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सभी काम छोड़ गोवंश संभालने में जुटा सरकारी तंत्र

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raghvendraBy raghvendra

Published on 8 Feb 2019 8:20 AM GMT

सभी काम छोड़ गोवंश संभालने में जुटा सरकारी तंत्र
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कपिल देव मौर्य

जौनपुर: प्रदेश में पशु वध पर रोक लगाए जाने के बाद सरकारी तंत्र गोवंश के इर्द गिर्द ही घूमता दिख रहा है। वैसे छुट्टा जानवरों की संख्या में लगातार हो रही वृद्धि से आम जनमानस खासा परेशान व पीडि़त है। आजकल सबसे बड़ी समस्या छुट्टा जानवरों की है। शहर की सडक़ों पर दुर्घटनाओं को दावत देने के साथ ही गांवों में फसलों के लिए छुट्टा जानवर बड़ी समस्या बन गए हैं। छुट्टा जानवरों के बारे में जारी शासनादेश के बाद सरकारी तंत्र सभी कार्यों को छोडक़र बेसहारा पशुओं को पशु आश्रय केन्द्र तक पहुंचाने की मुहिम में जुटा नजर आ रहा है ताकि अन्नदाताओं की फसलों को बर्बाद होने से बचाया जा सके। इसके बाद भी इस समस्या से छुटकारा नहीं मिल सका है। किसान दिन रात अपनी फसलों की रखवाली करने को मजबूर है। एक खबर के मुताबिक पशु आश्रय केन्द्रों पर जानवरों के खानपान की जिम्मेदारी नगरपलिकाओं व ग्राम पंचायतों को दी गई है। वैसे सरकार ने इसके लिए अलग से किसी बजट की व्यवस्था नहीं की है।

शासन से जारी शासनादेश आने के बाद जिला प्रशासन की प्राथमिकता में अब छुटटा जानवर आ गये हैं। फसलों को बचाने की पहल शुरू करते हुए छुट्टा जानवरों को पकडऩे का अभियान तेज कर दिया गया है। सरकारी आंकड़ों की मानें तो अब तक लगभग 1087 बेसहारा पशुओं को स्थायी एवं अस्थायी पशु आश्रय केन्द्र भेजा जा चुका है। आश्रय पाने वाले जानवरो की टैगिंग की जा रही है। उनका परीक्षण कराकर टीकाकरण एवं कीटनाशक दवाएं दी जा रही हैं।

खबर है कि जिला प्रशासन ने शासनादेश आने के बाद तय किया है कि स्थायी पशु आश्रय केन्द्र बनने तक नगर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में विकासखंड स्तर पर अस्थायी पशु आश्रय केन्द्र बनाकर बेसहारा पशुओं को उसमें रखा जाए। हालांकि सरकार ने पहले 10 जनवरी तक पशुओं को आश्रय केन्द्र पहुंचाने का निर्देश दिया था, लेकिन लिखित आदेश न मिलने के कारण सरकारी स्तर पर केवल कागजी बाजीगरी का खेल चल रहा था, लेकिन शासनादेश जारी होने के बाद से इस कार्य में तेजी देखने को मिली है। प्रशासन के आदेश पर तहसील ब्लाक से लेकर नगर पालिकाओं के अधिकारी तक छुट्टा पशुओं को संरक्षण प्रदान करने की कवायद में जुट गए हैं।

पशुओं का चिकित्सकीय परीक्षण होगा

इस सन्दर्भ में जिला मुख्य पशु चिकित्साधिकारी डा.वीरेन्द्र सिंह ने बताया कि पशु आश्रय केन्द्र पहुंचाए गए जानवरों का चिकित्सकीय परीक्षण कराया जाएगा। साथ ही उनका बधियाकरण भी कराया जाएगा। डा.सिंह का मानना है कि छुट्टा जानवरों में नर पशुओं की गुणवत्ता अच्छी नहीं होती है। इनसे गर्भ धारण करने वाली गाय अथवा भैंसे अच्छे नस्ल के बच्चे नहीं दे सकेंगे और दूध भी कम ही मिलेगा। इसलिए इनका बन्ध्याकरण उचित रहेगा ताकि इनकी आक्रामकता कम रहे। नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी कृष्णचंद के अनुसार नगरीय क्षेत्र में वाहन लगाकर नगरपालिका कर्मचारियों द्वारा छुट्टा जानवरों को पकडक़र कृषि भवन परिसर में अस्थायी रूप से बनाए गए पशु आश्रय केन्द्र पहुंचाया जा रहा है। इसके बाद भी शहर की गलियों से लगायत सडक़ों तक बेसहारा पशुओ की जमात देखी जा सकती है जो हर समय दुर्घटनाओं दावत देती दिखती है।

खबर है कि तहसील एवं विकासखंड स्तर के अधिकारी कर्मचारी सभी कार्यों को छोडक़र इन दिनों छुट्टा जानवरों के पीछे परेशान दिख रहे हैं मगर इसके बाद भी जिले में छुट्टा जानवरों से किसानों को कोई राहत मिलती नहीं दिख रही है। ग्रामीण फसलों को बचाने के लिए दिन-रात अपने खेतों की रखवाली करते देखे जा रहे हैं। वहीं आज भी छुट्टा जानवरों को ग्राम पंचायत भवन से लेकर अन्य सरकारी भवनों के परिसरों में कैद किये जाने की घटना आये दिन देखने और सुनने को मिल रही है।

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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