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अधिकारों के लिए अब आरपार की लड़ाई लड़ेंगे चौकीदार

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raghvendraBy raghvendra

Published on 19 July 2019 8:13 AM GMT

अधिकारों के लिए अब आरपार की लड़ाई लड़ेंगे चौकीदार
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अलीगढ़/मथुरा: चुनावी सभाओं में चौकीदार नाम का इस्तेमाल करके नरेन्द्र मोदी दूसरी बार प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हो गए मगर हकीकत यह है कि असली चौकीदारों की दशा बदतर होती जा रही है। अपने अधिकारों के लिए कई साल से आंदोलन कर रहे चौकीदार अब आरपार की लड़ाई लडऩे का फैसला किया है।

मथुरा जिला मुख्यालय पर गत दिनों जुटे चौकीदारों ने प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन देकर अपनी मांगों को फिर से उठाया है। उनका कहना है कि वे अंग्रेजों के जमाने से बंधुआ मजदूरों का जीवन जीने को मजबूर हैं। मौजूदा समय में उनका वेतन 2500 है।

चौकीदारों ने कहा कि इतने कम पैसों में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई तो दूर परिवार का पालन-पोषण भी करना मुश्किल है। गांवों से बीसों किलोमीटर दूरी तय करके थाने पहुंचना और सूचना देने के लिए मोबाइल का खर्चा भी उन्हें जेब से भरना पड़ता है। चौकीदारों की मांग है कि उन्हें अन्य राज्यों की तरह राज्य कर्मचारी का दर्जा देते हुए उनका मासिक वेतन 25000 रुपये किया जाए।

पुलिस थानों पर खहाब व्यवहार

ज्ञापन देने से पहले चौकीदारों ने मुख्य डाकघर परिसर में सभा करते हुए सरकार को चेतावनी दी। उन्होंने तर्क दिया कि बिहार, महाराष्ट्र, हरियाणा व मध्य प्रदेश में क्रमश: 22000, 18500, 17500 व 8000 रुपये मासिक मानदेय दिया जा रहा है। मध्य प्रदेश में चौकीदारों को राज्य कर्मचारी घोषित किया गया है। लिहाजा समान काम-समान वेतन का कायदा संवैधानिक तौर से इस सूबे में भी लागू होना चाहिए। चौकीदारों ने कहा कि पुलिस थानों पर उनके साथ पशुवत व्यवहार किया जाता है।

अलीगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक आकाश कुलहरि ने ऐसी शिकायतों पर थानेदारों को दंडित किये जाने का भरोसा दिया है मगर ग्रामीण चौकीदार वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष नीटू चौधरी का मानना है कि यह कतई असंभव है। वजह है कि थानों में चौकीदारों को जमीन पर बैठाया जाता है और अफसरों के मुआयना के दौरान उन्हें छिपा दिया जाता है।

चौकीदारों पर ध्यान नहीं दे रहे पीएम

सूबे की कानून व्यवस्था में चौकीदारों की अहम भूमिका है। हर गांव में चौकीदार सुरक्षा व सूचना तंत्र के नेटवर्क का पर्याय माना जाता है। उनकी गोपनीय सूचनाओं के भरोसे ग्रामीण इलाकों में अपराधिक गतिविधियों को नियंत्रित किया जाता है। इन चौकीदारों को राजनीति का शिकार भी बनाया गया। इस बार लोकसभा चुनाव के दौरान अलीगढ़ में एक चुनावी सभा में चौकीदार प्रधानमंत्री तक अपनी फरियाद पहुंचाना चाहते थे मगर सभास्थल पर पुलिस ने सबको तितर-बितर कर दिया।

चौकीदारों को शिकायत है कि चुनावों से पहले देश के मुखिया विभिन्न संस्थाओं के निजी सुरक्षा गार्डों से तो मुखातिब हुए पर वास्तविक चौकीदारों को भुला दिया गया। उन्हें ड्रेस देने में भी झांसे में रखा गया। सूबे में चौकीदारों की तादाद तकरीबन 70,900 है, जो काफी दिनों से अपनी आवाज ऊपर तक पहुंचाने की कोशिश में जुटे हैं मगर उनकी मांग पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही।

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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