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मायावती का राजनीति में 'अंत' या 'अंतः अस्ति प्रारंभः'

BSP Mayawati: मायावती अब दार-ओ-मदार खुद पर लेने के बाद बहुजन समाज पार्टी में दोबारा जान फूंक पाएंगी।

Snigdha Singh
Published on: 2 March 2025 3:54 PM IST (Updated on: 6 March 2025 4:41 PM IST)
मायावती का राजनीति में अंत या अंतः अस्ति प्रारंभः
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Mayawati (Photo: Social Media)

UP Politics: मायावती, सियासी अखाड़ों की मजबूत खिलाड़ी। पहली महिला दलित मुख्यमंत्री और सबसे कम उम्र में सीएम बनने वाली महिला। ऐसे न जाने कितने रिकॉर्ड हैं, जो राजनीति में मायावती ने अपने नाम किए। बसपा प्रमुख मायावती पहली बार 1995 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। वर्ष 2012 में समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज कर अखिलेश यादव सीएम बनाया। इसके बाद बहुजन समाज पार्टी में तोड़-फोड़ या यूं कहें कि भरोसेमंद नेताओं के अभाव में कमजोर हो गई। वर्तमान की स्थिति में यह कह पाना मुश्किल है कि मायावती अंत की ओर हैं या अंत से नई शुरुआत है।

बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती चार बार मुख्यमंत्री तो सात बार बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुकी हैं। पल पल बदलती सियासत को बखूबी समझती हैं। बावजूद इसके पार्टी अंत की ओर है। विधानसभा और लोकसभा चुनाव में अपने खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी एक बार फिर उबरने की राह ढूंढ रही है। बता दें राज्य में तकरीबन 22 फ़ीसद दलित आबादी है। पुराने आंकड़ें देखें तो बसपा ब्राह्मण और दलितों की राजनीति करती आई है। कुछ सीटें ऐसी रहीं जहां मुस्लिमों का भी साथ मिला है। 12-14 फीसद ब्राह्मण मतदाता हैं। मायावती की निष्क्रियता से ब्राह्मण वोट भाजपा में शिफ्ट हो गया। दलित वोट सपा में चला गया। इसका बसपा को भारी नुकसान हुआ। मायावती की भतीजे से 'माया' खत्म होने में इतनी देर हो गई कि पार्टी अपनी अंतिम सांसों तक पहुंच गई। अब पार्टी को संकटमोचक का इंतजार है।

मायावती को नहीं मिला कोई अपना

बसपा के कमजोर होने की एक वजह ये भी मानी जाती है कि कोई भरोसेमंद और अपना समझने वाला नेता नहीं मिला। सबने अपनी राजनीति चमकाई और वक्त के साथ दूसरे का दामन थाम आगे बढ़ गए, पार्टी पीछे ही रह गई। हालांकि सियासी जानकारों का कहना है कि मायावती राजनीति में कुछ समय के लिए गायब या कहें कि निष्क्रिय रहीं। इससे इंद्रजीत सरोज, लालजी वर्मा और सुखदेव राजभर ने बहुजन समाज पार्टी को छोड़ दिया। सुखदेव अपने बेटे को अखिलेश यादव की पार्टी से जोड़ गए। हरीशंकर तिवारी भी अपने बेटों और भांजे को सपा की साइकिल पर सवार कर गए। ऐसे में पूर्वांचल की राजनीति में मायावती कमजोर हो गई। ये दोनों ओबीसी और ब्राह्मण के दो बड़े चेहरे रहे। वहीं, अब ब्राह्मणों से जोड़ने के लिए मायावती ने पार्टी के महासचिव सतीश चंद्र मिश्र को ज़िम्मेदारी दी हुई है।

जब सियासत के स्वर्णिम काल में थी मायावती

मायावती 1977 में बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम के संपर्क में आईं। इसके बाद मुजफ्फरनगर जिले की कैराना सीट 1984 में पहली बार चुना लड़ीं लेकिन हार गईं। इसके बाद बिजनौर में 1985 और हरिद्वार से 1987 में फिर चुनाव हार गईं। इसके बाद 1989 में पहली बार लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज कर सांसद बनीं। 1994 में दूसरी बार जीत दर्ज करके राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुईं। इसके बाद 3 जून 1995 से 18 अक्टूबर 1995 तक 137 दिन के लिए सीएम बनीं। दूसरी बार 21 मार्च 1997 से 21 सितम्बर 1997 तक 184 दिन प्रदेश की मुखिया रहीं। 3 मई 2002 से 29 अगस्त 2003 यानी 1 साल, 118 दिन सीएम रहीं। इसके बाद चौथी बार बहुजन समाज पार्टी ने भारी जीत दर्ज कर मायावती ने चार साल, 307 दिन सरकार चलाई। 2007 के चुनाव तक मायावती सियासत के स्वर्णिम काल में रहीं लेकिन इसके बाद पार्टी अपना वजूद खोती रही।

आज क्या है पार्टी की स्थिति

मायावती ने 2007 में 206 सीटों में प्रचंड जीत हासिल कर सरकार बनाई। इसके 2012 के विधानसभा चुनाव में ये सीटें घटकर 80 सीटें ही बचीं। इसके बाद साल 2017 में मात्र 19 विधायक ही बसपा के कोटे में गए। वहीं, 2022 के चुनाव जो स्थिति रही वह न के बराबर ही थी। 403 में से बसपा को मात्र एक सीट बलिया की रसड़ा विधानसभा से मिली। यहां उमाशंकर सिंह ने 6585 मतों से तीसरी बार जीत दर्ज की। वहीं, 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा को 10 सीटें में सफलता मिली थी जबकि 2024 में शून्य रहीं। संसदीय चुनाव में बसपा बाहर हो गई।

पारिवारिक कलह में जूझ गई पार्टी

लोकसभा चुनाव से पहले मायावती ने जिस तरह से भतीजे आकाश आनंद को आगे लाकर रणनीति तय की थी, उससे यह लग रहा था कि पार्टी एक बार फिर अपना अस्तित्व बचा पाएगी। उत्तराधिकारी घोषित होने के बाद आकाश आनंद ने कई रैलियां भी की लेकिन चुनाव से पहले ही मायावती ने उत्तराधिकारी पद से हटा दिया। इसके बाद रैलियां भी कैंसिल हो गई। वहीं, मायावती ने आकाश आनंद के ससुर अशोक सिद्धार्थ द्वारा पार्टी में तोड़ फोड़ का आरोप लगाते हुए पार्टी से बाहर कर दिया। बसपा सुप्रीमो ने रविवार को बैठक बुलाकर सभी को किनारे कर दिया। उन्होंने बड़ा ऐलान करते हुए यहां तक कह दिया कि जब तक उनकी सांसें हैं तब तक पार्टी का कोई उत्तराधिकारी नहीं होगा। वह खुद ही मोमेंट आदि को लीड करेंगी। भाई-भतीजों के बीच में मायावती किसी और को भी मौका नहीं दे पायी।

मायावती सियासत का बड़ा चेहरा हैं। पार्टी का दार-ओ-मदार खुद पर लेने के बाद अब आगामी चुनावों में इसका क्या असर होगा, ये देखनी वाली बात होगी।

Snigdha Singh

Snigdha Singh

Leader – Content Generation Team

Hi! I am Snigdha Singh, leadership role in Newstrack. Leading the editorial desk team with ideation and news selection and also contributes with special articles and features as well. I started my journey in journalism in 2017 and has worked with leading publications such as Jagran, Hindustan and Rajasthan Patrika and served in Kanpur, Lucknow, Noida and Delhi during my journalistic pursuits.

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