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दिल्ली विधानसभा चुनाव का सबसे सटीक विश्लेषण, पढ़िये यहां

दिल्ली के दिलवालों के दिल में केजरीवाल की झाडू बसी दिखी। केजरीवाल की मुहल्ला क्लीनिक, सरकारी स्कूलों में अच्छे फर्नीचर कंप्यूटर और स्मार्ट बोर्ड, शिक्षकों को सिंगापुर ले जाकर पठन पाठन की अच्छी विधियों से अवगत कराना, मुफ्त 200 यूनिट बिजली- बीस हजार लीटर पानी, महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा, बुजुर्गों को चारों धाम यात्रा कराने का काम काम आया।

SK Gautam

SK GautamBy SK Gautam

Published on 11 Feb 2020 3:54 PM GMT

दिल्ली विधानसभा चुनाव का सबसे सटीक विश्लेषण, पढ़िये यहां
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योगेश मिश्र

मैं दिल्ली हूं। महाभारत काल से लेकर ब्रिटिश युग तक मैंने देश के हर संघर्ष को काफी करीब से देखा है। मेरा दिल यह जानता है कि मुझ पर राज करने वालों को पहले मेरे शहर के लोगों का दिल जीतना होता है। मैंने ही जलालुद्दीन को अकबर बनाया। मैंने ही लोगों को हर धर्म के प्रति सजदा करना सिखाया।

महाभारत काल में मैं इंद्रप्रस्थ बनी

मुझे पाने की हसरत राजघरानों के प्रतापी राजाओं से शुरू हुई। आज तक जारी है। क्या राजा और क्या सियासतदां। मेरा वजूद ही सत्ता के लिए हुआ। तभी तो महाभारत काल में मैं इंद्रप्रस्थ बनी। मुझ पर कब्जे की हसरत ने ही महाभारत करवाई। पुरातात्विक प्रमाण भी मेरे इस दावे की हामी भरते हैं। यह भी साबित हो चुका है कि ईसा से दो हजार वर्ष पहले भी दिल्ली तथा उसके आस-पास मानव निवास करते थे। मौर्य-काल से यहाँ एक नगर का विकास होना आरंभ हुआ।

दिल्ली को इन्होंने बसाया बनाया

दिल्ली के अंतिम हिंदू सम्राट महाराज पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि चंद बरदाई की हिंदी रचना पृथ्वीराज- रासो में तोमर राजा अनंगपाल को दिल्ली का संस्थापक बताया गया है। ऐसा माना जाता है कि उसने ही ‘लाल-कोट’ का निर्माण करवाया था। महरौली के गुप्त कालीन लौह-स्तंभ को दिल्ली लाया।

तोमर राजाओं ने 900-1200 ईस्वी के शासन काल में मुझे संवारा सजाया। मेरा नाम दिल्ली कैसे पड़ा यह भी दिलचस्प है। ‘दिल्ली’ या ‘दिल्लिका’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम उदयपुर में प्राप्त शिलालेखों पर पाया गया। इस शिलालेख का समय 1170 ईं निर्धारित किया गया।

कुछ कहते हैं मेरा नाम राजा ढिल्लु से सम्बन्धित है। कुछ इतिहासकारों का यह मानना है कि यह देहली का एक विकृत रूप है, जिसका हिन्दुस्तानी अर्थ है- ‘चौखट’। यह सम्भवतः सिन्धु-गंगा समभूमि के प्रवेश-द्वार होने का सूचक है। एक और अनुमान है मेरा प्रारम्भिक नाम ढिलिका था। हिन्दी.प्राकृत ढीली भी इस क्षेत्र के लिए प्रयोग किया जाता था।

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दिल्ली बनती बिगड़ती रही

मैं यानी दिल्ली सलतनत वंश के राजाओं की राजधानी बनी। खिलजियों , तुगलकों, सैयदों और लोधियों ने मेरे जरिये पूरे देश में झंडे गाड़े। मैं यानी दिल्ली सात बार उजड़ी। विभिन्न स्थानों पर बसी। आधुनिक दिल्ली मे इसके अवशेष मौजूद हैं।

मुगल बादशाह हुमायूँ ने सरहिंद युद्ध में अफगानों को पराजित कर बिना विरोध मुझे हासिल किया। मैं मुगलों की राजनीति की गवाह बनीं। बस बीच में हुमायूँ की मृत्यु के बाद हेमू विक्रमादित्य ने मुगल सेना को पराजित कर आगरा व मुझ पर अधिकार कर लिया।

अकबर ने मुझसे मुंह मोड़ कर आगरा का रुख किया। पर उसके पोते शाहजहाँ (1628-1658) ने सत्रहवीं सदी में मुझे सातवीं बार बसाया। शाहजहाँनाबाद का नाम दिया। आजकल का पुराना शहर या पुरानी दिल्ली यही है। यही 1638 के बाद मुगल सम्राटों की राजधानी रही।

मैनें अंग्रेजों का जुल्म भी देखा है

मैनें अंग्रेजों का जुल्म भी देखा है। वर्ष 1857 की आजादी की पहली लडाई भी। वर्ष 1857 के बाद दिल्ली पर ब्रिटिश शासन के हुकुमत में शासन चलने लगा। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने लगभग पूरे भारत को अपने कब्जे में ले लिया। इन लोगों ने कोलकाता को अपनी राजधानी बनाया।

वर्ष 1911 में मुझे वापस राजधानी बनाया। पुरानी दिल्ली के दक्षिण नई दिल्ली बसायी। वजह यह, कि ब्रिटिश शासन काल के अंतिम दिनों मे पीटर महान के नेतृत्व में सोवियत रूस का प्रभाव भारतीय उपमहाद्वीप मे तेजी से बढ़ा। अंग्रेजों को लगा कि भारत के धुर पूरब के कोलकाता से अफगानिस्तान एवं ईरान आदि पर सक्षम तरीके से नियंत्रण नहीं हो सकता है। यानी अब तो आप समझ गये होंगे कि मैं ही राजघरानों की महबूबा हूं और मैं ही मोहब्बत।

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आसानी से नहीं हाथ आती दिल्ली

हर कोई मुझे जीतना चाहता है, लेकिन मैं दिल्ली हूं.. आसानी से हाथ नहीं आऊंगी। यही वजह कि मुझ पर कब्जे की इस सबसे नयी लडाई में साम, दाम, दंड, भेद सब कुछ दांव पर लगा। मेरा आकार छोटा है। मेरा संदेश काफी बडा है। मोदी के राजसूय को रोकने की लडाई भी पिछली बार और इस बार हस्तिनापुर में ही लडी गयी।

दिल्ली के दिलवालों के दिल में केजरीवाल की झाडू बसी दिखी। केजरीवाल की मुहल्ला क्लीनिक, सरकारी स्कूलों में अच्छे फर्नीचर कंप्यूटर और स्मार्ट बोर्ड, शिक्षकों को सिंगापुर ले जाकर पठन पाठन की अच्छी विधियों से अवगत कराना, मुफ्त 200 यूनिट बिजली- बीस हजार लीटर पानी, महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा, बुजुर्गों को चारों धाम यात्रा कराने का काम काम आया।

परिपक्व राजनेता बनकर उभरे केजरीवाल

दिल्ली के इस चुनाव में अरविंद केजरीवाल एक परिपक्व राजनेता बनकर उभरे उन्होंने नरेंद्र मोदी अमित शाह पर कोई सीधा हमला नहीं किया। चुनाव को राष्ट्रीय मुद्दों पर नहीं जाने दिया। जब भाजपा ये उम्मीद जता रही थी कि वह शाहीन बाग जाएंगे तब वह हनुमान मंदिर चले गए। मीडिया पर हनुमान चालीसा पढ़ने लगे। उन्होंने पूरे प्रचार को पाजिटिव रखा विकास के मुद्दे और जनहित के मामले पर समर्थन मांगा।

मोदी हमारे भी प्रधानमंत्री हैं- केजरीवाल

पाकिस्तान के मंत्री फव्वाद चौधरी ने अपने एक ट्वीट में आप के पक्ष की बात की और नरेंद्र मोदी पर व्यंग कसा तब केजरीवाल ने फव्वाद को न केवल नसीहत दी बल्कि यह भी साफ किया कि मोदी हमारे भी प्रधानमंत्री हैं। देश के सवाल पर पाकिस्तान की घुसपैठ बर्दाश्त नहीं।

राष्ट्रवाद को केजरीवाल कुछ इस तरह एड्रेस कर रहे थे भारतीय जनता पार्टी के नेता प्रवेश वर्मा, अनुराग ठाकुर और प्रकाश जावडेकर केजरीवाल पर नकारात्मक टिप्पणियां करके उनका कद उसी तरह बढ़ा रहे थे जिस तरह गुजरात का मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी पर टिप्पणी कर सोनिया गांधी उनका कद बढ़ा देती थीं।

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भाजपा के लिए बहुत बड़ा संदेश

भाजपा के लिए संदेश यह है कि प्रदेश के चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाएंगे सीएए, 370, शाहीनबाग, राममंदिर, तीन तलाक जैसे राष्ट्रीय मुद्दे नरेंद्र मोदी के लिए लोकसभा चुनाव में विजय का ब्रह्मास्त्र बन सकते हैं लेकिन राज्यों के चुनाव में इनके लिए जगह नहीं है।

जब भी किसी राज्य सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान न हो तब उसके सामने लड़ने के लिए एक चेहरा होना जरूरी होता है। जब भाजपा के पास डा. हर्षवर्धन और विजय गोयल जैसे चेहरे थे तब उसने मुख्यमंत्री का कोई चेहरा पेश न करके बड़ी गलती की। मनोज तिवारी का नाम प्रभारी हरजिंदर पुरी ने थोड़ी दूर तक तो चलाया पर उसे ऐसी लत्ती लग गई कि खुद मनोज तिवारी भी पूरे चुनाव भर नहीं उठ पाए।

उत्तर प्रदेश में भी भाजपा बिना कोई चेहरा सामने रख के चुनाव लड़ी थी पर वहां तत्कालीन समाजवादी पार्टी के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान था। लेकिन दिल्ली में आप के खिलाफ ऐसा माहौल नहीं था। दिल्ली में मुख्यतः उत्तर प्रदेश और बिहार से बसे लोग सिख, दलित, मुसलमान और वैश्य मतदाताओं की बहुलता है लेकिन पूरे चुनाव में भाजपा ने मनोज तिवारी को उतारकर यह गलती कर दी कि उसकी नजर उत्तर प्रदेश और बिहार से आकर बसे लोगों पर ज्यादा है।

उत्तर प्रदेश और बिहार से आकर दिल्ली में बसे लोगों की तादाद तकरीबन 32 फीसदी

उत्तर प्रदेश और बिहार से आकर दिल्ली में बसे लोगों की तादाद तकरीबन 32 फीसदी है। लेकिन आप ने इन इलाके के दस लोगों को टिकट देकर यूपी-बिहार का कोई बड़ा चेहरा विधानसभा में साथ न होने की खूब ठीक से भरपाई कर दी।

अकाली दल से आगा पीछा के चलते सिख खुलकर भाजपा के पक्ष में सामने नहीं आ पाए। अरविंद केजरीवाल खुद वैश्य समाज से आते हैं इसलिए भाजपा के पारंपरिक मतदाता कहे जाने वाले वैश्यों ने खुद को भाजपा से अलग कर लिया। मुस्लिम मतदाताओं की भाजपा वैसे भी पसंद नहीं है। जब शाहीन बाग चल रहा हो तब तो यह साफ ही होना चाहिए ध्रुवीकरण जीतने वाली पार्टी के पक्ष में होगा।

12 सीटें सुरक्षित हैं। ओखला, बलिमारन, मटिया महल, चांदनी चौक, सीलमपुर और मुस्तफाबाद आदि सात ऐसी सीटें हैं जो मुस्लिम बाहुल्य हैं। भाजपा का कॉडर आप की वालेन्टियर से पिछड़ गया। परसेप्शन की लड़ाई में भाजपा केजरीवाल से काफी दूर रह गई भाजपा के रणनीतिकारों को यह समझ में नहीं आ पाया कि कांग्रेस पार्टी ने खुद को पूरे इलेक्शन में एक रणनीति के तहत विदड्रा कर रखा है ताकि लडाई आमने सामने की बन जाए।

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भाजपा को यह समझ में भी नहीं आ पाया कि लोकसभा चुनाव में भले ही बेहतर प्रदर्शन किया हो विपक्ष उसके सामने ठहरने की स्थिति में न रहा हो पर राज्य के चुनाव में ऐसा नहीं होगा।

छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, दिल्ली की पराजय से भाजपा को यह सबक लेना चाहिए कि मोदी का नाम और मोदी का काम राज्यों में नहीं चलेगा क्योंकि जनता इतनी चतुर सुजान है कि वह जानती है राज्य में नरेंद्र मोदी के जो नुमाइंदे हैं वह मोदी की तरह काम नहीं करते। हरियाणा, झारखंड के नतीजे यह संदेश देते हैं कि राज्यों में उनके मुख्यमंत्री जनता से दूर हैं।

सात साल सरकार में रहने के बावजूद सत्ता विरोधी रुझान का न हो पाना, क्षेत्रीय दल होने के बावजूद दो बार पचास फीसदी से अधिक वोट जुटाना तथा एक राज्य में सत्तारूढ़ रहते हुए दूसरे राज्य में पहली बार में ही 23 फीसदी वोट पाकर मुख्य विपक्षी दल बनना भी एक बड़ी उपलब्धि कही जाएगी। आप को यह उपलब्धि पंजाब में हासिल है। 2012 में आम आदमी पार्टी का गठन हुआ और इस पार्टी के गठन में सारे गैरराजनीतिक लोग थे।

इन सब के लिए भी संदेश

कांग्रेस के लिए संदेश यह है कि उसकी रणनीति और उसके चेहरे गए जमाने की बात हो गए हैं। कांग्रेस की रणनीति के गलत होने के कई प्रमाण है। कांग्रेस को ड्रांइग रूम पालिटिक्स के रोग को दूर करना होगा।

आप के रणनीतिकार प्रशांत किशोर के लिए संदेश यह है कि उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस का गठबंधन कराने के बाद उनके खाते आयी बड़ी असफलता के बावजूद उनका शेयर सूचकांक गिरने वाला नहीं है।

चुनाव आयोग के लिए संदेश यह है कि उनकी ईवीएम भी केजरीवाल के साथ जीत गई है। उसकी विश्वसनीयता पर उठने वाले सवाल बंद हो गए हैं। बहरहाल, राजनीति में संदेशों का महत्व है। दिल्ली के संदेश बहुत हैं। अब जो इन्हें समझेगा कि वही देश पर राज करेगा। दिल्ली यूं ही देश का दिल नहीं कही जाती।

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दिल्ली विधानसभा चुनाव के पिछले आंकड़े ये कहते हैं

2015 के विधानसभा चुनाव में आप को 67 सीटें और 54.3 फीसदी वोट मिले थे। जबकि भाजपा को 3 सीटों के साथ 32.3 फीसदी वोट हाथ लगे थे। कांग्रेस को वोट तो 9.7 फीसदी मिले थे पर एक भी सीट हाथ नहीं लगी। इसके पहले के 2013 के विधानसभा चुनाव में आप को 29.5 फीसदी वोट और 34 सीटें मिलीं। भाजपा को 34 फीसदी वोट और 28 सीटें। कांग्रेस को 24.6 फीसदी वोट और 8 सीटें हाथ लगी।

2014 के लोकसभा चुनाव में आप को 32.9 फीसदी वोट तो मिले लेकिन खाता भी नहीं खुला। यही नहीं, कांग्रेस को भी 15.2 फीसदी वोट मिले और उसका भी खाता नहीं खुला। भाजपा ने 46.4 फीसदी वोट पाकर सभी सात की सातों सीटें हथिया ली।

2019 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने सातों सीटें जीतीं। लेकिन उसका वोट बढ़कर 56.6 फीसदी हो गया। आप और कांग्रेस का खाता नहीं खुला। लेकिन इन्हें क्रमशः 18 और 22.5 फीसदी वोट मिले।

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