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क्या सपा-बसपा 1993 वाला जादू दोहरा पाएंगे, सत्ता से दूर कर सकेंगे बीजेपी को

यूपी की राजनीति ने हमेशा देश को अचंभित होने के मौके दिए हैं। आज से 5 साल पहले तक किसी ने सोचा भी नहीं था की सपा बसपा गठबंधन कर सकते हैं। लेकिन, आज दोनों दलों ने अपने गिले शिकवे मिटा हाथ थाम लिया है। वैसे भी कहा जाता है कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है तो बीजेपी से सपा-बसपा दोनों की रार जग जाहिर है।

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RishiBy Rishi

Published on 13 Jan 2019 7:39 AM GMT

क्या सपा-बसपा 1993 वाला जादू दोहरा पाएंगे, सत्ता से दूर कर सकेंगे बीजेपी को
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लखनऊ : यूपी की राजनीति ने हमेशा देश को अचंभित होने के मौके दिए हैं। आज से 5 साल पहले तक किसी ने सोचा भी नहीं था की सपा बसपा गठबंधन कर सकते हैं। लेकिन, आज दोनों दलों ने अपने गिले शिकवे मिटा हाथ थाम लिया है। वैसे भी कहा जाता है कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है तो बीजेपी से सपा-बसपा दोनों की रार जग जाहिर है। ऐसे में उसे हराने के लिए हाथी साइकिल पर बैठ गया है। इससे पहले भी हाथी ने साइकिल की सवारी की थी। लेकिन, उसे सवारी रास नहीं आई।

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करीब 25 साल पहले क्या हुआ था

वर्ष 1993 में यूपी के विधानसभा चुनाव में देश के साथ यहां भी प्रचंड राम मंदिर लहर चल रही थी। इस लहर पर सवार थी बीजेपी। विरोधी दलों को इसकी काट के लिए हथियार नहीं खोजे मिल रहा था। तब कांशीराम और मुलायम सिंह ने गठबंधन का निर्णय लिया। ये वो दौर था जब उत्तराखंड यूपी से अलग नहीं हुआ था और सूबे में विधानसभा की कुल 422 सीटें थीं। गठबंधन के तहत सपा ने 256 सीटों पर और बसपा ने 164 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे।

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सपा को 109 सीटों पर जीत मिली। जबकि बसपा के खाते में 67 सीटें गईं। दोनों दलों ने 176 सीटों पर कब्जा किया। वहीं बीजेपी को 177 सीटें मिली थीं। सपा-बसपा को 29.06 फीसदी वोट मिला। वहीं बीजेपी को 33.3 फीसदी वोट हाथ लगा था। लेकिन कुछ छोटे दलों के साथ मिलकर सरकार सपा और बसपा की बनी।

बीजेपी के रणनीतिकारों को टेंशन में क्यों होना चाहिए

आपको याद होगा 2014 लोकसभा चुनाव में यूपी में बीजेपी ने 71 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। सहयोगी अपना दल को 2 सीट मिली जबकि सपा को 5 और कांग्रेस के हाथ दो सीटें लगी वहीं बसपा का खाता भी नहीं खुला था।

2014 में बीजेपी और अपना दल को 43.63 फीसदी वोट मिला। जबकि सपा बसपा को 42.12 फीसदी वोट मिला था। अब जबकि सपा बसपा बंधन में बंध चुके हैं तो मत विभाजन के नजरिए से सूबे की 41 सीटें ऐसी हैं, जहां बीजेपी पीछे खाड़ी नजर आती है।

पहले कांग्रेस थी निशाने पर अब बीजेपी !

2014 लोकसभा चुनाव में जैसा रोष कांग्रेस और छोटे दलों के लिए मतदाताओं में था। वो फिलहाल नजर नहीं आ रहा। कुछ लोग ये कह सकते हैं कि मध्य प्रदेश राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ वोट हुआ और बीजेपी हार गई, तो ऐसा नहीं है, ये रोष स्थानीय सरकारों के लिए था। दूसरी बात ये की लोकसभा चुनाव देश के मुद्दों पर लड़ा जाता है उसमें स्थानीय मुद्दे हावी नहीं होते।

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विधान सभा चुनाव में क्या हुआ

2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 384 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 312 पर जीत दर्ज की। अपना दल और एसबीएसपी 19 सीटों पर लड़ी 13 पर जीत हासिल की। वहीं यदि बसपा की बात करें तो 403 सीटों पर चुनाव लड़ा और 19 पर जीत हासिल की। सपा ने 311 पर चुनाव लड़ा और 47 पर कब्ज़ा जमाया। रालोद को भी इसमें जोड़ते हैं तो उसने 277 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे और सिर्फ एक सीट हासिल की। जबकि कांग्रेस ने 114 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे और 7 सीटों पर ही उसे जीत नसीब हुई।

क्यों है खतरा

अब यदि इस लोकसभा चुनाव में बीजेपी, अपना दल और एसबीएसपी का कुल वोट शेयर 41.35 फीसदी रहता है और सपा बसपा का वोट शेयर 44.05 प्रतिशत रहता है तो बीजेपी के लिए खतरे की घंटी क्या घड़ियाल बज उठा है। ये बात शायद बीजेपी के रणनीतिकारों को भी समझ आ चुकी है, इसलिए उन्होंने पूर्वोत्तर, उड़ीसा और दक्षिण भारत में पीएम मोदी की अधिकाधिक रैली और सभाओं का इंतजाम किया है, ताकि यूपी के नुकसान की भरपाई उधर से हो सके।

मोदी के लिए अपने को साबित करने की चुनौती

ये लोकसभा चुनाव बीजेपी नहीं बल्कि पीएम नरेंद्र मोदी के लिए कसौटी साबित होने वाले हैं। क्योंकि विपक्ष के नाम पर कुछ है नहीं, जनता के सामने देश के अलग अलग हिस्सों में छोटे दलों का गठबंधन वोट मांगने के लिए खड़ा है। ये गठबंधन भले ही बीजेपी की राजनीति का विरोध करने के लिए बनें हो लेकिन इसके पास कोई भी सर्वमान्य नेता नहीं है पीएम पद के लिए। दूसरी बात ये की ये सभी जातीय समीकरणों को लेकर बनाए गए हैं, यदि यूपी की बात करें तो सपा-बसपा यामुद (यादव, मुस्लिम, दलित) के सहारे मैदान में है। उसने कांग्रेस को अपने गठबंधन का हिस्सा इसलिए नहीं बनाया क्योंकि उसके पास यूपी में अपना कहने को कोई वोट बैंक नहीं है। कुछ सर्वे जो अभी सामने आए हैं उनके मुताबिक देश में जो भी छोटे दल एक साथ खड़े हैं। वो संयुक्त रूप से यदि एक झंडे के नीचे आते हैं तो ही बीजेपी को बड़ा नुकसान देने की हैसियत में होंगे। वर्ना, बीजेपी को नुकसान तो होगा लेकिन इतना नहीं की वो सरकार ना बना सके।

एक झंडे के नीचे आना चाहिए विपक्ष को

विपक्षी दलों को अपने मतभेदों को मिटा एक साथ आगे आना चाहिए। अपना पीएम दावेदार प्रस्तुत करना चाहिए। एकजुट हो बीजेपी के खिलाफ मोर्चा बना चुनाव लड़ना चाहिए तभी मतदाता उन्हें विकल्प मानेंगे।

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आशीष शर्मा ऋषि वेब और न्यूज चैनल के मंझे हुए पत्रकार हैं। आशीष को 13 साल का अनुभव है। ऋषि ने टोटल टीवी से अपनी पत्रकारीय पारी की शुरुआत की। इसके बाद वे साधना टीवी, टीवी 100 जैसे टीवी संस्थानों में रहे। इसके बाद वे न्यूज़ पोर्टल पर्दाफाश, द न्यूज़ में स्टेट हेड के पद पर कार्यरत थे। निर्मल बाबा, राधे मां और गोपाल कांडा पर की गई इनकी स्टोरीज ने काफी चर्चा बटोरी। यूपी में बसपा सरकार के दौरान हुए पैकफेड, ओटी घोटाला को ब्रेक कर चुके हैं। अफ़्रीकी खूनी हीरों से जुडी बड़ी खबर भी आम आदमी के सामने लाए हैं। यूपी की जेलों में चलने वाले माफिया गिरोहों पर की गयी उनकी ख़बर को काफी सराहा गया। कापी एडिटिंग और रिपोर्टिंग में दक्ष ऋषि अपनी विशेष शैली के लिए जाने जाते हैं।

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