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विपक्षी महागठबंधन के खिलाफ भाजपा दो-दो हाथ को तैयार

raghvendra

raghvendraBy raghvendra

Published on 17 Aug 2018 8:45 AM GMT

विपक्षी महागठबंधन के खिलाफ भाजपा दो-दो हाथ को तैयार
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विजय शंकर पंकज

लखनऊ: मेरठ में प्रदेश कार्यसमिति के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी ने आगामी लोकसभा चुनाव में विपक्षी महागठबंधन से दो-दो हाथ करने की तैयारी कर ली है। भाजपा ने संगठनात्मक तैयारियों और सामाजिक समीकरणों के माध्यम से विपक्ष को करारा जवाब देने की रणनीति बनायी है। मेरठ की कार्यसमिति में भाजपा नेतृत्व ने कार्यकर्ताओं को अपनी इसी क्षमता का एहसास कराते हुए विजय का विश्वास जगाया।

भाजपा नेतृत्व के इस अति विश्वास में कार्यकर्ताओं की उदासीनता, आम जनता की नाराजगी और अपेक्षाओं पर खरा न उतरने के कारकों को दरकिनार किया गया है। लगता है कि भाजपा नेतृत्व की सोच में यह बात बैठ गयी है कि विपक्ष के पास सक्षम नेतृत्व न होने के कारण मोदी के समर्थन में वोट देना जनता की मजबूरी है। भाजपा नेतृत्व विपक्षी एकता के गठबंधन को भी लचर मानते हुए विकल्पहीन मान रहा है। इसके बावजूद भाजपा चुनाव से पूर्व जनसरोकार की कुछ योजनाओं की घोषणा कर जन आक्रोश को कम करने का प्रयास करेगी।

भाजपा खुद ही विश्वस्त नहीं

मेरठ की प्रदेश कार्यसमिति में भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में सहयोगियों सहित 73 सांसदों के लक्ष्य से एक सीट ज्यादा का लक्ष्य कर चुनावी शंखनाद किया। इस लक्ष्य के बावजूद भाजपा अपने में ही पूर्णतया विश्वस्त नजर नहीं आ रही है। लोकसभा की तीन सीटों पर हुए उपचुनाव में भाजपा को करारी शिकस्त खानी पड़ी। उपचुनाव वाली इन सीटों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की गोरखपुर की अपराजित मानी जानी वाली सीट के साथ ही उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य की फूलपुर और वरिष्ठ नेता हुकुम सिंह सिंह की कैराना सीट है। कैराना के साम्प्रदायिक दंगे से ही पश्चिमी यूपी सहित प्रदेश के ज्यादा भूभाग में अखिलेश यादव की सरकार के खिलाफ मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगा था। केन्द्र में मोदी और राज्य में योगी सरकार बनने के बाद अभी तक भाजपा का हिन्दूवादी चेहरा ही उभरकर सामने आया है। भाजपा की केन्द्रीय राजनीति में मोदी और अमित शाह के अलावा अन्य सभी नेताओं का व्यक्तित्व ही समाप्त हो गया है।

सांसदों-विधायकों की नहीं चल रही

मोदी सरकार के बड़े राजनीतिक चेहरे वाले नेताओं लालकृष्ण आडवाणी, डा.मुरली मनोहर जोशी, यशवन्त सिन्हा तथा अरुण शौरी जैसे को पार्टी पहले ही किनारे कर चुकी है जबकि मंत्रिमंडल के राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी जैसे वरिष्ठ नेता भी दोयम दर्जे की श्रेणी में आ गए हैं। केन्द्र एवं राज्य में सरकार के बाद भी सांसदों और विधायकों की अपने क्षेत्रों में कोई अहमियत ही नहीं रह गयी है। हालात यह है कि प्रशासनिक मशीनरी में डीएम और एसपी तो दूर दरोगा तक विधायक की पैरवी सुनने को तैयार नहीं है। सांसदों और विधायकों ने इस मामले में प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक कई बार गुहार लगायी, परन्तु सब खानापूर्ति ही साबित हुआ। भाजपा शासन में जनप्रतिनिधियों पर अफसरशाही हावी है। कार्यकर्ताओं के कामों की पैरवी से बचने के लिए मंत्री कार्यालयों तक में नहीं बैठते हैं। संघ और संगठन की पैरवी की बातें कहकर कार्यकर्ताओं को टरका दिया जाता है।

सामाजिक एवं प्रशासनिक बदलाव पर जोर

कार्यकर्ताओं की नाराजगी और अपेक्षाओं की भाजपा नेतृत्व को जानकारी है। इसके जवाब में भाजपा ने साफ कर दिया है कि बड़े लक्ष्य को लेकर चलने में निजी हितों की तिलांजलि देनी होगी। भाजपा नेतृत्व ने प्रशासनिक शुचिता को सामने रखने हुए सामाजिक एवं प्रशासनिक बदलाव की बात कही है। देश में नरेन्द्र मोदी का नेतृत्व और उनके पीछे अति पिछड़ों का मजबूत जातीय समीकरण भाजपा के लिए रामबाण साबित हुआ है। अति पिछड़ों के ही साथ भाजपा ने अति दलितों को भी अपने पाले में समेट लिया है। ऐसे में सवर्णों के लिए भी भाजपा मजबूरी बन गयी है।

कांग्रेस तथा उसके सहयोगी दलों सपा-बसपा का जातीय समीकरण इन वर्गों को अपने पास समेटने में विफल रही है। सर्वसमाज के नाम पर 2007 में बसपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद मायावती शासन में पिछड़ों एवं सवर्मों की जो दुर्दशा हुई, उसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा। 2012 के चुनाव में सपा ने बसपा सरकार के प्रमोशन में आरक्षण को मुद््दा बनाकर विजय पताका फहरा दी परन्तु अखिलेश सरकार के यादवी प्रेम ने अन्य वर्गों को सपा से अलग कर दिया। इसी प्रकार का कांग्रेस का मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति उनके गले की फांस बन गयी और उनके साथ कोई खड़ा होने को तैयार नहीं है। मजबूर होकर राहुल गांधी खुद को जनेऊधारी पंडित साबित करने में जुटे हुए है। विफलता के निचले पायदान में पहुंचने के बाद अब तीनों एकजुट होकर भाजपा को हराने की रणनीति बना रहे है। सपा के पास यादव, बसपा के पास जाटव और कांग्रेस के पास मुस्लिम के अलावा अन्य वर्गों का समर्थन नहीं है। ऐसे में भाजपा का अति पिछड़ा,अति दलित और सवर्ण मतों का गठजोड़ विपक्ष के लिए भारी पड़ रहा है। इस गठजोड़ पर भाजपा ने विपक्षी महागठबंधन को चुनौती देने की रणनीति बनायी है।

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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