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गाजियाबाद: सूने पड़े होटल-रेस्तरां, कोरोना के खौफ का दिखा असर

डीएम का आदेश है कि रेस्टोरेंट्स में बैठा कर खाना खिलाने की इजाजत नहीं है।

Bobby Goswami
Reporter Bobby GoswamiPublished By Chitra Singh
Updated on: 2021-04-20T15:33:33+05:30
गाजियाबाद: सूने पड़े होटल-रेस्तरां, कोरोना के खौफ का दिखा असर
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गाज़ियाबाद: कोरोना संकट की वजह से होटल और रेस्टोरेंट कारोबार पर फिर से मुश्किल के बादल गहरा गए हैं। दरअसल गाजियाबाद में अधिकतर रेस्टोरेंट्स और होटल्स में काम करने वाले कारीगर लॉकडाउन के डर से अपने होमटाउन जा रहे हैं। इससे खाना बनाने से लेकर होटल में साफ सफाई करने वालों की कमी हो गई है।

गाजियाबाद के मोहन नगर स्थित रेस्टोरेंट् के मैनेजर संजय कुमार ने बताया कि खाना बनाने से लेकर,साफ सफाई करने वाले अधिकतर स्टाफ के लोग लॉकडाउन के डर से वापस अपने घर चले गए हैं। इसके अलावा डीएम का आदेश है कि रेस्टोरेंट्स में बैठा कर खाना खिलाने की इजाजत नहीं है। संजय कुमार ने बताया कि अधिकतर लोग रेस्टोरेंट में खाना खाने के लिए आते हैं। ऑनलाइन डिलीवरी का काम काफी कम है। इसलिए धंधा चौपट हो रहा है। फिलहाल रेस्टोरेंट बंद कर दिया गया है।

छोले भटूरे वाले ने क्या कहा

रेहड़ी पर फूड बेचने वालों पर भी यही नियम लागू होता है। रेहड़ी पर छोले भटूरे बेचने वाले रामजीत यादव का कहना है कि छोले भटूरे पैक करके बेचे जा रहे हैं। किसी भी व्यक्ति को रेहड़ी या उसके आसपास खड़े होकर नहीं खाने दिया जा रहा है। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि अधिकतर रेहड़ी पर खाने का सामान बेचने वाले लोग भी अपने घरों की तरफ जा रहे हैं। क्योंकि कोरोना संकट की वजह से इनकी आमदनी भी काफी कम हो गई है।


एनसीआर में फास्ट फूड का काम

आमतौर पर देखा जाता है कि बाहर से आकर एनसीआर में काम करने वाले लोग यहां पर फास्ट फूड का काम करते हैं। फास्ट फूड का काम काफी अच्छा भी चलता है। लेकिन पाबंदियां लगने के बाद रोड पर भीड़ कम होती है। ऐसे में सेल भी कम हो जाती है। बाहर से आकर यहां रहने वाले प्रवासियों को एक तरफ जहां कमरे का किराया देना होता है, तो वही अपने खाने पीने की व्यवस्था के अलावा अपने परिवार को रुपए भेजने की भी जिम्मेदारी होती है। जब सेल कम होती है, तो गुजारा कर पाना उनके लिए मुश्किल हो जाता है। रेहड़ी पर फास्ट फूड बेचने वाले लोग होम डिलीवरी भी नहीं करवा पाते हैं। क्योंकि उनके पास इतने संसाधन नहीं होते हैं। इसलिए जाहिर तौर पर सबसे बड़ा संकट उन्हीं लोगों के सामने है।

Chitra Singh

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