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सपा के लिए आसान नहीं होगी चुनावी डगर, मुस्लिम अपने को ठगा समझ रहे !

Rishi

RishiBy Rishi

Published on 12 Dec 2016 7:37 PM GMT

सपा के लिए आसान नहीं होगी चुनावी डगर, मुस्लिम अपने को ठगा समझ रहे !
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लखनऊ : जिस तरह तमिलनाडु में जयललिता ने ब्राहमण होते हुए भी अपनी राजनीति ब्राहमण विरोध के बूते ही की, ठीक उसी तरह यूपी की राजनीति में मुसलमानों के अधिकतर नेता गैर मुस्लिम रहे हैं। मुसलमानों में से शायद ही कोई बड़ा नेता सामने आया हो। सूबे का दुर्भाग्य रहा की आज़ादी के बाद से मुस्लिम राजनीति में पेशेवर मुस्लिम राजनेताओं और उलेमाओं का ही दखल रहा। पार्टियों के प्रति जिनकी श्रद्धा अपने लाभ-हानि के समीकरणों के साथ बदलती रही है। सूबे का आम मुसलमान इंही के इर्द गिर्द घूमता नज़र आता है।

सपा से खुश नहीं मुस्लिम ?

हाँ! यह भी रहा कि बहुप्रतिक्षक सच्चर कमेंटी की रिपोर्ट आने के बाद मुस्लिम युवाओं की सोच में काफी बदलाव दिखा। सूबे में संपन्न हुए पिछले कुछ विधान सभा चुनावों में मुसलमानों के वोटिंग पैटर्न में उसकी झलक भी नज़र आई है। उन्होंने कभी बीजेपी का डर महसूस किया, तो कभी कांग्रेस के वादों में सच्चाई नज़र आई। मुलायम-कल्याण की दोस्ती के बाद सपा से दूरी और विकल्प न होने पर बसपा से नजदीकी दिखी। पिछले चुनाव से पूर्व मुलायम द्वारा माफ़ी मांगने और चुनावी घोषणा पत्र में मुसलमानों से किये गए ढेरों वादों के बाद मुसलामानों ने एक बार फिर उन्हीं का एतबार किया। आम मुस्लिम को लगता है कि वादा पूरा करने की दिशा में सपा सरकार द्वारा अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया है जिससे एक बार फिर मुसलमान अपने को ठगा महसूस कर रहे है। कोई ताज्जुब नहीं कि अगले आम चुनाव के बाद कोई नया समीकरण देखने को मिल जाये।

बदल रहा है नज़रिया

दरअसल मुस्लिम मतदाताओं का नज़रिया अब बदलता जा रहा है। युवा मुसलमान अब बाबरी ध्वंस और गुजरात दंगे के साये से निकलकर मुख्यधारा से जुड़कर देश के विकास में अपना योगदान देने के लिए छटपटा रहा है। सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्रा की रिपोर्ट मुस्लिम राजनीति के मैदान में नई प्रस्थान बिंदु के रूप में स्थापित हो चुकी है। राज्य में हुए वर्ष 2007 विधान सभा चुनाव में बसपा सरकार के दौरान दंगा न होने और अयोध्या विवाद के समय भी राज्य में शांति बने रहने के बावजूद कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर वोटिंग न कर मुस्लिम मतदाताओं ने मुलायम के 18 प्रतिशत आरक्षण दिलाने और आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तार निर्दोषों की रिहाई के भरोसे पर वोट दिया।

अब वहीँ अगले विधान सभा चुनाव को मुसलमान अपनी नई आकांक्षाओं को ज़ाहिर करने के मौके के रूप में देख रहा है। आरक्षण और हक के सवाल को ज़्यादा प्राथमिकता दे रहा है। मुसलमान अब भाजपा के ख़िलाफ किसी भी पार्टी के मज़बूत उम्मीदवार को वोट देने की रणनीतिक समझदारी को छोड़कर किसी एक राष्ट्रीय पार्टी के पाले में जाकर अपनी भूमिका बदलना चाह रहा है। वैसे भी प्रदेश में चार राजनीतिक दल एक सिस्टम के रूप में स्थापित हो चुके हैं। ऐसे बहुत से सवाल हैं जो इस बार चुनावों के संदर्भ में उठ रहे हैं।

पुराने खांचे में फंसा

ज़ाहिर है इन सब सवालों के जवाब के संदर्भ में मुस्लिम नेतृत्व को भी इस बहस के दायरे में लाना होगा। दरअसल मुस्लिम नेतृत्व अभी तक उसी पुराने खांचे में फंसा हुआ है। वो पहले खुद की सोचता है बाद में कौम की। नब्बे के दशक से उत्तर प्रदेश और पूरे देश में मुस्लिम समाज की राजनीतिक आकांक्षाएं बदलने लगी हैं। लेकिन यह बदलाव काफी धीमा रहा है। इससे पहले सामाजिक और आर्थिक स्तर पर आए बदलाव ने नई ज़मीन तैयार की है। इसी ज़मीन पर पहली बार आम मुसलमान ने सच्चर की रिपोर्ट से हां में हां मिलाते हुए माना कि सचमुच मुसलमानों की हालत दलितों से भी बदतर है।

सच्चर की रिपोर्ट ने मुस्लिम मध्यमवर्ग को अपनी बादशाही अतीत को झटक कर मौजूदा हकीकत के आंगन में आकर सोचने के लिए मजबूर कर दिया। वो राजनीतिक असुरक्षा के साये से निकलकर अपने हकों और परवरिश में बदलाव का रास्ता खोजने लगा। ये और बात है कि इस ज़मीन पर मुस्लिम नेतृत्व के पुराने बरगद ही लहलहाते नज़र आ रहे हैं। कोई नया नेता नज़र नहीं आ रहा है, जो मुसलमानों की नई आकांक्षा कों राजनैतिक नेतृत्व दे सके। इसका सबसे बड़ा कारण है कि पार्टियों ने अपने भीतर किसी भी मुस्लिम नेता को स्थायी रूप से पनपने नहीं दिया। उत्तर प्रदेश के मैदान में उतारे गए और बुलाकर लाए गए जितने भी प्रमुख मुस्लिम नेता हैं, उन सबका राजनीतिक बायोडेटा इस बात की तस्दीक करता है।

बाबरी ध्वंस के समय तक मुस्लिम रहनुमाई या वोटों की तथाकथित ठेकेदारी उन धार्मिक प्रमुखों के हाथ में रही जो तमाम दलों से अपने संबंधों या हैसियत हासिल करने के बदले हुंकार भरते थे कि किसे वोट देना है या नहीं देना। मुस्लिम मतदाता अब जान चुका है कि इन धार्मिक नेताओं ने उन्हें किस गर्त में पहुंचा दिया है। यही कारण है कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बसपा ने नया मुस्लिम नेतृत्व न खड़ा कर चुनाव आते ही कई दलों के मुस्लिम नेताओं को बुलाने लगी।

बदल रहा है मुस्लिम मतदाता

अगर गौर से देखें तो चंद नेता मुस्लिम राजनीति के प्रतीक कम पेशेवर ज़्यादा दिखते हैं। जो वक्त और पद के हिसाब से पार्टियों को बदलते हुए मुस्लिम नेता बने रहते हैं। पार्टियों को भी ऐसे ही पेशेवर मुस्लिम नेतृत्व की ज़रूरत है, ताकि इनके चले जाने पर इतना ही समझा जाए कि एक व्यक्ति गया, मगर मुस्लिम मतदाताओं का विश्वास पार्टी के प्रति बना हुआ है। इन पुराने बरगदों के साये में मुस्लिम राजनीति की नई कोंपले पनप रही हैं। जिनमे कोई बड़ा नाम तो नहीं है लेकिन कई राजनैतिक दलों के टिकट से जीत रहे हैं। वर्ष 2007 के विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की संख्या 56 थी, जो 1991 में 17 थी। इसका सीधा कारण है कि मुस्लिम मतदाता का मानस अब बदल रहा है। उसके बीच नए और पुराने मतदाता के हिसाब से विभाजन हो रहा है। अब यह मांग उठ रही है कि सच्चर की रिपोर्ट के बाद की योजनाओं से कब लाभ मिलेगा। यही कारण है कि सपा ने नए और पुराने मुस्लिम मतदाताओं को साधने का काम किया है। एक तरफ जहाँ मुस्लिम लड़कियों के लिए 30 हज़ार, गिरफ्तार निर्दोष मुस्लिम युवकों की रिहाई और मुस्लिम बाहुल्य जिलों के लिए सेक्टोरल डेवलपमेंट स्कीम के ज़रिये युवाओं का विशवास जीतने का प्रयत्न किया गया है वहीँ कब्रिस्तान की चारदीवारी के लिए बजट देने की बात कहकर पुराने मुस्लिम मतदाताओं को विशवास बनाये रखने का सन्देश दिया गया।

अनदेखी कर चुनाव नहीं जीता जा सकता

उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा ही बदलाव की वाहक रही है। यूपी की सियासत में मुसलमानों की अनदेखी करके कोई चुनाव नहीं जीता जा सकता। अतीत में भी यहां की राजनीति बड़े उलटफेरों का शिकार होती रही है, लेकिन इस बार मुसलमानों की सियासत करवट ले रही है। ऐसे समय में अपने आपको मुसलमानों का नेता मानने वाले लोगों ने अगले वर्ष होने वाले चुनाव की आहट को देखते हुए पेशेवर मुस्लिम नेताओं ने दबाव बनाने की मुहिम शुरू कर दी है।

सपा की मुश्किल

सपा के लिए मुश्किल यह है कि दिल्ली के शाही इमाम मौलाना बुखारी और आजम खान की आपसी खींचतान भी काफी पुरानी है। दोनों ही अपने को मुसलमानों का असली नेता और हितैषी सिद्ध करने में की होड़ में लगे रहते है। यह कहना सही नहीं होगा की प्रदेश के सारे मुसलमान पेशेवर मुस्लिम नेताओं और उलेमाओं की शिनाख्त कर चुके है। लेकिन अधिकतर मुसलमान खासकर युवा इस बात को समझ चुके है कि चुनाव के समय अपने को मुसलमानों का सबसे बड़ा नेता साबित करने में जुटे ऐसे खुदपरस्त रहनुमा वर्षों से उनकी लुटिया डुबो रहे है। इसलिए उनपर ऐसे स्वघोषित नेताओं के किसी हथकंडे का शायद कोई फर्क न पड़े। राजनीतिक विश्लेषक भी इस बात को मानते है कि मुसलमानों ने किसी मुस्लिम नेता के नाम पर नहीं बल्कि मुलायम के वादों पर सपा को वोट दिया था।

उत्तर प्रदेश की सत्ता में आने के बाद सपा की रणनीति में भी काफी बदलाव देखने को मिल रहा है। मुलायम शायद अब पेशेवर मुस्लिम नेताओं और उलेमाओं के दबाव, शक्ति प्रदर्शन और सौदे की राजनीति तंग आ चुके है। अब देखने वाली बात ये होगी की सपा इस बार चुनाव में मुस्लिमों को लुभाने के लिए कौन से हथकंडे अपनाती है।

Rishi

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आशीष शर्मा ऋषि वेब और न्यूज चैनल के मंझे हुए पत्रकार हैं। आशीष को 13 साल का अनुभव है। ऋषि ने टोटल टीवी से अपनी पत्रकारीय पारी की शुरुआत की। इसके बाद वे साधना टीवी, टीवी 100 जैसे टीवी संस्थानों में रहे। इसके बाद वे न्यूज़ पोर्टल पर्दाफाश, द न्यूज़ में स्टेट हेड के पद पर कार्यरत थे। निर्मल बाबा, राधे मां और गोपाल कांडा पर की गई इनकी स्टोरीज ने काफी चर्चा बटोरी। यूपी में बसपा सरकार के दौरान हुए पैकफेड, ओटी घोटाला को ब्रेक कर चुके हैं। अफ़्रीकी खूनी हीरों से जुडी बड़ी खबर भी आम आदमी के सामने लाए हैं। यूपी की जेलों में चलने वाले माफिया गिरोहों पर की गयी उनकी ख़बर को काफी सराहा गया। कापी एडिटिंग और रिपोर्टिंग में दक्ष ऋषि अपनी विशेष शैली के लिए जाने जाते हैं।

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