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किसान बिल वापसी के बाद भाजपा को पंजाब में कमल खिलने की उम्मीद, गठबंधन के लिए साथी मिलना तय

Krishi Kanoon Ki Wapsi: किसान क़ानूनों की वापसी के बाद भाजपा को पंजाब में अगले साल होने वाले चुनाव के लिए गठबंधन के साथियों का मिलना तय है। अमरिंदर सिंह भी भाजपा के साथ आने को तैयार हैं और अकाली दल को भी बीजेपी से कोई गुरेज नहीं है।

Yogesh Mishra

Written By Yogesh MishraPublished By Shreya

Published on 20 Nov 2021 9:02 AM GMT

किसान बिल वापसी के बाद भाजपा को पंजाब में कमल खिलने की उम्मीद, गठबंधन के लिए साथी मिलना तय
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(डिजाइन फोटो- न्यूजट्रैक) 

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Krishi Kanoon Ki Wapsi: किसान क़ानूनों की वापसी का भाजपा (BJP) को किस राज्य के चुनाव में क्या फ़ायदा होगा यह तो आने वाला समय बतायेगा। पर इतना तो तय है कि पंजाब में एकला चलो की राह में अलग थली पड़ी भाजपा को अगले साल होने वाले चुनाव (Vidhan Sabha Chunav 2022) के लिए गठबंधन के साथियों का मिलना तय है। एक ओर कांग्रेस (Congress) से अलग होकर पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह (Captain Amarinder Singh) भाजपा के साथ आने को तैयार दिख रहे हैं। तो दूसरी ओर भाजपा के पुराने साथी अकाली दल (Shiromani Akali Dal) को भी अब भाजपा से कोई गुरेज़ नहीं है।

किसान क़ानूनों के वापसी (New Farm Laws Repealed) के एलान के साथ ही कल तक पंजाब में अकेली खड़ी भाजपा के सामने अब अपने लिए गठबंधन के साथी चुनने का विकल्प खुल गया है। हालात अगर यही रहे तो पंजाब में भाजपा अकाली दल व पंजाब लोक कांग्रेस दोनों को साधने में कामयाब हो सकती है। क्योंकि भाजपा के खाते में करतारपुर साहिब (Kartarpur Sahib Corridor) खोलने का श्रेय भी जाता है। करतारपुर सिखों का बहुत पवित्र स्थल है। सिखों के प्रथम धर्म गुरू का जन्म व निधन दोनों यहीं हुआ था।

सोनिया संग राहुल गांधी (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

कांग्रेस को हो सकता है भारी नुकसान

पंजाब के चुनावी समीकरण बताते हैं कि यदि यह गठबंधन बना तो पंजाब में कांग्रेस के दलित कार्ड (Congress Dalit Card) की हवा निकाल देगा। इसी के साथ कांग्रेस को नवजोत सिंह सिद्धू (Navjot Singh Sidhu) व चरनजीत सिंह चन्नी (Charanjit Singh Channi) के बीच मतभेद का भी ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ेगा। कैप्टन अमरिदंर का कांग्रेस छोड़ना भी कम भारी नहीं पड़ेगा। क्योंकि उनकी कांग्रेस नेता (Congress Neta) के अलावा अपनी भी फॉलोइंग कम नहीं है। पंजाब में कांग्रेस की सरकार बनने के पीछे कैप्टन के चेहरे का होना भी कम महत्वपूर्ण नहीं रहा। पंजाब की सियासत में 38 फ़ीसद से ज़्यादा वोट पाने वाली पार्टी हमेशा अपने बलबूते पर सरकार बनाती रही है।

2017 में रहे थे ऐसे नतीजे

यही नहीं, यदि किसी गठबंधन को भी इतने वोट मिल जायें तो भी वह सरकार बनाने में कामयाब होता रहा है। अकाली दल ने जब ख़राब प्रदर्शन किया है तब भी वोट शेयर में वह तीस फ़ीसदी से कम नहीं रहा है। भाजपा भी कभी पाँच फ़ीसदी वोट शेयर से कम नहीं रही है। साल 2017 में पंजाब विधानसभा चुनाव (Punjab Vidha Sabha Chunav 2017) में कुल 51 छोटी-बड़ी पार्टियां मैदान में उतरी थीं। इसके अलावा स्वतंत्र उम्मीदवार और वोटर्स के पास नोटा (NOTA) का भी विकल्प था। विजेता कांग्रेस पार्टी ने कुल 117 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। इनमें 77 सीटों पर उसे जीत मिली। कुल वोट प्रतिशत 38.50 प्राप्त हुआ था।

शिरोमणि अकाली दल ने कुल 94 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। जिसमें उसे महज 15 सीटों पर जीत मिली। कुल वोट प्रतिशत 25.24 था। शिरोमणि अकाली दल का बीजेपी का साथ गठबंधन था। बीजेपी ने अपने हिस्से की 23 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। जिनमें मात्र 3 विजयी रहे। 5.39 प्रतिशत वोट मिला। आम आदमी पार्टी (आप) ने कुल 112 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। जिनमें 20 उम्मीदवारों को जीत मिली। आप को 23.72 प्रतिशत वोट मिले। इसके अलावा देश की अन्य राजनीतिक पार्टियां जैसे बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, एनसीपी, सपीआई, सीपीएम भी मैदान में थी । लेकिन न उन्होंने एक भी सीट जीती और न ज्यादा वोट प्रतिशत ही उनके हिस्से गया। हालांकि, बसपा को 1.52 प्रतिशत वोट मिले थे।

(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

2012 पंजाब विधानसभा चुनाव के नतीजे

साल 2012 पंजाब विधानसभा चुनाव में भी कुल छोटी-बड़ी 51 पार्टियां थीं। कांग्रेस ने 117 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। इनमें उसे 46 सीटों पर जीत मिली। कुल 40.09 प्रतिशत वोट मिले। शिरोमणि अकाली दल ने अपने हिस्से की 94 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। जिनमें 56 सीटों पर जीत मिली। कुल 34.73 फीसदी वोट प्रतिशत प्राप्त हुए। बीजेपी ने अकाली गठबंधन में अपने हिस्से की कुल 23 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। जिनमें 12 सीटों पर जीत मिली। बीजेपी को कुल वोट प्रतिशत का 7.18 प्रतिशत प्राप्त हुआ था। बहुजन समाज पार्टी ने सभी 117 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। जिनमें उसे किसी सीट पर सफलता नहीं मिली। हालांकि, 4.29 प्रतिशत वोट जरूर मिले। इसके अलावा एनसीपी, सीपीआई, सीपीएम सहित अन्य पार्टियों को न तो कोई सीट मिली और न वोट प्रतिशत ही उनके हिस्से गया। शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी ने मिलकर राज्य में सरकार बनाई।

साल 2007 के विधानसभा चुनाव में कुल 36 छोटी-बड़ी पार्टियां मैदान में थीं। शिरोमणि अकाली दल ने बीजेपी से गठबंधन के तहत अपने हिस्से की 93 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे, जिनमें 48 जीते। इन्हें 37.09 प्रतिशत वोट मिले थे। अकाली दल के सहयोगी बीजेपी ने 23 सीट पर प्रत्याशी उतारे थे। जिनमें अप्रत्याशित तौर पर 19 सीटों पर जीत हासिल की। इसे कुल 8.28 फीसदी वोट मिले थे। कांग्रेस पार्टी ने कुल 116 सीटों पर कैंडिडेट उतारे थे। जिसमें 44 प्रत्याशी जीतकर आए थे। और इन्हें कुल 40.90 प्रतिशत वोट शेयर हासिल हुए थे। शेष 5 प्रत्याशी निर्दलीय जीतकर आए थे। जिनमें 6. 82 वोट प्रतिशत बंटे थे।

साल 2002 के पंजाब विधानसभा चुनाव में कुल 32 छोटी-बड़ी पार्टियां मैदान में थीं। कांग्रेस ने 105 सीटों पर अपने प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। जिनमें 62 उम्मीदवारों ने जीत हासिल की। इन्हें कुल 35.81 प्रतिशत वोट मिले थे।शिरोमणि अकाली दल ने 92 सीटों पर प्रत्याशी उतारे जिनमें 41 पर जीत मिली। इन्हें 31.08 प्रतिशत वोट शेयर हासिल हुए थे। बीजेपी ने कुल 23 सीटों में से महज 3 सीटों पर सफलता हासिल की। इसे 5.67 प्रतिशत वोट मिले थे। बहुजन समाज पार्टी ने 100 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, जिसमें किसी को जीत नहीं मिली। लेकिन वोट प्रतिशत 5.69 रहा। शिरोमणि अकाली दल (एम) ने 84 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे। जिनमें जीत किसी को नहीं मिली। लेकिन इसे 4.67 प्रतिशत वोट मिले थे। इस चुनाव में 9 निर्दलीय ने भी जीत हासिल की थी।

अमित शाह-नरेंद्र मोदी-जेपी नड्डा (फोटो साभार- सोशल मीडिया)

हिंदू चेहरे को मैदान में उतारेगी बीजेपी

पंजाब सिख बहुल राज्य है। दूसरी सबसे बड़ी आबादी हिन्दुओं (Hindu) की है। लेकिन बीते 55 सालों में किसी हिन्दू को मतदाताओं ने पंजाब का सरताज नहीं बनाया। दूसरे अर्थों में कहें तो 1966 के बाद कोई हिन्दू पंजाब का सीएम नहीं बना। इसीलिए कहा जाता रहा है कि जिसके सिर पर पगड़ी होगी, उसी के पास सिंहासन होगा। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) किसी हिन्दू फेस को मैदान में उतारने की तैयारी में है।

पंजाब में सत्ता समीकरण घरानों के हाथ में ही रहा है। जिनमें मुख्य है पटियाला का राजघराना जिससे आते हैं सूबे के पूर्व सीएम अमरिंदर सिंह। दूसरा है मुक्तसर का बादल परिवार। जिससे पूर्व सीएम प्रकाश सिंह बादल और सुखबीर बादल आते हैं।आबादी के हिसाब से पंजाब में दलितों का प्रतिशत देश में सबसे अधिक है। आंकड़ों की भाषा में कहें तो वहां दलितों की कुल आबादी का 32 प्रतिशत है। पंजाब की साक्षरता दर 76 प्रतिशत के करीब (Punjab Mein Saksharta Dar) साल 2011 की जनगणना के अनुसार पंजाब की कुल आबादी 27,743,338 है। जिसमें पुरुषों की आबादी 14,640,284 है तो महिलाओं की 13,103,054 है। यह आबादी देश की कुल जनसंख्या का 2.29 प्रतिशत है।

लिंगानुपात की बात करें तो 2011 की जनगणना के मुताबिक पंजाब का लिंगानुपात प्रति व्यक्ति की तुलना में 895 है। राज्य की कुल साक्षरता दर 75.84 प्रतिशत है। इसमें पुरुष साक्षरता 80.44 प्रतिशत तो महिला साक्षरता दर 75.84 फीसदी है। आधी से अधिक आबादी सिखों की (Punjab Sikh Population) है। ये तो सभी जानते हैं कि पंजाब सिख बहुल राज्य है। 2011 की जनगणना के अनुसार सिखों की आबादी का प्रतिशत 57.69 है। जबकि राज्य में दूसरी बड़ी आबादी हिन्दुओं की है, जो कुल जनसंख्या का 38.49 फीसदी है। इनके अलावा 1.93 प्रतिशत मुस्लिम तो 1.26 फीसद आबादी ईसाईयों की है। बौद्ध धर्मावलम्बियों का प्रतिशत जहां 0.12 है, वहीं 0.16 प्रतिशत जैन धर्म को मानने वाले हैं। अघोषित आबादी तक़रीबन 0.32 फीसदी है।

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