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JDU RCP Singh: बुरे फंसे आरसीपी, जदयू में वापसी नहीं, भाजपा में स्वागत नहीं

JDU RCP Singh: खाता न बही, जो आरसीपी कहें वही सही- यह कहावत जनता दल यूनाईटेड में स्थापित हो गई थी। उधर, आरसीपी केंद्र में मंत्री बने और इधर ललन सिंह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष। इसके साथ ही आरसीपी का खाता-बही खराब होना शुरू हुआ।

Shishir Kumar Sinha
Updated on: 2022-07-10T13:48:15+05:30
JDU RCP Singh
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JDU RCP Singh (image credit social media)

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JDU RCP Singh: चिराग पासवान याद हैं? वही, जो खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान बताते थे। अब ढूंढ़े नहीं मिलेंगे वह चिराग। वजह है, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लेकर भारतीय जनता पार्टी का स्टैंड। पिछले दिनों राष्ट्रपति चुनाव में समर्थन के बहाने चिराग को भाजपा ने एनडीए का हिस्सा जरूर बताया, लेकिन इससे उन्हें कुछ मिलने की संभावना नहीं बनी। पिता रामविलास पासवान की तरह मंत्रीपद की संभावना तो अभी बिल्कुल नहीं दिख रही। कुछ ऐसा ही हो रहा कभी नीतीश कुमार के हनुमान कहे जाने वाले राम चंद्र प्रसाद सिंह, यानी आरसीपी के साथ।

खाता न बही, जो आरसीपी कहें वही सही- यह कहावत जनता दल यूनाईटेड में स्थापित हो गई थी। उधर, आरसीपी केंद्र में मंत्री बने और इधर ललन सिंह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष। इसके साथ ही आरसीपी का खाता-बही खराब होना शुरू हुआ। अब इस खाता-बही का जदयू में एक तरह से हिसाब-किताब पूरा हो गया है। खासकर, भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के दौरान हैदराबाद एयरपोर्ट पर आरसीपी की तस्वीरों के सामने आने और फिर नरेंद्र मोदी के प्रति उनकी ओर से आस्था जताने के बाद। जदयू के अंदर अब आरसीपी का कोई नहीं, जो बचे वह दम साधे हैं

2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के समय भाजपा के साथ सीटों पर समझौते के पहले तक जदयू में आरसीपी की चलती थी। आरसीपी जो कहें, उसे नीतीश कुमार का आदेश माना जाता था। चुनाव के समय नीतीश कुमार ने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का अपना पद भी आरसीपी को दे दिया था। चुनाव के समय सीटों पर समझौते के समय ही आरसीपी के खिलाफ आवाज उठने लगी थी कि वह भाजपा के हिसाब से चल रहे हैं, जदयू के लिए नहीं।

2019 के लोकसभा चुनाव में प्रचंड जीत के बाद केंद्र में जदयू को तीन मंत्रियों का कोटा नहीं मिलने के कारण पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाते मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सरकार में शामिल होना स्वीकार नहीं किया था। आरसीपी अध्यक्ष थे तो केंद्रीय मंत्रिमंडल विस्तार में मंत्री बन गए। भले ही वह कहते रहे कि नीतीश कुमार के आदेश पर ही वह मंत्री बने, लेकिन जदयू में तभी से यह माना गया कि आरसीपी नरेंद्र मोदी के हनुमान हो गए हैं। इसके बाद, जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने ललन सिंह ने पार्टी को आरसीपी-मुक्त करने की मुहिम छेड़ दी।

संगठन के सारे फॉर्मूले बदलने के साथ ही आरसीपी के लोगों का सफाया होता गया। अब हालत यह है कि पार्टी में आरसीपी का नामलेवा भी कोई नहीं है। ऐसे इक्का-दुक्का पदधारक भी दम साधे पड़े हैं कि कब उन्हें चलता कर दिया जाए। आरसीपी को राज्यसभा नहीं भेजे जाने के पार्टी के फैसले के बाद अब कोई जदयू में नीतीश के पुराने हनुमान का नाम भी लेता है तो उल्टे बोल के साथ। वर्तमान मंत्री अशोक चौधरी हों या पूर्व मंत्री नीरज कुमार, हरेक आरसीपी को आइना दिखा चुके हैं। यह तक कहा जा रहा है कि आरसीपी को नीतीश ने बनाया, लेकिन वह उनके भी नहीं हुए।

घर तो नहीं जला बैठे आरसीपी

चिराग पासवान को जिस तरह भाजपा पर भरोसा था, आरसीपी ने भी वही भरोसा दिखाया। जदयू ने राज्यसभा नहीं भेजा और भाजपा की सूची में आए नहीं। फिर भी कुछ मिलने की उम्मीद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति आस्था जताते रहे। लेकिन, अंतत: समय पूरा होते ही मंत्रीपद से इस्तीफा देना ही पड़ा। आरसीपी अब वस्तुत: कुछ नहीं हैं। पूर्व मंत्री कहे जा सकते हैं, जदयू के पूर्व अध्यक्ष कहे जा सकते हैं। बाकी कुछ नहीं। चिराग पासवान के साथ भी लगभग ऐसी ही परिस्थिति बनी थी। चाणक्या स्कूल ऑफ पॉलिटिकल राइट्स एंड रिसर्च के अध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार सिन्हा कहते हैं- 'हैदराबाद टेस्ट' के जरिए भाजपा ने आरसीपी का भविष्य देख लिया।

हैदराबाद एयरपोर्ट पर भाजपाइयों के हाथों आरसीपी के स्वागत की तस्वीर पर जदयू की तीखी प्रतिक्रिया देख भाजपा को समझ में आ गया कि नीतीश कुमार बुरा मान सकते हैं। यही कारण है कि आपदा प्रबंधन में नीतीश कुमार के करीबी भाजपाई राज्यसभा सांसद सुशील कुमार मोदी तत्काल कूदे। उनके कूदते ही भाजपा के बाकी नेता भी लगातार दुहराने लगे कि आरसीपी वहां मंत्री के रूप में किसी कार्यक्रम के लिए गए थे, भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पहुंचने वाले नेताओं का स्वागत करने के लिए एयरपोर्ट पर खड़े तेलंगाना भाजपा के नेताओं ने अनौपचारिक रूप से उनका स्वागत किया था।

भाजपा में संगठन की जिम्मेदारी लें

जदयू में आरसीपी के लिए संभावना शून्य हो चुकी है। नीतीश कुमार अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह की चाहत के खिलाफ आरसीपी को वापस पार्टी में कुछ देंगे, इसकी संभावना शून्य बची है। ऐसा इसलिए भी कि मुख्यमंत्री खुद भी आरसीपी को लेकर असहजता दिखा चुके हैं। उधर, भाजपा केंद्र सरकार में आरसीपी को कुछ देने से रही। नीतीश की नाराजगी की आशंका हमेशा रहेगी।

इस हालत में आपदा प्रबंधन के लिए आरसीपी खुद नीतीश कुमार के सामने नतमस्तक हों, तभी भाजपा उन्हें अपने साथ खुलकर लाएगी। वरना, चिराग पासवान की तरह समय के इंतजार में किनारे रहना तय है। ऐसे में सबसे ज्यादा संभावित विकल्प यह है कि आरसीपी सिंह भाजपा में सीधे जुड़कर संगठन के काम में लगें। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो आरसीपी भाजपा में जुड़ते हैं और संगठन के काम में लगाए जाते हैं तो नीतीश कुमार इसपर नाराजगी नहीं जताएंगे।

Prashant Dixit

Prashant Dixit

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