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पारिवारिक कलह के बावजूद आत्मविश्वास से भरे हैं CM अखिलेश यादव

aman
By aman
Updated on: 28 Dec 2016 10:00 AM GMT
पारिवारिक कलह के बावजूद आत्मविश्वास से भरे हैं CM अखिलेश यादव
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vinod kapoor

लखनऊ: परिवार में कलह और चाचा शिवपाल सिंह यादव से वर्चस्व को लेकर तनातनी के बावजूद सीएम अखिलेश यादव आत्मविश्वास से भरे हैं। ये इस बात से जाहिर होता है कि विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने बुंदेलखंड की बबीना सीट चुनी है। पिछले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) इस सीट से चुनाव हार गई थी।

साल 2012 के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के कृष्णपाल सिंह राजदूत ने सपा के वन्द्रपाल सिंह यादव को 7 हजार से ज्यादा मतों से हराया था। इससे पहले 2007 के विधानसभा चुनाव में भी ये सीट बसपा से पास ही थी। ये सीट 2007 के चुनाव तक सुरक्षित थी। लेकिन परिसीमन के बाद साधारण हो गई।

2002 के बाद सपा नहीं जीत पाई बबिना सीट

आमतौर पर कोई भी सीएम चुनाव में अपने लिए ऐसी सीट चुनते हैं जिसे आसानी से जीता जा सके। या जहां ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़े। लेकिन अखिलेश ने ऐसा नहीं किया। बबीना सीट सिर्फ एक बार सपा के पास रही है। विधानसभा के 2002 के चुनाव में सपा के रतनलाल अहिरवार ने बसपा प्रत्याशी को करीब डेढ़ हजार वोट से हराया था।

सपा के लिए उपजाऊ नहीं रही बुंदेलखंड की जमीन

अखिलेश ने जानबूझकर ऐसी सीट चुनी है जिस पर जीत का इम्पैक्ट दूर तक जाए। बुंदेलखंड में विधानसभा की 19 सीटें हैं, जिसमें सिर्फ सात ही सपा के पास है। बुंदेलखंड की जमीन कभी भी सपा से लिए उपजाऊ नहीं रही। अखिलेश जानते हैं कि बबीना सीट से उनकी जीत बुंदेलखंड की बाकी सीटों पर असर डालेगी।

आगे की स्लाइड में पढ़ें गुटबाजी के बाद भी निराश नहीं अखिलेश ...

कलह, गुटबाजी के बावजूद अखिलेश निराश नहीं

हालांकि वो पार्टी और परिवार में चल रही कलह और गुटबाजी से परेशान जरूर हैं, लेकिन निराश नहीं। वो अक्सर अपने दुख का इजहार सार्वजनिक मंचों से कर दिया करते हैं। मंगलवार 27 दिसंबर को एक कार्यक्रम में उन्होंने न कहते हुए भी अपनी बात कह दी। उन्होंने कहा कि 'दुनिया में अधिकतर सफल लोगों को अपने परिवार के विपरीत काम करना पड़ा है। दुनिया ने उनके उजाले तो देखे लेकिन कितनी रात ऐसे लोगों ने अंधेरे में गुजारी, इस पर किसी का ध्यान नहीं गया।' अखिलेश ने कहा, ये बात मैं कहूं या न कहूं, इसे मैं उन लोगों पर छोड़ता हूं जो अंधरे से निकलकर सफलता की उजियारी दुनिया में आए।'

परिवार में भी विरोध, लेकिन टूटे नहीं

परिवार में अपने से बड़ों का साथ नहीं मिले तो अक्सर आदमी अंदर से टूट जाता है लेकिन अखिलेश के साथ ऐसा नहीं हुआ। वो और मजबूती से सोने की तरह तपकर चमकते हुए सामने आए हैं। अखिलेश मानते हैं कि आपराधिक छवि के लोगों को शामिल किए बिना भी चुनाव जीता जा सकता है। इसीलिए उन्होंने पार्टी अध्यक्ष और पिता मुलायम सिंह यादव को सौंपी 403 प्रत्याशियों की सूची में आपराधिक छवि वाले अतीक अहमद को बाहर रखा। जबकि प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव उन्हें कानपुर की एक सीट से प्रत्याशी घोषित कर चुके हैं। पार्टी के लोग अच्छी तरह जानते हैं कि यदि अखिलेश ने 'वीटो' लगा दिया, तो अतीक को निर्दलीय ही चुनाव लड़ना पड़ेगा।

आगे की स्लाइड में पढ़ें अखिलेश यादव से युवा हैं प्रभावित ...

अखिलेश के कारण युवा सपा से जुड़े

सीएम बनने के बाद अखिलेश ने बडी संख्या में युवाओं को सपा से जोड़ा है। पार्टी भी मानती है कि अखिलेश सपा में अच्छी खासी पकड़ बना चुके हैं। पार्टी का युवा उनके अलावा और किसी की बात सुनने को तैयार नहीं है। सपा के महासचिव अशोक वाजपेयी कहते हैं कि यदि 'अखिलेश बबीना सीट से चुनाव लड़ते हैं तो पार्टी बुंदेलखंड की सभी सीट जीतने में सफल हो सकती है।'

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