा में तो इन तबलीगी मुसलमानों से इन सरकारी महिला अधिकारियों की अस्मत बचा सकती है। इन तबलीगी आस्थावानों को दण्डित करा सकती है। यहाँ इस विवेचन का यह कतई मन्तव्य नहीं है कि इंदौर, गाजियाबाद, लखनऊ आदि में स्थानीय पुलिस जनरल डायर जैसी पिशाची हिंसा करे। सख्त कदम तो उठा सकती थी। एक ब्रिटिश मिशनरी महिला प्राध्यापिका पर हमले का बदला जनरल डायर ने सैकड़ों निहत्थे शांतिप्रिय लोगों का जलियाँवाला बाग में संहार करके लिया। मगर निरीह चिकित्सा सेविकाओं पर आघात करने वालों को उचित सबक सिखाने से पुलिस चूक गई। यदि पर्याप्त सुरक्षा के अभाव में अब डॉक्टर और नर्सें हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में जाने से इंकार कर दें तो ? सैकड़ों कोरोना मरीजों की कौन प्राण रक्षा करेगा?

(स्रोत – General Dyer’s most infamous official statement called the ‘Crawling Order’, the Hunter Committee’s report that investigated the events leading up to the massacre, as well as exhibits on the commemoration of the incident in its aftermath. Collected materials from National Archives, New Delhi.)

‘Native crawling up street where Miss Sherwood was assaulted, 1919’
Photograph, India, 1919.

The soldiers depicted were probably from the 25th County of London Cycle Battalion. The caption refers to an incident on 10 April 1919 in Amritsar in the Punjab. Riots had broken out that day during anti-British demonstrations and several Europeans had been killed and many buildings damaged. Around 20 Indians were shot by the Army. During the unrest, Marcella Sherwood, a Church of England missionary, was set upon by a crowd as she cycled down a narrow lane. Although badly beaten she survived, but the incident outraged British opinion and helped convince them to place most of the Punjab under martial law. In the days that followed, the British made Indian men, even those who had gone to Miss Sherwood’s aid after the attack, crawl along the street as a punishment.

Three days later, thousands of unarmed protesters, as well as people out enjoying a local festival, were gathered at Jallianwala Bagh (garden) when they were fired upon without warning by Indian Army troops. Most of the people present did not know that Martial Law had been declared. The order to fire was given by Brigadier-General Reginald Dyer. The official report stated that 379 people were killed and 1200 wounded, but the true figure was much higher. The massacre was a watershed in the history of British India and helped pave the way for the growth of Gandhi’s independence movement.

K. Vikram Rao
Mobile -9415000909
E-mail –[email protected]