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भ्रस्टाचार में फंसे अफसर को बचाने का खेल

raghvendra

raghvendraBy raghvendra

Published on 17 Aug 2018 7:40 AM GMT

भ्रस्टाचार में फंसे अफसर को बचाने का खेल
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योगेश मिश्र

लखनऊ: ऐसा बिरले ही होता है कि किसी मामले में कोई हुक्मरान साफ तौर से फंसा हो और उसके बचाव के लिए वकील का पैसा भी उसके काडर की राज्य सरकार दे रही हो। कोयला घोटाले से जुड़े आठ मामलों के आरोपी के एस क्रोफा ऐसे ही खुशनसीब अफसर रहे हैं। उनका मुकदमा लडऩे के लिए मेघालय सरकार ने भारी भरकम धनराशि पर अपनी ओर से वकील उपलब्ध कराया था।

केंद्र सरकार में गोलमाल और राज्य सरकार से बचाव का कमाल। यह दिखा पाना केवल किसी अफसर के बूते का काम नहीं हो सकता है। केंद्र की कांग्रेस सरकार में क्रोफा गोलमाल कर रहे थे और राज्य की कांग्रेस सरकार क्रोफा के बचाव में वकील खड़ा कर रही थी। मेघालय के मुख्यमंत्री मुकुल संगमा ने इस मद पर लाखों रुपये पानी की तरह बहाए।

आरोप के बावजूद बने मुख्य सचिव

क्रोफा असम मेघालय कैडर के 1982 बैच के आईएएस अफसर थे। बीते 30 जुलाई को वह मेघालय के मुख्य सचिव के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। 29 फरवरी 2016 को मेघालय सरकार ने उन्हें मुख्य सचिव बनाया था। वह भी तब जब उन पर कोयला घोटाले से जुड़े 8 मामलों में शामिल होने का आरोप था। कोयला घोटाले के समय वे कोयला मंत्रालय में संयुक्त सचिव थे। सीबीआई की विशेष अदालत ने उन्हें कोल ब्लाक आवंटन का दोषी माना है।

दिलचस्प ये है कि क्रोफा को पद से हटने के लिए कहा गया तो मेघालय सरकार की मेहरबानी उन पर बरस गई और वे मुख्य सचिव बना दिए गए। सीबीआई की आपत्ति पर रुका सिलसिला मेघालय के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुकुल संगमा से क्रोफा ने यह आदेश करा लिया कि कोल गेट मामले में सीबीआई अदालत में उनके वकील का खर्च राज्य सरकार वहन करेगी। कांग्रेस नीत केंद्र सरकार में हुए घोटाले का बचाव कांग्रेस की राज्य सरकार कर रही थी।

क्रोफा को एक लाख सत्तर हजार रुपये प्रति तारीख वकील पर खर्च करने का आदेश मेघालय सरकार से हो गया। इसमें एक लाख रुपये वकील की फीस थी। बाकी सत्तर हजार उनके सहयोगियों की। बाद में सीबीआई ने इसे भी सरकारी धन के दुरुपयोग और क्रोफा के पद के दुरुपयोग से जोडक़र अदालत में दलील दी तो तब जाकर सरकारी पैसे पर मुकदमा लडऩे की सहूलियत खत्म हो पाई।

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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