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हिंदू-मुस्लिम आस्था का प्रतीक है पाक में ये शक्तिपीठ,कभी यहां मां प्रसन्न करने के लिए अंगारों पर चलते थे लोग

suman

sumanBy suman

Published on 12 Oct 2018 11:43 PM GMT

हिंदू-मुस्लिम आस्था का प्रतीक है पाक में ये शक्तिपीठ,कभी यहां मां प्रसन्न करने के लिए अंगारों पर चलते थे लोग
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जयपुर: नवरात्रि मां के स्वरूपों की उपासना करने का त्यौहार है। मां के मंत्रों, स्तोत्रों और स्तुति के साथ ही इस व्रतोत्सव में देवी के दर्शनों का महत्व भी बहुत अधिक माना जाता है। नवरात्रि में भक्तों की हार्दिक इच्छा होती है कि वो मां के विभिन्न स्वरूपों के दर्शन करें। देवी पुराण में 51 शक्तिपीठ बताए गए हैं। मां के इन्हीं रूपों में से एक है हिंगलाज मंदिर। हिंगलाज भवानी माता के इसी रूप को कहा जाता है। यह शक्तिपीठ पाकिस्तान में स्थित है। ऐसा बताया जाता है कि यह मंदिर 2000 वर्ष पूर्व भी यहीं विद्यमान था। नवरात्रि के दौरान तो यहां पूरे नौ दिनों तक शक्ति की उपासना का विशेष आयोजन होता है। सिंध-कराची के लाखों सिंधी हिन्दू श्रद्धालु यहां माता के दर्शन को आते हैं। भारत से भी प्रतिवर्ष एक दल यहां दर्शन के लिए जाता है। पाकिस्तान के कब्जे वाले बलूचिस्तान के हिंगोल नदी और चंद्रकूप पहाड़ पर स्थित है माता का ये मंदिर। इस शक्तिपीठ की मान्यता बहुत अधिक है।

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हिंगलाज मंदिर की प्राचीन कथा दक्ष के यज्ञ बुलावे के बिना जाने पर, मां ने अपना सम्मान घटता देख आत्मदाह कर लिया था। जब भगवान शंकर माता सती के मृत शरीर को अपने कंधे पर लेकर तांडव नृत्य कर, पूरे जगत में घूमने लगे। ऐसे में भगवान शिव के क्रोध से ब्रह्माण्ड को प्रलय से बचाने के लिए, भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता के मृत शरीर को 51 भागों में काट दिया। मान्यतानुसार हिंगलाज ही वह जगह है जहां माता का सिर गिरा था। इसी प्रकार जिस भी स्थान पर मां के शरीर के अंग गिरे वहां शक्तिपीठ की स्थापना की गई।

सातो द्वीप शक्ति सब रात को रचात रास।

प्रात:आप तिहु मात हिंगलाज गिर में॥

इस श्लोक में बताया गया है कि हर रात हिंगलाज शक्तिपीठ पर सभी शक्तियां एकत्रित होकर रास रचाती हैं। सूर्योदय होते ही हिंगलाज माता के भीतर समा जाती हैं। यह है मान्यता एक बार यहां माता ने प्रकट होकर वरदान दिया कि जो भक्त मेरा चुल चलेगा उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होगी। चुल एक प्रकार का अंगारों का बाड़ा होता है जिसे मंदिर के बाहर 10 फिट लंबा बनाया जाता है और उसे धधकते हुए अंगारों से भरा जाता है जिस पर मन्नतधारी चल कर मंदिर में पहुचते हैं। ऐसा करने वाले की हर मनोकामना पूरी होती है। आजकल इस परंपरा को बन्द कर दिया गया है।

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