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होली से ज्यादा है गंगामेला का महत्व, 1942 में यहां फहराया था तिरंगा

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AdminBy Admin

Published on 28 March 2016 7:56 AM GMT

होली से ज्यादा है गंगामेला का महत्व, 1942 में यहां फहराया था तिरंगा
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कानपुरः देश भर में रंगों का त्योहार होली भले ही खत्म हो गया हो मगर उत्तर प्रदेश का औदयोगिक नगर कानपुर एक बार फिर रंगों के समंदर में डूब जाने को तैयार है। होली की यह अनूठी परंपरा आज से 75 साल पहले 1942 में अंग्रेजी हुकूमत के विरोध स्वरूप शुरू हुयी थी। हटिया बाजार और पुराने मोहल्ले सहित पूरे शहर में लगातार सात दिनों तक जमकर होली खेली जाती है। इसे गंगामेला के नाम से जानते हैं।

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देश की आजादी से जुड़ा है इतिहास

हटिया बाजार की होली और गंगामेला के साथ देश की आजादी की लड़ाई का एक इतिहास जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि साल 1942 में होली के दिन यहां के नौजवानों ने रज्जन बाबू के पार्क में लगे बिहारी भवन से भी ऊंचे लोहे की रॉड पर तिरंगा फहरा दिया था। इसके बाद वे गुलाल उड़ाते हुए नाच-गा रहे थे। इसकी जानकारी मिलते ही अंग्रेज सिपाही घोड़े पर सवार होकर वहां पहुंचे और झंडा उतारने का आदेश दिया। इसके बाद नौजवानों और अंग्रेजों में जंग छिड़ गई। तिरंगा फहराने और होली मनाने के विरोध में हमीद खान, बुद्धूलाल मेहरोत्रा, नवीन शर्मा,गुलाब चंद्र सेठ, विश्वनाथ टंडन, गिरिधर शर्मा सहित एक दर्जन से अधिक लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

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अंग्रेजों का हुआ था विरोध

अंग्रेजों के इस कृत्य के बाद उनका जमकर विरोध शुरू हो गया और गिरफ्तारी के विरोध में कानपुर का पूरा बाजार बंद हो गया। विरोध दर्शाते हुए लोगों ने अपने चेहरे के रंग तक नहीं साफ किए। शहर की दुकानें और प्रतिष्ठानों में ताले लगा दिए गये। यहां तक कि इसके विरोध में मीलों और फैक्ट्रियों के मजदूर तक हड़ताल पर चले गए और कानपुर पूर्ण रूप से बंद हो गया। पुराने लोगों की माने तो इस बंदी और विरोध का स्वर और कानपुर आंदोलन की गूंज सात समंदर पार तक पहुंच गई। फिर भी अंग्रेज बंदी युवकों को छोड़ने को तैयार नहीं हुए तो शहर के लोग आंदोलन पर अड़े रहे।

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अनुराधा नक्षत्र' की तिथि को छोड़े गए सभी युवक

इससे उस आंदोलन ने तीसरे दिन तक और तेजी पकड़ ली और तब अंग्रेजों की जड़ें हिल गयी। हड़ताल के चौथे दिन अंग्रेजों के एक अफसर ने आकर लोगों से बात की। इसके बाद होली के पांचवे दिन पकड़े गए सभी युवकों को छोड़ने का एलान किया गया। उस दिन अनुराधा नक्षत्र' की तिथि थी। इस दौरान पूरे शहर के लोग जेल के बाहर इकट्ठा हो गए थे। जेल में बंद युवकों ने भी अपने चेहरों से रंग नहीं छुड़ाया था।

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जेल से रिहा होने के बाद सबने खेली होली

जेल से रिहा होने के बाद जुलुस निकाल कर इन सबको सरसैया घाट स्नान के लिए ले जाया गया और जो होली, होलिका दहन के बाद नहीं खेली जा सकी थी, वह उस दिन गुलाल लगाकर खेली गयी। तभी से होलिका दहन से लेकर 'अनुराधा नक्षत्र' की तिथि तक कानपुर में होली खेली जाती है। अनुराधा नक्षत्र के दिन कानपुर का रंग कुछ और ही दिखाई देता है। धर्म, जाति, वर्ग, अमीर-गरीब की दीवारें गिर जाती हैं और दोपहर तक पूरा शहर होली में सराबोर हो जाता है। इसके बाद शाम के समय सरसैया घाट के तट पर ही उन आजादी के मतवालों की याद को जिंदा रखते हुए शहरवासी होली गंगा मेला मिलन समारोह का वृहद आयोजन करते हैं।

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क्या कहते हैं स्थानीय लोग?

सालों से चली आ रही इस परंपरा को हर साल निभाया जाता था। हालांकि अब केवल दो दिन ही होली खेली जाती है। गंगा मेला के दिन यहां खूब होली खेली जाती है। साथ ही ठेले पर रंग का जुलूस निकाला जाता है। यह हटिया बाजार से शुरू होकर नयागंज,बिरहाना रोड , चौक सर्राफा सहित कानपुर के आधा दर्जन पुराने मोहल्ले से होते हुए रज्जन बाबू पार्क में आकर खत्म होता है। जहां से लोग जुलूस के साथ निकलते है, वहां महिलायें और बच्चे छतों से रंग और पानी उन होरियारों पर डालते है। इसके बाद शाम को सरसैया घाट पर गंगा मेला का आयोजन किया जाता है। यहां शहर भर के लोग इकट्ठा होते हैं और दूसरे शहरी भी मेले में अपनी भागीदारी निभाते हैं। यह एक ऐसा लोकोत्सव है, जिसमें सही मायने में पूरा शहर शामिल होता है।

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