गोली का गम, मस्जिद बचाने की खुशी : क्यों आई नेताजी जी को पुरानी याद  

Published by Newstrack Published: January 26, 2016 | 5:08 pm
Modified: February 1, 2016 | 3:08 pm
लखनऊ : समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने मस्जिद को बचाने के लिए 1990 में कारसेवकों पर गोलियां चलाने वाला बयान फिर दिया है। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने गोली चलाने की घटना पर अफसोस जताया है। सपा प्रमुख कई बार इस बारे में अपनी सफाई दे चुके हैं।
झोली में आए थे मुस्लिम वोट
कारसेवकों पर फायरिंग के बाद मुस्लिम वोट मुलायम की झोली में आ गिरा था। उन्हें ‘मुल्ला मुलायम’ कहा जाने लगा था। यादव वोट तो पहले से ही उनके पास था। इसी के बाद यूपी की राजनीति में मुसलमान-यादव (माई) समीकरण बना था। दोनों के एकमुश्त वोट मुलायम के लिए सत्ता की चाबी थे।
जातीय लामबंदी की कोशिश 
अब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं। मुलायम ने भी जातीय समीकरण के हिसाब से कल-पुर्जे कसने शुरू कर दिए हैं। राजनीतिक हलकों में रविवार को मुलायम के दिए बयान के कई मायने निकाले जा रहे हैं।
वोटरों को साधने का प्रयास 
राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि मुस्लिम मतदाताओं पर मुलायम की अब पहले जैसी पकड़ नहीं रह गई।  मुलायम ने रविवार को कर्पूरी ठाकुर की जयंती पर दिए बयान में कहा कि मस्जिद बचाने के लिए कारसेवकों पर फायरिंग आवश्यक थी, लेकिन उन्हें 21 लोगों के मारे जाने का अफसोस है। हालांकि उन्होंने अपने बयान से मुस्लिम मतदाताओं को भी खुश करने की कोशिश की है। साथ ही अफसोस जताकर हिंदुओं को भी लुभाने का प्रयास किया है।
बीजेपी हुई आक्रामक 
मुलायम के इस बयान पर भाजपा एक बार फिर उन पर आक्रामक हुई और माफी मांगने को कहा। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेयी कहते हैं कि अफसोस जताने से कुछ नहीं होगा। मुलायम को अपने किए पर माफी मांगनी चाहिए।
ये था मामला 
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए अक्टूबर 1990 में बड़ी संख्या में कारसेवक पहुंचे। उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें रोकने की कोशिश की फिर भी कारसेवक हजारों  संख्या में आगे बढ़े। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने गोली चलाने का आदेश दिया। 30 अक्तूबर और दो नवंबर को फायरिंग में सरकारी आंकड़ों के अनुसार फायरिंग में  21 लोग मारे गए थे।
 
अब क्या कहा मुलायम ने 
 रविवार को मुलायम ने कहा, “अयोध्या में कारसेवकों पर फायरिंग करवाने का मुझे दुख है। लेकिन, धर्मस्थल को बचाना जरूरी था। पार्लियामेंट में तत्कालीन नेता विपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने इस घटना का जिक्र किया था। मैंने उन्हें यह जवाब दिया था कि धर्मस्थल बचाने के लिए गोली चलाई गई थी। मस्जिद बचाने में और भी जानें जातीं, तब भी मैं पीछे नहीं हटता। इसीलिए बाद में मैंने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दिया था।”

 

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