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भाजपा के पास रमाकांत यादव का विकल्प ही नहीं

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raghvendraBy raghvendra

Published on 24 Aug 2018 7:56 AM GMT

भाजपा के पास रमाकांत यादव का विकल्प ही नहीं
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संदीप अस्थाना

आजमगढ़: भाजपा के पास बाहुबली रमाकान्त यादव का कोई विकल्प नहीं दिख रहा है। अमर सिंह के पीछे हट जाने के कारण अब उनकी उम्मीदवारी तय मानी जा रही है। जानकारों के मुताबिक पार्टी हाईकमान ने भी रमाकांत को हरी झंडी दे दी है। इसके साथ ही आजमगढ़ मंडल की घोसी संसदीय सीट से अमर सिंह की करीबी सिने तारिका जयाप्रदा को चुनाव लड़ाया जा सकता है। ऐसी परिस्थितियों में इन दोनों सीटों पर भाजपा जीत भी सकती है। मुलायम सिंह के इस बार यहां से चुनाव न लडऩे की घोषणा के बाद भाजपा उम्मीदवार के रूप में रमाकांत यादव की जीतने की मजबूत संभावनाएं दिख रही हैं।

आजमगढ़ की राजनीति में रमाकान्त यादव को जनाधार वाला नेता माना जाता है। इसके साथ ही उनका अपना बाहुबल भी है। यही कारण है कि वह पांच बार इस जिले की फूलपुर सीट से विधायक व आजमगढ़ संसदीय सीट से चार बार सांसद रहे। आजमगढ़ संसदीय सीट पर भाजपा का परचम कभी नहीं लहरा सका था। रमाकांत के कमल सिम्बल पर चुनाव लडऩे पर भाजपा ने पहली बार जीत का स्वाद चखा। वैसे भाजपा ने भी ईमानदारी से इस सच्चाई को स्वीकार किया और रमाकान्त को यथोचित सम्मान भी दिया। इसके विपरीत रमाकान्त खुद को दल से बड़ा समझने लगे और पार्टी की धारा से विपरीत हटकर सवर्ण व पिछड़ों की बात करने लगे। दल के हर व्यक्ति को उनकी अनाप-शनाप की बयानबाजी रास नहीं आई।

कब ज्यादा बिगड़ गयी बात

भाजपा हाईकमान हमेशा बाहुबली रमाकांत की बयानबाजी को अनसुनी करता रहा। हद तो तब हो गयी जब उन्होंने देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह के खिलाफ मीडिया में बयान दे डाला। ज्यादा किरकिरी तब हुई जब उन्होंने सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ बयान देते हुए सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठा दिए और यूपी की सरकार को सवर्णों की सरकार कहने लगे। यह बात योगी तक पहुंच भी गयी। जबकि सच यह है कि रमाकांत की हिन्दुत्ववादी कार्यशैली के कारण योगी आदित्यनाथ हमेशा रमाकांत को अपना करीबी मानते रहे हैं। इन परिस्थितियों में योगी ने रमाकान्त यादव के सिर से अपना हाथ हटा लिया। तभी से यह लगने लगा कि अब रमाकांत भाजपा से उम्मीदवारी नहीं पा सकेंगे।

बीच के दिनों में रमाकांत ने भी अपने वाहन से भाजपा का झंडा हटाकर इन हवाओं को बल दिया। यह भी चर्चाएं तेजी से फैलीं कि रमाकांत सपा में जा रहे हैं। बाद में अखिलेश यादव ने रमाकांत को सपा में लेने से इनकार कर दिया। ऐसे में रमाकान्त फिर भाजपा में लाइन बनाने लगे। पहले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने फोन पर रमाकान्त को आश्वासन दिया कि उन्हें लड़ाया जाएगा। बाद में रमाकांत दिल्ली जाकर अमित शाह से मिले और चर्चा है कि उन्हें हरी झंडी मिल गयी है। ऐसे में उनके वाहन पर फिर से भाजपा का झंडा लहराने लगा है।

कुछ दिनों तक चला अमर सिंह का नाम

सपा से हटने के बाद अमर सिंह की भाजपा में नजदीकियां बढ़ीं। वह कई मौकों पर केसरिया रंग में रंगे नजर आए। उन्होंने खुलकर देश व प्रदेश की सरकारों की कार्यशैली की तारीफ भी की। मोदी के कशीदे पढ़े। जब रमाकांत को भाजपा लड़ाने के मूड में नहीं थी तो बेहतर विकल्प के रूप में अमर सिंह ही दिखे। इसी बीच भासपा के ओमप्रकाश राजभर आजमगढ़ व घोसी की सीट भाजपा से अपने लिए मांगने लगे। राजभर ने अमर सिंह से मिलकर अपने दल से आजमगढ़ से चुनाव लडऩे का ऑफर भी दे दिया। अमर सिंह व ओमप्रकाश राजभर के बीच पहले से ही बेहतर रिश्ते हैं। यही वजह रही कि हर कोई यह मानने लगा कि अमर सिंह ही इस सीट से भाजपा से या भाजपा गठबंधन के घटक दल भासपा से चुनाव लड़ेंगे। इसके विपरीत राज्यसभा में अमर सिंह की सदस्यता अभी 2022 तक रहेगी। इसी वजह से अमर सिंह ने चुनाव लडऩे से मना कर दिया।

भासपा के हिस्से में जाने पर भी लड़ेंगे रमाकांत

आजमगढ़ व घोसी संसदीय सीट यदि भाजपा गठबंधन के घटक दल भासपा के हिस्से में गयी तो भी रमाकांत का आजमगढ़ से व जयाप्रदा का घोसी से भासपा के टिकट पर चुनाव लडऩा तय माना जा रहा है। इसकी वजह यह है कि रमाकांत के अमर सिंह से बेहतर रिश्ते हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि अमर सिंह ओमप्रकाश राजभर से रमाकांत की पैरवी करेंगे। अमर सिंह व ओमप्रकाश के बीच बड़े व छोटे भाई का रिश्ता है। कुल मिलाकर आजमगढ़ में भाजपा गठबंधन के पास रमाकांत का कोई विकल्प नहीं दिख रहा है।

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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