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निकाय चुनाव मेरठ : मुसलमान मतदाता तय करेंगे महापौर

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raghvendraBy raghvendra

Published on 17 Nov 2017 7:52 AM GMT

निकाय चुनाव मेरठ : मुसलमान मतदाता तय करेंगे महापौर
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मेरठ। निकाय चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनैतिक राजधानी माने जाने वाला मेरठ राजनीति का बड़ा केंद्र बन गया है। मेरठ समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश में होने वाली हर सियासी गतिविधि का असर दूर तक जाता है। यही वजह है कि मेरठ समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश की लडाई में भाजपा के साथ ही सपा,बसपा,कांग्रेस और रालोद ने पूरी ताकत झोंक रखी है। मेरठ में 22 नवम्बर को चुनाव होने के कारण सबका ध्यान इस समय मेरठ पर अधिक है।

मेरठ में इस बार बसपा के सिंबल पर खड़ा होने के कारण पिछले चुनावों की तरह दलितों के भाजपा में जाने की संभावना कम ही बताई जा रही है। ऐसे में मुसलमान मतदाता निर्णायक हो गए हैं। क्योंकि पहली बार चुनाव में आरक्षण के चलते कोई मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव मैदान में नही है। ऐसे में भाजपा जहां मुस्लिम मतों के बंटवारे पर ध्यान लगाये है तो बसपा और सपा मुसलमानों को अपने पक्ष में करने की जीतोड़ कोशिश में लगी है।

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जाहिर है कि मुसलमानों का झुकाव जिस पार्टी की तरफ हुआ उस पार्टी का पक्ष मजबूत हो जायेगा। लेकिन बिखराव की स्थिति में एक बार फिर बाजी भाजपा के हाथ लग सकती है। करीब 15 लाख की आबादी वाले मेरठ नगर निगम में करीब 3 लाख वोटों में से करीब सवा लाख मुस्लिम वोट हैं। करीब 90 हजार वैश्य और ब्राह्मण तथा 25 हजार दलित वोट हैं।

मेरठ में भाजपा,सपा और बसपा के बीच मुकाबला दिख रहा है। कांग्रेस की भूमिका यहां वोट कटवा के अलावा और कुछ नही है। भाजपा ने प्रदेश उपाध्यक्ष कांता कर्दम को मेयर प्रत्याशी बनाया है। मेरठ में प्रदेश उपाध्यक्ष होने के नाते पार्टी का मानना है कि यहां पर जरा सी भी चूक आगे की राजनीति पर असर डालेगी। मेरठ में सासंद के साथ ही सात में छह सीट पर भाजपा के विधायक हैं। खुद अभी तक मेयर हरिकांत अहलूवालिया भी बीजेपी के थे। इससे पहले भी भाजपा की ही मधु गुर्जर मेयर रहीं थी। यानी पिछले दस साल से मेरठ में मेयर पद पर भाजपा काबिज रही है।

बसपा की तरफ से पूर्व विधायक योगेश वर्मा की पत्नी सुनाता वर्मा मैदान में है। जबकि वाल्मीकी समाज की दीपू मनोठिया सपा की तरफ से ताल ठोक रही हैं। कांग्रेस ने भी यहां वाल्मीकी उम्मीदवार ममता सूद को मैदान में उतारा है। वाल्मीकी क्योंकि भाजपा का वोट बैंक माना जाता है। इसलिए माना यही जा रहा है कि भाजपा को नुकसान पहुंचाने के लिए ही कांग्रेस ने अपना वाल्मीकी उम्मीदवार उतारा है।

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आप की उम्मीदवार नीलम राठौर का नामांकन उम्र कम होने के कारण रदद हो चुका है। मेरठ के चुनाव के बारे में कहा जाता है कि यहां आखरी समय में सारे मुद्दे हवा हो जाते हैं । यानी मतदान के दिन सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हो जाता है। मेरठ में दलित और मुसलमान काफी हद तक चुनाव को प्रभावित करते हैं। 2000 के चुनाव में बसपा के शाहिद अखलाक दलित-मुस्लिम समीकरण के आधार पर ही जाते थे।

2004 में यग समीकरण टूटा और दलित हिन्दू ध्रुवीकरण के चलते भाजपा की तरफ गये तो भाजपा की कमजोर मानी जाने वाली मधु गुर्जर चुनाव जीत गई। इसी तरह 2012 में कमजोर उम्मीदार माने जाने वाले भाजपा के हरिकांत अहलूवालिया हिन्दू ध्रुवीकरण के चलते चुनाव जीत गये थे। यही वजह है कि भाजपा की यहां कोशिश हिन्दू ध्रुवीकरण करने की रही है। क्योंकि इसका सबसे बड़ा फायदा भाजपा को ही जीत के रुप में मिलता है।

जाहिर है कि यहां यह भी कहना गलत नही होगा की यह स्थिति अकेले मेरठ की नही बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तमाम जिलों की है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पिछला लोकसभा और विधानसभा चुनाव भाजपा हिन्दू सांप्रदायिक लहर के चलते ही जीती थी।

अपनी सियासत के बुरे दौर से गुजर रहे बसपा और रालोद पहली बार सिंबल पर मैदान में उतरे हैं। दोंनो ही इस चुनाव के माध्यम से 2019 लोकसभा चुनाव के लिए नया जोश भरने की कोशिश में जुटे हैं। वहीं 2019 के मद्देनजर भाजपा के लिए भी यह चुनाव कम महत्वपूर्ण नही है। भाजपा के लिए चुनाव कितना महत्वपूर्ण है इसका पता इसी बात से चलता है कि इस क्षेत्र में भाजपा के पक्ष में चुनावी माहौल बनाने के लिए संघ के नेताओं के साथ ही योगी सरकार के तमाम मंत्री और दूसरे दिग्गज नेता भी प्रचार युद्ध में उतरे हैं।

खुद सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 18 नवम्बर को यहां आ रहे हैं। मेरठ में भाजपा के मेयर उम्मीदवार के पक्ष मे मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी की जनसभा 18 नवंबर को होगी। इसके अलावा प्रभारी मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह, गन्ना मंत्री सुरेश राणा, पूर्व केद्रीय मंत्री संजीव बलियान, किसान मोर्चा के पूर्व अध्यक्ष विजयपाल सिंह तोमर, पूर्व प्रदेशाध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी, के अलावा पूर्व सासंद, पूर्व विधायकों संग प्रदेश पदाधिकारी विजय बहादुर पाठक, अश्वनी त्यागी, व्यापार प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष विनीत अग्रवाल शारदा आदि पूरी फौज को लगाया गया है।

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सपा की तरफ से अखिलेश यादव,बसपा की तरफ से मायावती,कांग्रेस की तरफ से प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर,फिल्म अभिनेत्री नगमा और रालोद की तरफ से जयंत चौधरी मेरठ में अपनी-अपनी पार्टी के उम्मीदवारों के पक्ष में जनसभाएं करेंगे।

जैसा कि होता है इस चुनाव में भी भाजपा समेत सभी पार्टियों में अंदरुनी घमासान है। भाजपा क्योंकि इस समय सबसे बड़ी पार्टी है इसलिए भाजपा में अंदरुनी घमासान दूसरे दलों के मुकाबले अधिक दिख रहा है। हालांकि भाजपा समेत सभी दल पार्टी के भीतर उठ रही बगावत की लपटों को बुझाने की कोशिश में लगे हुए हैं।

भाजपा द्वारा जारी 14 पेज के संकल्प पत्र में जिस तरह मेरठ समेत पश्चिमी उत्तर प्रदेश के के लिए खास कुछ नही है उसने भी स्थानीय भाजपा नेताओं को परेशान कर रखा है। बता दें कि निकाय चुनाव के लिए जारी भाजपा के संकल्प पत्र में न तो मेरठ में मेट्रो चलने की बात कही गई है और न ही सहारनपुर को हेलीकाप्टर सेवा से धार्मिक स्थानों को जोडऩे की बात का उल्लेख है। इस संकल्प पत्र में जिन शहरों में मेट्रो चलने की बात कही गई है उनमें नोएडा में मेट्रो विस्तार पहले ही चल रहा है। जहां तक गाजियाबाद की बात है तो वहां भी मेट्रो कई साल से संचालित हो रही है।

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मेरठ के अब तक के मेयर

  • 1988-89 स्व0 अरुण जैन(चुनाव अप्रत्यक्ष,पार्षदों ने किया था निर्दलीय)
  • 1995 अय्यूब अंसारी(चुनाव प्रत्यक्ष) बसपा
  • 2000 शाहिद अखलाक(चुनाव प्रत्यक्ष) बसपा
  • 2006 मधु गुर्जर भाजपा
  • 2012 हरिकांत अहलूवालिया भाजपा

सुशील कुमार

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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