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लोक बड़ा या लोकतंत्रः बिहार विधानसभा चुनाव में लोक की अनदेखी

नीतीश इसी का लाभ उठाने में कामयाब होंगे। पर चुनाव के बाद यह नहीं कहा जा सकेगा कि किसान विधेयक, राम मंदिर, धारा 370 को कमजोर किये जाने पर चुनावी नतीजे जनादेश हैं। क्योंकि बिहार में किसान नहीं भूमिहर मज़दूर हैं। बाक़ी किसी इश्यू को किसी दो बड़े दल का गठजोड़ बेमतलब बना देता है।

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NewstrackBy Newstrack

Published on 29 Sep 2020 6:18 AM GMT

लोक बड़ा या लोकतंत्रः  बिहार विधानसभा चुनाव में लोक की अनदेखी
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जिला निर्वाचन विभाग की ओर से मतदान को लेकर सुरक्षा के पुख्ता इंतज़ाम किये गए है। अतिसंवेदनशील बूथों पर सशस्त्र पुलिस के जवानों की ड्यूटी लगाई गई है।
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योगेश मिश्र

लोक बड़ा या लोकतंत्र । इन दिनों बिहार में यह सवाल जेरे बहस है। जो लोग उम्मीदवार नहीं हैं, किसी पार्टी के सदस्य नहीं हैं, सब के लिए इस सवाल का जवाब जानना ज़्यादा ज़रूरी लगता है। कोरोना काल में बिहार में कराये जाने वाले चुनाव राजनेताओें को भले ही अपनी पीठ थपथपाने का मौक़ा दें। भले ही राजनेता यह कह कर इतराते दिखें कि लोकतंत्र भारत में हर हालात में जीवित रहेगा। पर ठीक उलट जनता का नज़रिया है। लोक यह मानता है कि नेताओं के आगे हमारी कोई अहमियत नहीं है। हमारे जीवन मृत्यु से ज़्यादा ज़रूरी चुनाव है?

इतने नासमझ तो नहीं राजनेता

सवाल यह उठता है कि जो बात गाँव के अनपढ या कम पढ़ें लिखे लोगों को समझ में आ रही है, जो मज़दूरों के समझ में आ रही है। वह बात लाकडाउन करने वाले राजनेताओें, लाकडाउन खोलने के लिए गाइड लाइन बनाने वाले नेताओं के समझ में क्यों नही आयी?

चुनाव तीन चार महीने बढ़ जाते तो ऐसा पहाड़ क्या टूट पड़ता? समूची दुनिया जब कोरोना के भय और दहशत में जी रही हो तब हम लोकतंत्र का पर्व कहे जाने वाले चुनाव में मस्त हों, यह मानवता और अपनी जनता के प्रति राजनेताओें व निर्वाचन आयोग का नज़रिया बताने के लिए काफ़ी है।

दरकार अंतर समझने की

चुनाव समर्थक यह कह सकते हैं कि नवंबर में अमेरिका में राष्ट्रपति के चुनाव होंगे, फिर भारत में क्यों नहीं? पर नवंबर व अक्टूबर के बीच का अंतर समझ में आना चाहिए । अमेरिका व भारत का अंतर समझना चाहिए । सीधे और अप्रत्यक्ष चुनाव का मतलब समझ में आना चाहिए ।

अभी तक कोरोना लाइलाज है। जो लोग ठीक हो रहे हैं। वह भगवान भरोसे। या किसी दूसरी बीमारी की दवा की कामयाबी से। अब तक 60 लाख से अधिक लोग कोरोना से देश भर में संक्रमित हो चुके हैं। तक़रीबन एक लाख लोग जान गँवा चुके हैं। अकेले बिहार में एक हज़ार लोग कोरोना के चलते जान गँवा चुके हैं।

खास बात अब यह रही है कि हर उम्र के लोग कोरोना से मर रहे हैं। देश का कोई ज़िला ऐसा नहीं है जहां कोरोना ने पाँव न पसार लिये हों। कोरोना संक्रमण से निपटने में नीतीश कुमार सरकार काफ़ी लानत भी झेल रही है। इंतज़ाम को लेकर नीतीश परेशान पहले से हैं। पर इन सबकी फ़िक्र किसी को नहीं है।

रबर स्टैम्प चुनाव आयोग

नखदंतहीन निर्वाचन आयोग यह कह रहा है कि चुनाव में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कराया जायेगा। मास्क, सेनेटाइजर का इस्तेमाल किया जायेगा। कोरोना पेशेंट भी वोट दे सकेंगे। लगता है आयोग पूरी तरह से यूटोपियायी हो गया है। उसे लोकतंत्र दिख रहा है। लोक नहीं।

bihar chunav

वह यह भूल रहा है कि लोक की भागीदारी के बिना लोकतंत्र का कोई महत्व नहीं है। मतदान के आँकड़े, लोक की चुनाव में भागीदारी आयोग की नज़र खोल कर रख देगी। वैसे अभी तो लग रहा है कि आयोग की मति मारी गयी है। सावन के अंधे को हरा ही दिखता है। यह कहावत भी नाहक नहीं बनायी गयी होगी।

नतीजा पहले से तय है

जब निर्वाचन आयोग , सरकार और नेताओं ने चुनाव लोक के माथे पर थोप दिया है। तब चुनाव पर भी बात करना ज़रूरी हो जाता है। वैसे बिहार में चुनाव और नतीजे समझना व बताना कोई राकेट साइंस नहीं है।

बिहार में केवल दो फ़ार्मूले लागू होते हैं। एक, वहाँ तीन बड़े दल हैं। भाजपा, जदयू, राजद । जब भी कोई दो एक साथ हो जायेंगे तो उनकी सरकार बन जायेगी। दोनों दलों का वोट मिलकर 40-44 फ़ीसदी के आसपास पहुँच जाता है।

बँटवारे का फार्मूला हिट

दूसरा, वहाँ बाँटो व राज करो का अंग्रेजों का फ़ार्मूला आज भी लागू होता है। जो जितना बाँट लेगा। उतने दिन , उतनी मज़बूती से सत्ता में बना रहेगा। लालू यादव ने माई ( मुस्लिम-यादव) समीकरण बनाया। भूराबाल( भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत, लाला) साफ़ करो का नारा दिया। यानी लालू ने इन जातियों को बाक़ी क़ौमों से अलग किया, बाँटा।

नीतीश कुमार ने लालू के फ़ार्मूले को बाँट दिया । बाँट कर राज कर रहे हैं। बिहार में 16 फ़ीसदी मुसलमान हैं। इतने ही मुस्लिम विधायक हैं। नीतीश ने मुसलमानों में बँटवारा किया। मुसलमानों में कुलहैया को अति पिछड़ों में डाला। अररिया , पूर्णिमा व किशनगंज में 20 लाख कुलहैया हैं। ब्राह्मणों में गिरी को ओबीसी में डाला। छपरा, मोतिहारी व सीवान में 25 लाख गिरी हैं।

फिर दलितों में बँटवारा करते हुए महादलित कैटेगरी बनायी। क्योंकि रविदास लालू के साथ थे, नीतीश ने महादलित में डाल कर इन्हें अपने पाले में खड़ा कर लिया। ओबीसी को बाँट कर ईबीसी बनाया। अपने वोट पक्के किये। लेकिन इस बँटवारे का यह नुक़सान ज़रूर हुआ कि हर बिरादरी का दल बन गया।

हर बिरादरी का दल

जतिन राम माँझी ने हिंदुस्तान आवाम मोर्चा बनाया है। पाँच फ़ीसदी मुसहर हैं पर केवल एक विधायक है। मुकेश साहनी ने मल्लाहों के लिए विकासशील इंसान पार्टी बनाया है । उपेन्द्र कुशवाहा ने आरएलएसपी के मार्फ़त कुशवाहा वोटों पर जकड़ बना रखी है।

कोयरी 8 फ़ीसदी हैं पर इस बिरादरी के 19 विधायक हैं। कुर्मी चार फ़ीसदी हैं पर 16 विधायक कुर्मी हैं। बिहार में पंद्रह फ़ीसदी यादव हैं। पर पिछले चुनाव में 61,विधायक बने । इनमें बाँटने के लिए नीतीश टिकट को आधार बनाते हैं।

राम विलास पासवान ने पासी जाति आधारित पार्टी बना रखा है। हालाँकि इसमें पद व टिकट प्राय: पासवान के परिवार के पास ही रहते हैं। इस पार्टी ने 2005 में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया था । 178 सीटों पर लड़ कर 29 सीटें हासिल कीं। बारह फ़ीसदी वोट मिले थे ।

छह महीने बाद दोबारा चुनाव हुआ तो केवल दस सीटें जीत पाई। उसके बाद 2010 में लोक जनशक्ति ने राजद के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। 75 में से तीन सीटें जीती । 6.74 फ़ीसदी वोट मिले । 2015 के चुनाव में राम बिलास की पार्टी बयालीस सीटों पर लड़ी। उसे केवल 4.83 फ़ीसदी वोट पर संतोष करना पड़ा। पासवान के रिश्तेदार भी चुनाव हार गए ।

इसके आगे सारे समीकरण फेल

2015 में लालू का राष्ट्रीय जनता दल और नीतीश कुमार का जनता दल यूनाइटेड व कांग्रेस साथ मिलकर लड़े थे। राजद को अस्सी सीटें मिली थीं। नीतीश को 71। कांग्रेस को 27 सीटें।इस गठबंधन को 42 फ़ीसदी वोट मिले थे।जबकि भारतीय जनता पार्टी 53 सीटों पर रही। लेकिन वोट 24.4 फ़ीसदी ही रहा । हालाँकि एनडीए का वोट 29-30 फ़ीसदी तक पहुँच गया था।

बाद में नीतीश ने लालू का साथ छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया। नीतीश पंद्रह साल से कुर्सी पर बने हैं। उनके राज में पलायन बढ़ा है। सत्ता विरोधी रूझान उनके सामने है। पर जब कोई दो बड़े दल एक साथ होते हैं तो सारा विरोध, सारा रूझान बेअसर हो जाता है।

नीतीश इसी का लाभ उठाने में कामयाब होंगे। पर चुनाव के बाद यह नहीं कहा जा सकेगा कि किसान विधेयक, राम मंदिर, धारा 370 को कमजोर किये जाने पर चुनावी नतीजे जनादेश हैं। क्योंकि बिहार में किसान नहीं भूमिहर मज़दूर हैं। बाक़ी किसी इश्यू को किसी दो बड़े दल का गठजोड़ बेमतलब बना देता है।

( लेखक वरिष्ठ पत्रकार और न्यूजट्रैक/अपना भारत के संपादक हैं ।)

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