शिव को प्रिय है सावन मास, कांवड़ के साथ ऐसे करें शुरुआत

लखनऊ: हिंदू धर्म में वैसे हर मास का अपना महत्व है, लेकिन सबसे उत्तम सावन मास को माना जाता है। इस मास का सबको बेसब्री से इंतजार रहता है। वैसे भी इस मास को साक्षात शिव का मास कहते है। भोलेबाबा को सावन अतिप्रिय है। इस माह में  उनके दर्शन के लिए भक्त कांवड़ लेकर पैदल ही निकल पड़ते है।  इस बार सावन की शुरुआत 20 जुलाई से हो रही है। भगवान के 12 शिवलिंगों में किसी भी एक शिवलिंग का लोग दर्शन जरूर करते है।
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कांवड़िए की पदयात्रा
वैसे वैद्यनाथ धाम, अमरनाथ और केदारनाथ तो जरूर कांवड़िए जाते है। बाकी सब शिवालयों में भी दर्शन का अपना महत्व है। इस यात्रा में भक्तगण श्रद्धा पूर्वक बाबा भोलेनाथ के दर्शन कांवड़ लेकर करते हैं।  इस दौरान उन्हें पैरों में काटों का चुभना, धूप , बरसात , गर्मी आदि को सहन करना पड़ता है। कहते है इस  यात्रा से भगवान की कृपा से आंखों की रोशनी बढ़ती है । जमीन पर ओस की बूंदें पैरों को ठंडक देती है। सूर्य की किरणें शरीर में प्रवेश कर उसे निरोगी बनाती हैं ।

केसरिया रंग इच्छाशक्ति का प्रतीक
इस धार्मिक उत्सव की विशेषता है। इस दौरान सभी दर्शनार्थी  केसरिया रंग के वस्त्र  पहनते हैं ।  केसरिया रंग जीवन में ओज , साहस, आस्था और गतिशीलता का प्रतीक है।  इसके अतिरिक्त कलर-थेरेपी के अनुसार केसरिया रंग पेट से सम्बंधित रोगों को भी दूर करता है और समाजिकता  बढ़ती है ।
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धार्मिक आस्था के अनुसार हिंदुओं का विश्वास है कि कांवड़ यात्रा में जहां से भी जल भरा जाता है, वो गंगाजी की धारा में से ही लिया जाता है। कांवड़ के माध्यम से जल चढ़ाने से मन्नत के साथ-साथ चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है। कांवड़ यात्रा दृढ इच्छाशक्ति का भी प्रतीक है ।

कब से शुरू हुई कांवड़ यात्रा
सावन में कांवड़ यात्रा निकालने की परंपरा बहुत पुरानी है। यूं तो कांवड़ यात्रा का कोई पौराणिक संदर्भ नहीं मिलता, लेकिन कुछ किवंदतियां हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान परशुराम, दिग्विजय (पूरी पृथ्वी को जीतने के बाद) के बाद जब मयराष्ट्र (वर्तमान मेरठ) से होकर निकले तो उन्होंने पुरा में विश्राम किया और वो स्थल उनको अत्यंत मनमोहक लगा। उन्होंने वहां पर शिव मंदिर बनवाने का संकल्प लिया। इस मंदिर में शिवलिंग की स्थापना करने के लिए पत्थर लाने वो हरिद्वार गंगा तट पर पहुंचे ।

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उन्होंने मां गंगा की आराधना की और उनसे एक पत्थर देने का अनुरोध किया। ये अनुरोध सुनकर पत्थर रुदन करने लगे। वो देवी गंगा से अलग नहीं होना चाहते थे। तब भगवान परशुराम ने उनसे कहा कि जो पत्थर वो ले जाएंगे, उसका चिरकाल तक गंगा जल से अभिषेक किया जाएगा । हरिद्वार के गंगातट से भगवान परशुराम पत्थर लेकर आए और उसे शिवलिंग के रूप में पुरेश्वर महादेव मंदिर में स्थापित किया ।

ऐसी मान्यता है कि जब से भगवान परशुराम ने हरिद्वार से पत्थर लाकर उसका शिवलिंग पुरेश्वर महादेव मंदिर में स्थापित किया तब से कांवड़ यात्रा की शुरूआत हुई। इसी मान्यता के कारण शिवभक्त तमाम कष्टों को सहते हुए हरिद्वार से गंगाजल लाकर पुरेश्वर महादेव मंदिर में शिवलिंग पर अर्पित करते हैं । सावन मास में यहां कांवड़ियों का सैलाब उमड़ पड़ता है।

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