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निकाय चुनाव इलाहाबाद : चाबी ब्राह्मण और कायस्थ वोटरों के हाथ

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raghvendraBy raghvendra

Published on 17 Nov 2017 8:10 AM GMT

निकाय चुनाव इलाहाबाद : चाबी ब्राह्मण और कायस्थ वोटरों के हाथ
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इलाहाबाद: संगम नगरी में मेयर के चुनाव का गणित फिलहाल उलझ गया है। इस बार यहां चारों पार्टियों भाजपा, कांग्रेस, सपा और बसपा के उम्मीदवार मैदान में है। भाजपा से प्रदेश सरकार के मंत्री नंद गोपाल गुप्ता नंदी की पत्नी अभिलाषा गुप्ता सपा से पुराने समाजवादी नेता विनोद चंद्र दुबे, कांग्रेस से विजय मिश्रा और बसपा से रमेश चंद्र केसरवानी मेयर की कुर्सी हथियाने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं।

वैसे पिछले पांच साल से अभिलाषा गुप्ता ही इलाहाबाद की मेयर हैं लेकिन भाजपा के भितरघातियों की वजह से इस बार उन्हें बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस प्रत्याशी विजय मिश्रा ने पाला बदला है। पहले वह भाजपा में थे। सपा और बसपा के ही उम्मीदवार मूलत: अपनी पार्टी के हैं।

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गांव-देहात छोडक़र पहली बार शहर में घुसे ‘हाथी’ ने वैसे ‘घरदुआरी’ शुरू जरूर की है लेकिन उसके इस अभियान को वोटर पहले के चुनावों की तरह ही ले रहे हैं। यहां सपा, बसपा और भाजपा के उम्मीदवार ही मुख्य रूप से वोटों के लिए जूझते दिख रहे हैं।

अगर इलाहाबाद के वोटरों के जातीय गणित पर नजर डालें तों तकरीबन 12 लाख वोटरों वाले इस शहर में सवा दो से ढाई लाख के बीच ब्राह्मण वोटर हैं। दूसरे नंबर पर पौने दो लाख के आसपास पास मुसलमान, एक लाख 60 हजार के करीब कायस्थ और डेढ़ लाख के आसपास बनिया वोटर हैं। बाकी जातियां 25 से 50 हजार के बीच हैं। नंदी मंत्री हैं। वोटरों में उनके समर्थक तो हैं लेकिन विरोधियों की संख्या भी कम नहीं।

ऐसे में उनकी पत्नी अभिलाषा को जातीय वोटों के बीच भी मुश्किल है लेकिन जानकार बताते हैं कि मुिस्लम गोलबंदी देखते हुए वह हिंदू गोलबंदी के रास्ते पर हैं। ऐसे में अगर ब्राह्मण और कायस्थ वोटर उनकी मदद कर देंगे तभी उनकी चुनावी नाव पार जा सकती है। इन दोनों जातियों के चार लाख के करीब वोटर जिसके पाले में चले जाएंगे, वही इलाहाबाद का मेयर बनेगा लेकिन पढ़े लिखे समुदाय वाले ये वोटर जुबान खोल नहीं रहे, इसीलिए हर उम्मीदवार को मुश्किल हो रही है कि वह क्या समझे।

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भाजपा से ब्राह्मण उम्मीदवारों ने भी टिकट चाहा था और कायस्थ उम्मीदवारों ने भी लेकिन नंदी के प्रभाव में इन दोनों समुदायों का प्रभामंडल फीका पड़ गया। और अंतत: यही फैक्टर नंदी की पत्नी अभिलाषा के आंतरिक विरोध की वजह बन गया है। सपा उम्मीदवार विनोद चंद्र दुबे के साथ यही फैक्टर सकारात्मक बनता दिख रहा है। भाजपा विरोध के ही नाते मुसलमान वोटर सिर्फ और सिर्फ उसे ही अपने वोट देंगे जो अभिलाषा गुप्ता को हराता दिखेगा। लेकिन विजय मिश्रा के नाते ब्राह्मण वोटों में बंटवारे की भी आशंका कम नहीं है।

रमेश चंद्र केसरवानी का हाथी दलितों के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है लेकिन बनिया वोटरों का भी अभिनंदन करने में पीछे नहीं है। ऐसे में अभिलाषा के पक्ष में बनिया वोटर लामबंद हो जाएंगे, कहना मुश्किल है। विजय मिश्रा कांग्रेस से उम्मीदवार जरूर हैं लेकिन वह मूलत: भाजपाई हैं। वह दक्षिणी शहर में केशरीनाथ त्रिपाठी के प्रभाव का भी इस्तेमाल करने की कोशिश में हैं क्योंकि वह उन्हीं के खेमे के माने जाते हैं। लेकिन कितना कर पाएंगे, यह देखने वाली बात होगी। अगर इस चुनाव को क्षेत्रीय नजरिए से देखा जाए तो शहर दक्षिणी क्षेत्र में अभिलाषा गुप्ता

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और पश्चिमी क्षेत्र में विनोद चंद्र दुबे का प्रभाव ज्यादा है। दुबे पेशे से अधिवक्ता हैं और सामाजिक गतिविधियों में लोगों से करीब से जुड़े हुए हैं। शहर उत्तरी क्षेत्र में बनिया वोटर कम हैं। ब्राह्मण और पढ़े लिखे वोटर ज्यादा हैं। ऐसे में यहां दोनों उम्मीदवारों का प्रभाव मिला जुला है। इतना ही नहीं, इस क्षेत्र में चारों पार्टियों के उम्मीदवार अपने अपने लिए जोड़ तोड़ करते देख रहे हैं। अब वोटर 26 नवंबर को मतदान के दिन किसके पक्ष में फैसला सुनाएंगे, यह वक्त बताएगा।

अमृता त्रिपाठी

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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