दिल्ली की हार ने यूपी में बढ़ाई बसपाइयों की चिंता

सुशील कुमार

मेरठ: दिल्ली विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार से उत्तर प्रदेश के बसपाईयों में बेचैनी है। यह बैचेनी इसलिए और भी ज्यादा है क्योंकि पिछले कुछ चुनावों में उत्तर प्रदेश में भी बसपा को मायूसी ही हाथ लगी है। ऐसे में जबकि उत्तर प्रदेश के 2022 के चुनाव नजदीक आ रहे हैं, बसपा में चिंता बढऩा लाजिमी है। उत्तर प्रदेश में पहले से ही लगातार पार्टी का ग्राफ गिर रहा है, अब और गिरने के खतरे से इनकार नहीं किया जा सकता।

दिल्ली विधानसभा चुनाव के रिजल्ट बताते हैं कि लाख कोशिशों के बावजूद भी दिल्ली के दलितों के बीच बसपा प्रमुख मायावती जगह नहीं बना सकीं। अनुमान है कि दिल्ली में 20 लाख से ज्यादा दलित मतदाता हैं। यहां 12 आरक्षित सीट हैं। इसके बावजूद बसपा को करारी हार झेलनी पड़ी है। सभी 12 रिजर्व सीटों पर बसपा को पिछले चुनावों के मुकाबले कम वोट मिले हैं। 2015 के चुनाव में बसपा को करीब 1.3 प्रतिशत वोट मिला था जो इस बार घट कर .70 प्रतिशत से कम रह गया। दिल्ली में उसके ज्यादातर उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। यानी साफ है कि पार्टी का दलित बेस भी छिटक रहा है।

दिल्ली विधानसभा केचुनाव नतीजे बसपा के लिए खतरे की घंटी इसलिए भी माना जा रहा है क्योंकि प्रदेश में कई बड़े बसपा नेता या तो खुद पार्टी छोड़ कर चले गये हैं या फिर उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते पार्टी से बाहर का रास्ता दिखला दिया गया है। इनमें इनमें रामपुर मनिहारन के पूर्व विधायक और बीएसपी के पूर्व जोनल को-ऑर्डिनेटर रविंद्र कुमार मोल्हू,बस्ती लोकसभा सीट से बीएसपी के पूर्व सांसद लालमणि प्रसाद, आगरा और अलीगढ़ जोन के लंबे समय तक कॉर्डिनेटर रहे पूर्व एमएलसी सुनील चित्तौड़,पूर्व मंत्री नारायण सिंह सुमन, दो पूर्व विधायक कालीचरण सुमन और स्वदेश सिंह, पूर्व विधायक धर्मपाल सिंह, सूरजपाल, भगवान सिंह कुशवाहा, मेरठ की महापौर सुनीता वर्मा, उनके पति पूर्व विधायक योगेश वर्मा प्रमुख रूप से शामिल हैं। सुनीता वर्मा यूपी में बसपा की इकलौती मेयर हैं। उनके पति योगेश वर्मा भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बसपा के बड़े दलित नेता माने जाते हैं।

बहरहाल,बसपा से बाहर किए गए नेता जिस तरह अब बगावत कर आक्रामक रूप में आ गए हैं उससे बसपा की साल 2022 के विधानसभा की तैयारी प्रभावित हो सकती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यदि देखें तो बसपा के पास अब कोई ऐसा प्रभावी नेता नजर नहीं आ रहा है, जो अपने दम पर हजारों की भीड़ जुटा सके। लगातार हो रही कार्रवाई की जद में अनुसूचित जाति के नेता ही नहीं अन्य जाति और वर्ग के नेता भी आ रहे हैं। जिसके चलते ये नेता बगावत कर पार्टी को नुकसान पहुंचा सकते हैं। गौरतलब है कि गठबंधन के बल पर उत्तर प्रदेश में बसपा को दस सीटें मिली थी, जिनमें वेस्ट यूपी से बसपा के हिस्से में चार सीटें सहारनपुर, अमरोहा, नगीना और बिजनौर आई हैं। वेस्ट यूपी में दलित मुस्लिम एकता के चलते बसपा की कामयाबी मानी जा रही है। बसपा की असल चिंता और बैचेनी की वजह यही है कि दिल्ली के नतीजों का असर अगर यहां पड़ा तो उसका दलित मुस्लिम समीकरण गड़बड़ा सकता है।

उत्तर प्रदेश में बसपा सुप्रीमो मायावती अपने राजनीतिक सफर के शीर्ष पर 2007 में पहुंची थीं, जब वो चौथी बार उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज हुई थीं। इससे पहले कभी भी बसपा अपने दम पर सत्ता में आने में कामयाब नहीं हो पाई थी। 2012 में उनकी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। इन चुनावों में बसपा 403 में से महजद 87 सीटों पर ही जीत दर्ज कर पाई थी। 2014 के लोकसभा चुनावों में बसपा का प्रदर्शन और खराब रहा। नरेंद्र मोदी की लहर के सामने उनकी पार्टी संसद में अपना खाता तक नहीं खोल पाई थी। इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनावों में महज 19 सीटों पर सिमट कर रह गई। यह अब तक का उनकी पार्टी का सबसे खराब प्रदर्शन रहा था।

मायावती की परेशानी तब और बढ़ गई जब उत्तर प्रदेश में भीम आर्मी का उदय हुआ। इसके नेता चंद्रशेखर आजाद को मायावती ने भाजपा का सहयोगी बताया। प्रदेश में लगातार कमजोर होती पार्टी को बचाने के लिए डूबते को तिनके का सहारा की मानिन्द अंतत: बसपा का अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के साथ अप्रत्याशित गठबंधन हुआ। दोनों पार्टियों के गठबंधन ने उत्तर प्रदेश के उपचुनावों में बेहतर प्रदर्शन किया था और इस प्रयोग को आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया गया। लेकिन चुनावी नतीजों से यह सारे अनुमान ध्वस्त हो गए। सपा 2014 की तरह पांच ही सीटों पर ही सिमट गई। वहीं बसपा को जैसी उम्मीद थी वैसी सफलता तो नही मिल सकी। अलबत्ता बसपा शून्य से 10 सीटों पर जरूर पहुंच गई। चुनाव परिणामों के कुछ अर्से बाद ही यानी 23 जून 2019 को बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने एक के बाद एक कई ट्वीट कर सपा से रिश्ते तोडऩे का आधिकारिक ऐलान कर दिया। लोकसभाचुनाव के नतीजों के बाद हुए उपुचनावों में पार्टी की स्थापित नीति बदलकर उपचुनाव की सभी सीटों पर चुनाव लडऩे वाली बसपा 11 में से एक भी सीट नहीं जीत पाई।