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जिसके बिना अधूरे कृष्ण उन्हें ही क्यों छोड़ दिया, क्या थी राधा की अंतिम इच्छा?

suman

sumanBy suman

Published on 29 Aug 2018 5:29 AM GMT

जिसके बिना अधूरे कृष्ण उन्हें ही क्यों छोड़ दिया, क्या थी राधा की अंतिम इच्छा?
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जयपुर: राधा की बात हो कृष्ण का जिक्र ना हो भला कैसे संभव हो सकता है। दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे जो ठहरे। तभी तो सभी भक्त कृष्ण को राधाकृष्ण के नाम से पुकारते है। क्योंकि ये दो नाम एक-दूसरे के लिए ही बने हैं और इन्हें अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस नाम के जपने से जीवन रूपी नैया पार लग जाती है। किसी भीमंदिर में चले जाइए हमेशा श्रीकृष्ण के साथ राधा की मूर्ति ही लगाई जाती हैं। अगर आप वृदांवन के भी किसी भी मंदिर में जाएंगे तो आपको कृष्ण के साथ राधा ही मिलेंंगी। कृष्ण से राधा को और राधा से कृष्ण को कोई जुदा नहीं कर सकता, इनका रिश्ता ही इतना गहरा है, लेकिन ये रहस्य आज भी बना हुआ है कि श्रीकृष्ण अपनी प्रिय राधा को छोड़कर मथुरा क्यों चले गए?

कृष्ण ने क्यों छोड़ा राधा प्यारी को?

राधा ने कृष्ण के बिना अपने जीवन को कैसे बिताया? ये सवाल बहुत गहरे हैं, लेकिन सवालों की गहराई में जाने के बाद शायद इसका सही उत्तर मिल जाए। ये तो सभी को पता है कि श्रीकृष्ण का बचपन वृंदावन की गलियों में बीता। नटखट नंदलाल अपनी लीलाओं से सभी को प्रसन्न करते थे। कुछ को परेशान भी करते, लेकिन कृष्ण के साथ ही तो वृंदावन में खुशियां थीं। बड़े होकर कृष्ण ने अपनी बांसुरी की मधुर ध्वनि से अनेकों गोपियों का दिल जीता। सबसे अधिक यदि कोई उनकी बांसुरी से मोहित होता तो वो राधा थीं। परंतु राधा से कहीं अधिक स्वयं कृष्ण,राधा के दीवाने थे।

कृष्ण से बड़ी थी राधा

राधा कृष्ण से उम्र में 5साल बड़ी थीं। वृंदावन से कुछ दूर रेपल्ली नामक गांव में रहती थीं, लेकिन रोज कृष्ण की मधुर बांसुरी की धुन उन्हें वृंदावन खींच लाती थी। जब भी कृष्ण बांसुरी बजाते तो सभी गोपियां उनके आसपासमंडराने लगती , उन्हें रिझाने लगती, लेकिन संगीत को सुनते ही सभी मग्न हो जाती। फिर कृष्ण गोपियों को अपनी धुन पर छोड़कर चुपके से राधा से मिलने उनके गांव पहुंच जाते। धीरे-धीरे वह समय बीता तो कृष्ण को वृंदावन को छोड़ मथुरा जाना था।

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विरह की बेला

वृंदावन में शोक का माहौल हो गया। इधर कान्हा के घर में मां यशोदा तो परेशान थी, लेकिन कृष्ण की गोपियां भी कुछ कम उदास नहीं थीं। कृष्ण को लेने के लिए कंस ने रथ भेजा था। जिसके आते ही सभी ने उस रथ के आसपास घेरा बना लिया। ये सोचकर कि वे कृष्ण को जाने नहीं देंगे। उधर कृष्ण को राधा की चिंता सताने लगी। वे सोचने लगे कि जाने से पहले एक बार राधा से मिल लें। इसलिए मौका पाते ही वे छिपकर वहां से निकल गए।

फिर मिली उन्हें राधा, जिसे देखते ही वे कुछ कह ना सके। राधा-कृष्ण के इस मिलन की कहानी अद्भुत है। दोनों ना तो कुछ बोल रहे थे, ना कुछ महसूस कर रहे थे, बस चुप थे। राधाकृष्ण को ना केवल जानती थी, वरन् मन और मस्तिष्क से समझती भी थीं। कृष्ण के मन में क्या चल रहा है, वे पहले से ही भांप लेती थीं। इसलिए शायद दोनों को उस समय कुछ भी बोलने की आवश्यकता नहीं पड़ी। अतत: कृष्ण, राधा को अलविदा कह वहां से लौट आए। उन्होंने गोपियों को भी मना लिया।

क्यों सूना हुआ वृंदावन

कृष्ण के बिना वृंदावन सूना हो गया। ना कोई चहल थी ना पहल थी और ना ही कृष्ण की लीलाओं की कोई झलक। बस सभी कृष्ण के जाने के ग़म में डूबे हुए थे। परंतु दूसरी ओर राधा को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। क्योंकि उनकी दृष्टि में कृष्ण कभी उनसे अलग हुए ही नहीं थे। शारीरिक रूप से जुदाई उनके लिए कोई महत्व नहीं रखती थी। यदि कुछ महत्वपूर्ण था तो राधा-कृष्ण का भावनात्मक रूप से हमेशा जुड़े रहना।

कृष्ण के जाने के बाद राधा पूरा दिन उन्हीं के बारे में सोचती रहती। वे कृष्ण प्रेम में अपनी शुद्ध खो चुकी थी उन्हें इतना भी होश नहीं था कि आने वाले समय में राधा की जिंदगी क्या मोड़ लेने वाली थी। उन्हें इसका अंदाज़ा भी नहीं था। माता-पिता के दबाव में आकार राधा को विवाह करना पड़ा। विवाह के बाद अपना जीवन, संतान तथा घर-गृहस्थी के नाम करना पड़ा, लेकिन दिल के किसी कोने में अब भी वे कृष्ण का ही नाम लेती थीं।

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राधा ने छोड़ा घर

दिन बीते साल बीत गए और समय आ गया था जब राधा काफी वृद्ध हो गई थी।फिर एक रात वे चुपके से घर से निकल गई, घूमते-घूमते कृष्ण की द्वारिका नगरी में जा पहुंची।

वहां पहुंचते ही उसने कृष्ण से मिलने के लिए निवेदन किया, लेकिन पहली बार में उन्हें वो मौका नहीं मिला। परंतु फिर आखिरकार उन्होंने काफी सारे लोगों के बीच खड़े कृष्ण को खोज निकाला। राधा को देखते ही कृष्ण के खुशी का ठिकाना नहीं रहा, लेकिन दोनों में कोई बात नहीं हुई, क्योंकि वह मानसिक संकेत अभी भी वही थे। उन्हें उस वक्त भी शब्दों की आवश्यकता नहीं थी।

राधा को बनाया देविका

कहते है कृष्ण ने राधा के अनुरोध पर कृष्ण ने उन्हें महल में एक देविका के रूप में नियुक्त करा दिया। वे दिन भर महल में रहती, महल से संबंधित कार्यों को देखती। जब भी मौका मिलता दूर से ही कृष्ण के दर्शन कर लेती, लेकिन फिर भी ना जाने क्यों राधा में धीरे-धीरे एक भय पैदा हो रहा था। जो बीतते समय के साथ बढ़ता जा रहा था। उन्हें फिर से कृष्ण से दूर हो जाने का डर सताता रहता। उनकी यह भावनाएं उन्हें कृष्ण के पास रहने न देतीं। साथ ही बढ़ती उम्र ने भी उन्हें कृष्ण से दूर चले जाने को मजबूर कर दिया। अंतत: एक शाम वे महल से चुपके से निकल गई और ना जाने किस ओर चल पड़ी। वे नहीं जानती थीं कि वे कहां जा रही हैं। आगे मार्ग पर क्या मिलेगा, बस चलती जा रही थी। परंतु कृष्ण तो भगवान हैं, वे सब जानते थे। वे अपने अंतर्मन से जानते थे कि राधा कहां जा रही है।

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राधा ने पुकारा कृष्ण को

फिर वह समय आया जब राधा को कृष्ण की आवश्यकता पड़ी। वो अकेली थी और बस किसी भी तरह से कृष्ण को देखना चाहती थी। यह तमन्ना उत्पन्न होते ही कृष्ण उनके सामने आ गए। कृष्ण को अपने सामने देख राधा अति प्रसन्न हो गई। परंतु वह समय निकट था जब राधा अपने प्राण त्याग कर दुनिया को अलविदा कहना चाहती थी। कृष्ण ने राधा से कहा कि वे उनसे कुछ मांगे, लेकिन राधा ने मना कर दिया। कृष्ण ने फिर से कहा कि जीवन भर राधा ने कभी उनसे कुछ नहीं मांगा। इसलिए राधा ने एक ही मांग की कि ‘वे आखिरी बार कृष्ण को बांसुरी बजाते देखना चाहती थी’। कृष्ण ने बांसुरी ली और बेहद मधुर धुन में उसे बजाया। बांसुरी की धुन सुनते-सुनते राधा ने अपने शरीर का त्याग कर दिया। उनके जाते ही कृष्ण ने अपनी बांसुरी तोड़ दी और कोसों दूर फेंक दी।

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