शराबबंदी मुद्दा नहीं जिस पर आंदोलन हो, पहले बिहार संभालें नीतीश

Published by Published: May 15, 2016 | 7:07 pm
Modified: May 17, 2016 | 8:36 pm

फाइल फोटो

लखनऊ: बिहार विधानसभा चुनाव में शानदार जीत के बाद सीएम बने और राष्ट्रीय राजनीति में आने का सपना पाले नीतीश कुमार को ये गुमान नहीं था कि 6 महीने में ही इतनी बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा। केंद्र को घेरने वो 12 मई को पीएम नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में थे तो शराब बंदी को लेकर15 मई को लखनऊ आए और सीएम अखिलेश यादव को पूरे यूपी में शराब बंद करने की नसीहत दे डाली।

बिहार में चुनाव जीतने के बाद नीतीश के पक्ष में वोट डालने वालों को भी ये अंदेशा था कि राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव का साथ मिलने के बाद क्या कानून-व्यवस्था की हालत उनके पहले शासन की तरह रह पाएगी। बीजेपी के साथ नीतीश की सरकार में बिहार की कानून-व्यवस्था बेहतर थी और अपराधियों के हौसले पस्त थे। निवेशक बिहार में आने के बारे में सोचने लगे थे।
गया में आदित्य सचदेवा की हत्या के बाद सीवान में एक राष्ट्रीय दैनिक के संवाददाता राजदेव रंजन का सरेराह मर्डर और ठीक उसके दूसरे दिन मुगलसराय से बक्सर जाने वाली ट्रेन में एक सिपाही की हत्या और दूसरे को गोली मारकर घायल कर देने की घटना सामने आई।इन तीनों हत्याओं ने बिहार की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठा दिए। दरअसल, तीनों हत्याएं महज आपराधिक घटना नहीं हैं। खासकर आदित्य और पत्रकार की हत्या में सत्ता में शामिल जदयू और राजद के नेता साफ तौर शामिल नजर आ रहे हैं। हत्यारे सिपाहियों की रायफल भी लूट ले गए।
आदित्य की हत्या में जदयू एमएलसी का बेटा शामिल है जिसे गिरफ्तार किया जा चुका है तो पत्रकार हत्या में राजद के एक बाहुबली जेल में बंद सांसद का नाम आ रहा है। पत्रकार पर तो खतरे के बादल उसी दिन से मंडराने लगे थे जब उन्होंने मंत्री अब्दुल बारी और जेल में बंद सांसद शहाबुद्दीन की जेल में मुलाकात का वीडियो जारी कर दिया था।
राजद के सांसद तसलीमुद्दीन मानते हैं कि हाल की घटना चिंता की बात है। विपक्ष यदि जंगलराज की बात करता है तो ये मानिए कि ‘महाजंगल राज’ है। कानून-व्यवस्था पर सवाल तो नीतीश की पार्टी के सीनियर नेता रघुवंश प्रसाद सिंह भी उठा रहे हैं।
नीतीश को तुरंत साबित करना होगा कि लालू यादव के साथ आने पर भी ‘गुड गवर्नेस’ का उनका एजेंडा पटरी से उतरा नहीं है। हालांकि हाल के हालात ऐसे दिखाई नहीं दे रहे हैं। शासन पर उनका नियंत्रण उनकी पिछली सरकार की तरह नहीं दिख रहा है।
हार के बाद विपक्ष को नीतीश को निशाने पर लेने का शानदार मौका मिल गया है। पटना से लेकर दिल्ली तक विपक्ष ने जंगलराज की वापसी का संकेत बता दिया। विपक्ष सड़कों पर उतरा। संसद में भी ये मामला उठा।
यूपी बीजेपी के प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक कहते हैं कि नीतीश पहले अपना घर संभालें उसके बाद ही राष्ट्रीय राजनीति में आने या पीएम बनने का सपना पालें।समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी कहते हैं कि नीतीश भ्रम में जी रहे हैं। वो विकास की बात नहीं करते। शराबबंदी की बात कर वो नेशनल हीरो बनना चाहते हैं।
बिहार की घटनाओं से पिछले पायदन पर नजर आ रहे नीतीश को अब अपने ऐक्शन से जवाब देना होगा। दावों या बयानबाजी से अब काम चलने वाला नहीं। क्योंकि विपक्ष बिहार में अब राष्ट्रपति शासन की मांग भी करने लगा है।