महावीर को कहा जाता था पर्यावरण पुरुष, विचारों में आज भी हैं जिंदा

Published by Admin Published: April 19, 2016 | 1:23 pm
Modified: April 19, 2016 | 1:37 pm
पूनम नेगी
पूनम नेगी

लखनऊ: भगवान महावीर को ‘पर्यावरण पुरुष’ कहा जाता है आैर अहिंसा को पर्यावरण संरक्षण का अनूठा विज्ञान। भगवान महावीर मानते थे कि जीव और अजीव संयुक्त  इस सृष्टि में  मिट्टी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति ये जो अजीव तत्व हैं, इन सब में भी जीवन है। इसलिए इनके अस्तित्व को अस्वीकार नहीं करना चाहिए। इनके अस्तित्व को नकारने का मतलब है अपने अस्तित्व को अस्वीकार करना। स्थावर या जंगम, दृश्य और अदृश्य सभी जीवों का अस्तित्व स्वीकारने वाला मनुष्य ही सही मायने में पर्यावरण और मानव जाति की रक्षा के बारे में सोच सकता है।

जियो और जीने दो
जैन धर्म का नारा है “जियो और जीने दो”। जीव हत्या को जैन धर्म में पाप माना गया है। मानव समाज के कुकृत्यों के चलते आज हजारों प्राणियों की जाति-प्रजातियां लुप्त हो गई हैं। कइयों पर संकट गहराता जा रहा है। यदि मानव धर्म के नाम पर या अन्य तमाम कारणों के चलते इसी तरह जीवों की हत्या करता रहेगा तो एक दिन मानव ही बचेगा और वह भी आखिरकार कब तक बचा रह सकता है?

मांस खाना धार्मिक रीति
मांसाहारी लोग यह तर्क देते हैं कि यदि मांस नहीं खाएंगे तो धरती पर दूसरे प्राणियों की संख्या इतनी बढ़ जाएगी कि वे मानव के लिए ही खतरा बन जाएंगे। लेकिन क्या उन्होंने कभी यह सोचा है कि मानव के कारण आज कितनी प्रजातियां लुप्त हो गयी हैं। धरती पर सबसे बड़ा खतरा तो मानव ही है; जो शेर, सियार, बाज, चील जैसे सभी विशुद्ध मांसाहारी जीवों के हिस्से का मांस खा जाता है जबकि उसके लिए तो भोजन के और भी साधन हैं। इसी कारण जंगल के सारे जानवर भूखे-प्यासे मर रहे हैं।

अधर्म वो है जो मांस खाने को धार्मिक रीति मानते हैं। हालांकि वे और भी बहुत से तर्क देते हैं लेकिन उनके ये सारे तर्क सिर्फ तर्क ही हैं। इनमें जरा भी सत्य और तथ्य नहीं है। आज पर्यावरण संकट गहराते जाने का मूल कारण यह है कि हम पहाड़ों एवं वृक्षों को काटकर कांक्रीट के जंगलों का विस्तार करते जा रहे हैं। यदि जल्द ही न चेते तो वह दिन दूर नहीं जब मानव को रेगिस्तान की चिलचिलाती धूप में प्यासा मरना होगा। जंगलों से हमारा मौसम नियंत्रित और संचालित होता है। जंगल की ठंडी आबोहवा नहीं होगी तो सोचो धरती किस तरह आग की तरह जलने लगेगी?

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आज महानगरों के कई लोग जंगलों को नहीं जानत, इसीलिए उनकी आत्माएं सूखी हुई हैं। जरूस और अमेरिका में वृक्षों को लेकर जैन धर्म की मान्यता है कि यह संपूर्ण जगत आत्मा का ही खेल है। वृक्षों में भी महसूस करने और समझने की क्षमता होती है। यह बात आज पर्यावरण और जीव विज्ञानियों की शोधों से भी हो चुकी है। जैन धर्म में चैत्य वृक्षों या वनस्थली की परंपरा रही है। इस परम्परा में वृक्षों को काटना अर्थात उसकी हत्या करना महापाप माना गया है।

महावीर कहते थे कि वृक्ष से हमें असीम शांति और स्वास्थ्य  मिलता है। उनके अनुसार चेतना जागरण में पीपल, अशोक, बरगद आदि वृक्षों का विशेष योगदान रहता है। इसीलिए इस तरह के सभी वृक्षों के आस-पास चबूतरा बनाकर उन्हें सुरक्षित करने की परम्परा उन्होंने डाली थी ताकि वहां बैठकर व्यक्ति शांति का अनुभव कर सके। जैन धर्म ने सर्वाधिक पौधों को लगाए जाने का संदेश दिया है। सभी 24 तीर्थंकरों के अलग-अलग 24 पौधे हैं।

बुद्ध और महावीर सहित अनेक महापुरुषों ने इन वृक्षों के नीचे बैठकर ही मोक्ष पाया। यह धर्म वृक्षों को धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि मानता है। आज पर्यावरण विज्ञान भी कहता है कि ये वृक्ष भरपूर ऑक्सीजन देकर व्यक्ति की चेतना को जाग्रत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

भगवान महावीर का दूसरा प्रमुख संदेश प्राणी मात्र के कल्याण के लिए बराबरी व भाईचारे का है। उन्होंने मनुष्य-मनुष्य के बीच भेदभाव की सभी दीवारों को ध्वस्त कर जन्मना वर्ण व्यवस्था का विरोध किया। उनकी मान्यता थी कि इस विश्व में न कोई प्राणी बड़ा है और न कोई छोटा। उन्होंने गुण-कर्म के आधार पर मनुष्य के महत्व का प्रतिपादन किया। वे कहते थे कि ऊँच-नीच, उन्नति-अवनत, छोटे-बड़े सभी अपने कर्मों से बनते हैं; जातिवाद अतात्विक है।

सभी समान हैं न कोई छोटा, न कोई बड़ा। भगवान महवीर की दृष्टि समभावी थी- सर्वत्र समता भाव। वे सम्पूर्ण विश्व को समभाव से देखने वाले तथा समता का आचरण करने वाले साधक थे। उनका प्रतिमान था-जो व्यक्ति अपने संस्कारों का निर्माण करता है, वही साधना का अधिकारी है। उनकी वाणी ने प्राणी मात्र के जीवन में मंगल प्रभात का उदय किया।

एक बार किसी जिज्ञासु ने महावीर जी से यह जिज्ञासा व्यक्त की कि आत्मा आँखों से नहीं दिखाई देती तो क्या इस आधार पर उसके अस्तित्व पर शंका  नहीं की जा सकती? भगवान ने बहुत सुंदर उत्तर दिया , ‘भवन के  सब दरवाजे एवं खिड़कियाँ बन्द करने के बाद भी जब भवन के अन्दर संगीत की मधुर ध्वनि होती है तब आप उसे भवन के बाहर निकलते हुए नहीं देख पाते। किन्तु आंखों से दिखाई न पड़ने के बावजूद संगीत की वह मधुर ध्वनि बाहर खड़े श्रोताओं को सुनायी पड़ती है।

इसी तरह आंखें अरूपी आत्मा को नहीं देख सकती हैं? अमूर्तिक आत्मा का इन्द्रिय दर्शन नहीं होता, अनुभूति होती है। प्रत्येक आत्मा में परम ज्योति समाहित है। प्रत्येक चेतन में परम चेतन समाहित है। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में स्वतंत्र, मुक्त, निर्लेप एवं निर्विकार है। प्रत्येक आत्मा अपने पुरुषार्थ से परमात्मा बन सकती है। शुद्ध तात्विक दृष्टि से जो परमात्मा है वही मैं हूँ और जो मैं हूँ वही परमात्मा हैं। मनुष्य अपने सत्कर्म से उन्नत होता है।

भगवान महावीर ने  प्रत्येक व्यक्ति को मुक्त होने का अधिकार प्रदान किया। मुक्ति दया का दान नहीं है, यह प्रत्येक व्यक्ति का जन्म सिद्ध अधिकार है। जो आत्मा बंधन का कर्ता है, वही आत्मा बंधन से मुक्ति प्रदाता भी है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है; मनुष्य अपने भाग्य का नियंता है; मनुष्य अपने भाग्य का विधाता है। मगर, भगवान महावीर का कर्मवाद भाग्यवाद नहीं है, भाग्य का निर्माता है।


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भगवान महावीर ने अहिंसा की परिधि को विस्तार दिया। आपकी अहिंसा दया एवं करुणा व मैत्री भाव पर आधारित है। आपकी अहिंसा का चिन्तन प्राणी मात्र के प्रति आत्म-तुल्यता एवं बंधुभाव की सहज प्रेरणा प्रदान करता है। आपने अहिंसा को परम धर्म के रूप में मान्यता प्रदान कर धर्म की सामाजिक भूमिका को रेखांकित किया। आर्थिक विषमताओं के समाधान का रास्ता परिग्रह-परिमाण व्रत के विधान द्वारा निकाला।

वैचारिक क्षेत्र में अहिंसावाद स्थापित करने के लिए अनेकांतवादी जीवन दृष्टि प्रदान की। व्यक्ति की समस्त जिज्ञासाओं का समाधान “स्याद्वाद” के दर्शन के द्वारा प्रस्तुत किया।  महावीर के अनुसार मनुष्य को  किसी वस्तु पर एकांत दृष्टि से नहीं अपितु अनेकांत दृष्टि से विचार करना चाहिए। अनेकांत एकांगी एवं आग्रह के विपरीत समग्रबोध एवं अनाग्रह का द्योतक है। इस प्रकार “स्याद्वाद” का अर्थ है- अनेक गुण-धर्म वाली वस्तु के प्रत्येक गुण-धर्म को अपेक्षा से कथन करने की पद्धति। प्रतीयमान विरोधी दर्शनों में अनेकांत दृष्टि से समन्वय स्थापित कर सर्वधर्म समभाव की आधारशिला रखी जा सकती है।

आज मानव की मूलभूत भौतिक आवश्यकताओं एवं मानसिक आकांक्षाओं को पूरा करने वाली न्यायसंगत विश्व व्यवस्था की स्थापना अहिंसा मूलक जीवन दर्शन के आधार पर सम्भव है। भौतिकवादी दृष्टि है- योग्यतम की उत्तरजीविता। इसके विपरीत भगवान महावीर की दृष्टि है- विश्व के सभी पदार्थ परस्पर उपकारक हैं। भौतिकवादी दृष्टि संघर्ष एवं दोहन की वृत्तियों का संचार करती है। अहिंसा की भावना पर आधारित विश्व शान्ति की प्रासंगिकता, सार्थकता एवं प्रयोजनशीलता स्वयंसिद्ध है। विश्व शान्ति की सार्थकता एक नए विश्व के  निर्माण में है

जिसके लिए विश्व के सभी देशों में सद्भावना का विकास आवश्यक है। सह-अस्तित्व की परिपुष्टि के लिए आत्म तुल्यता एवं समभाव की विचारणा का पल्लवन आवश्यक है; अंतरराष्ट्रीय सद्भावना के लिए विश्व बंधुत्व की भावना का पल्लवन आवश्यक है। आज के युग ने मशीनी सभ्यता के चरम विकास से सम्भावित विनाश के जिस राक्षस को उत्पन्न कर लिया है वह किसी यंत्र से नहीं, अपितु “अहिंसा-मंत्र” से ही नष्ट हो सकता है। भगवान महावीर ने प्राणी मात्र के कल्याण के लिए  धर्म-आचरण का जो प्रतिमान एवं कीर्तिमान प्रस्थापित किया है वह अपने आप में अद्भुत है।

महावीर स्वामी के अहिंसा दर्शन
हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तो महावीर स्वामी के अहिंसा दर्शन के आजीवन  अनुयायी बने रहे। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का आधार अहिंसा पर रखकर पूरे संसार के सम्मुख एक अनूठा आदर्श रखा। अहिंसा मूलक आन्दोलन द्वारा बापू ने महावीर के मूल सिद्धांत का महत्व जिस तरह दुनिया के सामने रखा वैसा कोई दूसरा कोई अभी तक नहीं कर पाया । महात्मा गांधी ने 1919 में एक सभा में भाषण देते हुए कहा – “मैं विश्वासपूर्वक कहता हूं कि महावीर स्वामी का नाम इस समय यदि किसी सिद्धांत के लिए पूजा जाता है तो वह है “अहिंसा”।

मैंने  संसार के कई धर्मों का अध्ययन किया है आैर उनके हर अनुकरण योग्य सिद्धांत का आचरण भी मैं करता हूं। हालांकि मैं अपने को एक पक्का सनातनी हिन्दू मानता हूं परन्तु मैं नहीं समझता कि जैन धर्म दूसरे दर्शनों अपेक्षा हल्का है। मै जानता हूं कि जो सच्चा हिन्दू है वह जैन है आैर जो सच्चा जैन है वह हिन्दू है। प्रत्येक धर्म की उच्चता इसी बात में है कि उस धर्म में अहिंसा के तत्व कितने परिमाण में हैं। दुनिया के सामने इस अहिंसा तत्व का प्रतिपादन करने वाले थे महावीर स्वामी।”

संसार का प्रत्येक प्राणी सदैव सुख शंति  व आनन्द चाहता है किन्तु उसका मूल स्रोत न जानने के कारण प्राय: इस प्रयास में सफल नहीं हो पाता। इसके लिए जिस अनित्य शक्ति की कृपा की आवश्यकता है, उसका बोध कराने के लिए भारत की आध्यात्मिक धरा पर समय-समीय पर संतों, महापुरुषों, पीरों, फकीरों का अवतरण होता रहा है, जिन्होंने अपने देशकाल की तद्युगीन परिस्थितियों के अनुरूप समाज में व्याप्त कुरीतियों का निराकरण कर एक स्वस्थ्य समाज की संरचना में अपना महती योगदान दिया। ऐसी ही एक दिव्य विभूति थे- महावीर स्वामी।

आज से करीब ढ़ाई हजार साल पहले (599 ई.पूर्र्व ) एक राजघराने में जन्मे महावीर स्वामी का सम्पूर्ण जीवन त्याग, तपस्या व अहिंसा का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने एक लंगोटी तक का परिग्रह नहीं किया। पूरी दुनिया में पंचशील (सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, अत्सेय व क्षमा) के सिद्धांत देने वाले स्वामी महावीर ने न सिर्फ मानव अपितु सम्पूर्ण प्राणी समुदाय के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया।

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