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महात्मा गांधी के देश में असली होने की त्रासदी

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raghvendraBy raghvendra

Published on 28 July 2018 6:47 AM GMT

महात्मा गांधी के देश में असली होने की त्रासदी
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संजय तिवारी

लखनऊ: राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी। मोहन दास करम चंद गांधी। बापू। विश्व में अहिंसा के पुजारी के रूप में स्थापित। विश्व में शान्ति और स्थायित्व के लिए सर्वश्रेष्ठ आधुनिक दार्शनिक। भारत के हर राजनीतिक दल के लिए कसम खाने के उपकरण। आज भी यह गांधी शब्द ही भारत की राजनीति की मुख्यधारा बना हुआ है। प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी तक। सभी संकल्प गांधी जी के नाम का ही लेते है। हर साल देश में गांधी जी के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किये जाते हैं। उनके आश्रमों , उनकी बकरी की रस्सी , उनके चरखे , उनकी धोती , उनकी लाठी, इन सभी को हमने बहुत संजो कर रखा है। अगर नहीं संजो सके हैं तो उनको जो कभी नमक आंदोलन में उनकी लाठी थामे आगे आगे चलने वाला बच्चा था। जो गांधी जी के अपने प्रवाहित रक्त हैं। उन्हीं की सुधि लेने की फुर्सत नहीं देश को। सहारे से वंचित और बेबस हालात में राष्ट्रपिता की पौत्रवधू शिवालक्ष्मी कनु गांधी को दिल्ली छोडऩा पड़ा है।

अभाव और मुफलिसी

मुफलिसी में लक्ष्मी के पति कनु रामदास गाँधी ने नवम्बर 2016 में एक मंदिर की सहायता से किसी तरह इलाज तो पाया लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। अब उनकी पत्नी शिवालक्ष्मी कनु गांधी अकेली ही रह गयीं। कनु गाँधी बापू के वही पौत्र थे जिनकी खींची गयीं तस्वीरों से देश और दुनिया के सभी गांधी संग्रहालय भरे पड़े हैं। नमक सत्याग्रह की वह चर्चित तस्वीर जिसमे एक बच्चा गांधी जी की लाठी पकड़ कर आगे आगे चल रहा है , बहुत ही चर्चित हुई थी। वह बच्चा कनु गांधी ही हैं। उन्ही कनु गांधी की पत्नी हैं शिवलक्ष्मी जी।

25 साल तक नासा की सेवा

कनु और शिवालक्ष्मी की कोई संतान नहीं हैं। कनु ने 25 साल तक नासा की सेवा की। चार दशक बाद 2014 में स्वदेश लौटने के बाद उनके हालात बुरे हो गए। भारत में अमेरिका के तत्कालीन राजदूत जान केनेथ गालब्रेथ, कनु को मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) में अध्ययन के लिए ले गए थे। कनु ने नासा और अमेरिकी रक्षा मंत्रालय में काम किया था। शिवालक्ष्मी बोस्टन बॉयोमेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट में प्रोफेसर थीं। भारत लौटने के बाद पति-पत्नी एक-जगह से दूसरी जगह भटकते रहे क्योंकि उनका अपना कोई स्थायी ठिकाना यहां नहीं था। कुछ समय के लिए दोनों आश्रमों और धर्मशालाओं में रहे।

कनु की बहनें पूछती रहीं हाल- चाल

कनु की बुजुर्ग बहन उषा गोकानी मुंबई से नियमित रूप से उनकी हालचाल पूछती रहती थीं । बेंगलुरु में रहने वाली एक अन्य बहन सुमित्रा कुलकर्णी उन्हें देखने आई थीं। सुमित्रा पूर्व राज्यसभा सदस्य हैं। बहनों ने कहा था कि वे कनु के इलाज का खर्च उठाएंगी लेकिन, मंदिर के अधिकारियों ने विनम्रता से पेशकश को नकार दिया। उनका कहना था कि कनु की सेवा कर वे राष्ट्र के लिए महात्मा गांधी की सेवा का कर्ज चुकाने की थोड़ी कोशिश कर रहे हैं। उस समय बधिया की प्रतिक्रिया थी - कनु की हालत को देखकर अहमदाबाद के प्रसिद्ध साबरमती आश्रम से चिढ़ सी हो रही है जिसके होने वाले शताब्दी महोत्सव के लिए करोड़ों खर्च किए जा रहे हैं। ऐसे ही महात्मा गांधी के नाम पर कई संस्थानों को करोड़ों सरकार द्वारा दिए जा रहे हैं। लेकिन, किसी को महात्मा गांधी के विचारों या उनके वारिसों से कोई सरोकार नहीं है।

अहमदाबाद के धीमंत बधिया

गांधी जी के एक मित्र के पौत्र और कनु गांधी के बचपन के मित्र अहमदाबाद के धीमंत बधिया ही एक ऐसा नाम है जो अंत तक इस दम्पति से जुड़ा रहा है। वह बताते हैं कि कनु जब बीमार हुए तो राधाकृष्ण मंदिर ने बहुत अधिक साथ दिया। उन्होंने (मंदिर प्रशासन) कनु को पास के शिव ज्योति अस्पताल में भर्ती कराया और वही लोग 90 वर्षीय शिवालक्ष्मी कनु गांधी की देखभाल कर रहे थे । शिवालक्ष्मी सुन नहीं सकती हैं और वृद्धावस्था की अन्य समस्याओं से ग्रस्त हैं। धीमंत कहते हैं कि दु:ख इस बात का है कि सब कुछ जानने के बाद भी गुजरात के किसी नेता या मंत्री ने कनु का हाल जानने के लिए पूछताछ करने या अस्पताल आने की जहमत नहीं उठाई। कनु दिल का दौरा पडऩे और मस्तिष्काघात के बाद 22 अक्टूबर 2016 को सूरत पहुंचे थे । उनका आधा शरीर लकवाग्रस्त हो गया था ।

इंग्लैंड में पली बढ़ीं डॉक्टर शिवा

इंग्लैंड में पली बढ़ीं डॉक्टर शिवा लक्ष्मी के पिता वहीं पर बड़े कारोबारी थे। शिवा ने इंग्लैंड में ही पीएचडी की और वहीं पर प्रोफेसर बनीं। उनके पास अमेरिकी नागरिकता भी है। बातचीत में शिवा ने अपने बारे में बताया था कि 1948 में जब गांधी जी की हत्या हुई थी, उस वक्त वह इंग्लैंड में अपने कॉलेज के लैब में थीं, तब वहां के एक प्रोफेसर ने आकर इस बारे में बताया था।

कई बार आश्रम में गांधी जी से मिली

शिवा लक्ष्मी गांधी ने बताया था कि वह वर्ष 1930 से 1940 के बीच अपने पिता के साथ कई बार आश्रम में जाकर गांधी जी से मिली थीं। वह उनकी गोद में भी खेल चुकी हैं। उन्होंने कहा कि गांधी जी अच्छे विचार वाले थे, अपनी बातों को वे अधिक से अधिक प्रसार प्रचार करना चाहते थे। उनकी सोच थी कि अच्छे विचार को पुस्तक का रूप देना चाहिए, ताकि ऐसे विचार कभी खत्म न हो और यह पुस्तकों के माध्यम से अधिसंख्य लोगों तक पहुंच सके। जिससे लोगों की सोच में बदलाव हो सके। वह ऐसा इसलिए चाहते थे कि लोगों में सकारात्मक सोच से समाज की कई कुरीतियां स्वत: समाप्त हो जाएगी।

शिवा लक्ष्मी ने बताया था कि गांधी जी के अच्छे विचार आश्रम से निकलने वाली पत्रिका ‘नवजीवन’ में प्रकाशित किए जाते थे। शिवा ने तब कहा था कि गांधी आज हमारे विचारों में जिंदा हैं, लेकिन उनके विचारों को तभी पूरी सार्थकता मिलेगी, जब भारत का एक भी बच्चा शिक्षा पाने से वंचित नहीं रहेगा।

एक वर्ष से गुमनामी की जिंदगी

डॉक्टर शिवा लक्ष्मी गांधी पिछले एक वर्ष से गुमनामी की जिंदगी जी रही थीं। उत्तर पश्चिमी दिल्ली के गांव कादीपुर में हरपाल राणा के घर पर शिवा लक्ष्मी एक साल पहले रहने आईं थीं। हैरानी की बात है कि इस दौरान शासन, प्रशासन की ओर से कोई उनकी खोज खबर भी लेने नहीं आया।

तकरीबन दो साल पहले नवंबर, 2016 में पति कनु गांधी के निधन के बाद उन्होंने बाकी बची हुई जिंदगी दिल्ली में ही बिताने की इच्छा जताई थी। शिवा लक्ष्मी पिछले एक साल से दिल्ली के माहौल से कुछ ज्यादा ही परेशान हो गई थीं। उन्होंने कहा भी था कि दिल्ली का माहौल ठीक नहीं है। कई बार मन किया कि वे भारत छोडक़र इंग्लैंड वापस चली जाएं, लेकिन वहां भी कोई ठिकाना नहीं। ताजा बयान के मुताबिक, वह अब गुजरात के सूरत में ही रहेंगी और गांधी जी के कामों को आगे बढ़ाएंगीं।

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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