क्या है सेवई का ईद से रिश्ता, कब से शुरू हुआ ये सिलसिला?

लखनऊ: बात ईद की हो तो सेवई का जिक्र ना कैसे संभव है। ईद आते ही इसका जिक्र जहन में आ जाता है। अमीर हो या गरीब, राजा हो या रंक इस दिन सेवई से ही मेहमानों का स्वागत होता करता है, लेकिन अगर हम बताएं कि सेवई का ताल्लुक ईद से नहीं है तो चौंकिएगा नहीं…। दरअसल ईद का ताल्लुक नूरजहां से है जिन्होंने हिंदोस्तान में ईद पर सेवई बनाने का रिवाज बनाया।

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सेवई का ईद से ताल्लुक

ईद का ताल्लुक खुशी से है और सेवई का ताल्लुक मिठास से। यही वजह है कि इस दिन सेवई से लोगों का मुंह मीठा किया जाता है। ईद के दिन पूरे देश में हर घर में सेवई बनाई जाती है। जाफरान और मेवे के साथ-साथ मलाई और दूध का इस्तेमाल इसे बेहद लजीज बना देता है। लोग एक दूसरे के घर मुबारकबाद देने जाते हैं और सेवई का खाते हैं।

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नूरजहां ने की शुरुआत
ईद के दिन सेवई  बनाने का रिवाज हिंदोस्तान में ही प्रचलित हुआ। हालांकि ईरान में भी सेवई  बनाई जाती है। नवाब इब्राहिम अली खान बताते हैं कि सबसे पहली बार नूरजहां ने सेवई बनाने की शुरुआत की थी। धीरे धीरे मुगल सूबेदारों के साथ सन 1660 तक सेंवई  पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैल गई। इस तरह धीरे-धीरे ईद का सेवई से खास रिश्ता हो गया।

वैसे तो सेवई को आम तौर से शाही डिश मना जाता है, लेकिन इसकी पहुंच खास लोगों से लेकर आम लोगों तक है। पुराने दौर में इसे बनाने में खासी मशक्कत करनी पड़ती थी, सेवई हाथ से बनायी जाती थी। जिसकी क्वालिटी और लज्जत का कोई तोड़ नही है। बदलते दौर के साथ ही मशीनों के इस्तेमाल ने इसका मजा जरा कम कर दिया है।

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हिंदोस्तान के बाद इन देशों में सेवई ने बनाई जगह
ईद पर वैसे तो हिंदोस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में सेवई बनाने का रिवाज है। दूसरे मुल्कों में रहने वाले यहां के लोग भी अपने घरों में सेवई बनाकर ईद मनाते हैं। इस तरह से ईद पर सेवई भारतीय उपमहाद्वीप से निकलकर यूरोप और अमेरिका तक पहुंच गयी।  नूरजहां के जमाने से शुरू हुई शाही डिश की इस मिठास का पीढ़ी दर पीढ़ी ईद से खास रिश्ता हो गया। अब तो सेवई के बिना ईद का जिक्र भी नामुमकिन है।

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