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Jamiat Ulema-e-Hind : जलसे में बोले मौलाना महमूद मदनी- 'हमें पाकिस्तान भेजने वाले खुद चले जाएं पाकिस्तान'

Jamiat Ulema-e-Hind Confrence : जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के जलसे के दूसरे दिन अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने कहा- "बात-बात पर हमें पाकिस्तान भेजने वाले खुद पाकिस्तान चले जाएं।"

Bishwa Maurya
Updated on: 2022-05-29T13:32:42+05:30
Maulana Mahmood Madani
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Maulana Mahmood Madani (Image Credit : Social Media)

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Jamiat Ulema-e-Hind Meeting : देश में इन दिनों ज्ञानवापी मस्जिद (Gyanvapi Masjid), क़ुतुब मीनार (Qutub Minar), मथुरा शाही ईदगाह (Mathura Shahi Idgah), दिल्ली जामा मस्जिद (Delhi Jama Masjid) और ताजमहल (Taj Mahal) समेत कई धार्मिक मामलों को लेकर विवाद छिड़ा हुआ है। इसी बीच उत्तर प्रदेश के देवबंद में इन महजबी मसलों को लेकर जमीयत उलेमा-ए-हिन्द (Jamiat Ulema-e-Hind) ने 28 मई को दो दिवसीय जलसा का आयोजन किया जिसका आज आखिरी दिन है। जमीयत उलेमा-ए-हिन्द के इस जलसे में मौलाना महमूद मदनी (Maulana Mahmood Madani) जो हमें बात बात पर पाकिस्तान भेजने की बात करते हैं वह खुद पाकिस्तान चले जाएं।

सम्मेलन में बोलें मौलाना महमूद मदनी

देवबंद में जमीयत उलेमा-ए-हिन्द की ओर से आयोजित सम्मेलन में आज मौलाना महमूद मदनी ने कहा किसी को भी अगर हमारे मजहब से दिक्कत है तो वह कहीं और चले जाए। बात-बात पर हमें पाकिस्तान भेजने वाले खुद पाकिस्तान चले जाएं, हमें आजादी के वक्त पाकिस्तान जाने का मौका दिया गया था लेकिन हम नहीं है। यह मुल्क हमारा है और हम अपने इस मुल्क को बचाएंगे।

सम्मेलन के दूसरे दिन कई प्रस्ताव हुए पास

आज इस सम्मेलन के दूसरे दिन मथुरा शाही ईदगाह आज के प्रस्ताव में कहा गया कि ज्ञानवापी मस्जिद और कई अन्य प्राचीन इबादतगाहों को लेकर खड़े हो रहे विवाद तथा देश में शांति माहौल को खराब होता देख इसके लिए जिम्मेदार सभी राजनीतिक दलों के रवैए पर लोगों ने नाराजगी जताई। वाराणसी सिविल कोर्ट तथा मथुरा की सिविल कोर्ट की ओर से जारी आदेशों के कारण ही देश में विभाजन करने वाली इन राजनीतिक मुद्दों को मदद मिली है। इस प्रस्ताव में कहा गया कि इन अदालतों ने पूजा स्थल एक्ट 1991 का साफ तौर पर उल्लंघन किया।

साथ ही इस प्रस्ताव में यह कहा गया कि इस्लामिक कायदे कानूनों में किसी भी प्रकार के दखल को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अगर सरकार की ओर से नागरिक संगीता कानून को लागू किया जाता है तो यह यकीनन मुस्लिम वर्ग तथा कई अन्य वर्गों के लिए बहुत बड़ा अन्याय होगा, जिसे हम सब कतई मानेंगे नहीं और अपने संवैधानिक दायरों में रखकर सरकार के इन सभी कायदे कानूनों का पुरजोर विरोध करेंगे।

देवबंद में जमीयत उलेमा-ए-हिन्द की ओर से आयोजित सम्मेलन (तस्वीर साभार : सोशल मीडिया)

देश के हालात और मुस्लिम समस्याओं को लेकर जमीयत का अधिवेशन दूसरे दिन भी जारी

देवबंद : देश और मिल्लत के अहम मुद्दों व समस्याओं को लेकर देवबंद के ईदगाह मैदान में जमीयत उलमा ए हिंद (महमूद मदनी गुट) के अधिवेशन का तीसरा सत्र शुरू हो गया है। गवर्निग बॉडी के सदस्यों का प्रमुख समस्याओं को लेकर मंथन जारी है। जमीयत प्रमुख मौलाना महमूद मदनी की अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम में देश भर से आए करीब 3 हजार उलेमा व जमीयत प्रतिनिधि शामिल हैं। दूसरे दिन भी विभिन्न प्रांतों से आए अध्यक्षों ने मौजूदा हालात और मुस्लिम उत्थान को लेकर कई प्रस्ताव रखे और इस्लाम के खिलाफ लगातार हो रहे दुष्प्रचार पर चिंता जताई।

सम्मेलन में अभी तक ये रखे गए प्रस्ताव

देश में नफ़रत के बढ़ते हुए दुषप्रचार को रोकने के उपायों पर विचार, इस्लामोफ़ोबिया की रोक थाम के विषय में प्रस्ताव, अल्पसंख्यकों के शैक्षिक और आर्थिक अधिकारों पर विचार, मुस्लिम वक्फ संपत्तियों के संबंध में प्रस्ताव, सद्भावना मंच को मजबूत करने पर विचार, सोशल मीडिया पर ऐसे संक्षिप्त संदेश पोस्ट करें जो इस्लाम के गुणों और मुसलमानों के सही पक्ष को उजागर करें, फलिस्तीन और इस्लामी जगत के संबंध में प्रस्ताव, पर्यावरण संरक्षण से संबंधित प्रस्ताव समेत मुस्लिम उत्थान को लेकर कई प्रस्ताव रखे गए।

ज्ञानवापी पर आज रखा जाएगा प्रस्ताव

अधिवेशन के दूसरे दिन ज्ञानवापी मस्जिद समेत देश में विभिन्न धार्मिक स्थलों को लेकर बढ़ रहे विवाद और कॉमन सिविल कोड के संबंध में प्रस्ताव रखे जाएंगे। जिन्हे पास कर जमीयत इन प्रस्तावों को अमलीजामा पहनाने के लिए कार्य शुरू करेगी।

देवबंद में जमीयत उलेमा-ए-हिन्द की ओर से आयोजित सम्मेलन (तस्वीर साभार : सोशल मीडिया)


जमीअत उलमा-ए-हिन्द की मज्लिसे मुंतज़िमा (प्रबंधक समिति) के प्रस्ताव

देश में नफ़रत के बढ़ते हुए दुषप्रचार को रोकने के उपायों पर विचार

आज हमारा देश धार्मिक बैर भाव और नफ़रत की आग में जल रहा है। चाहे वह किसी का पहनावा होे, खान-पान हो, आस्था हो, किसी का त्योहार हो, बोली (भाषा) हो या रोज़गार, देशवासियों को एक दूसरे के खि़लाफ़ उकसाने और खडा करने के दुष्प्रयास हो रहे हैं। युवकों को रचनात्मक कामों में लगाने के बजाय, विघटनकारी कामों का साधन बनाया जा रहा है। सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि सांप्रदायिकता की यह काली आंधी मौजूदा सत्ता दल व सरकारों के संरक्षण में चल रही है जिसने बहुसंख्यक वर्ग के दिमागों में ज़हर भरने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी है।

इसके साथ देश का मुख्य मीडिया लोगों को उकसाने और भड़काने का सबसे बड़ा साधन बन गया है। देश के मुस्लिम नागरिकों, पुराने ज़माने के मुस्लिम शासकों और इस्लामी सभ्यता व संस्कृति के खि़लाफ़ भद्दे और निराधार आरोपों को ज़ोरों से फेलाया जा रहा है और सत्ता में बैठे लोग उनके खि़लाफ़ कानूनी कार्रवाई करने के बजाय उन्हें आज़ाद छोड़ कर और उनका पक्ष लेकर उनके हौसले बढ़ा रहे हैं।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद इस बात पर चिंतित है कि खुले आम भरी सभाओं में मुसलमानों और इस्लाम के खि़लाफ़ शत्रुता के इस प्रचार से पूरी दुनिया में हमारे प्रिय देश की बदनामी हो रही है और उस की छवि एक तास्सुबी, तंगनज़र, धार्मिक कट्टरपंथी राष्ट्र जैसी बन रही है। इससे हमारे देश के विरोधी तत्वों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने का मौक़ा मिल रहा है।

ऐसी परिस्थिति में जमीयत उलेमा-ए-हिंद देश की एकता, अखंडता और प्रगति के बारे में चिंतित है और भारत सरकार से आग्रह करती है कि उन तत्वों पर और ऐसी गतिविधियों पर तुरंत रोक लगाई जाए जो लोकतंत्र, न्यायप्रियता और नागरिकों के बीच समानता के सिद्धांतों के खि़लाफ़ और इस्लाम व मुस्लिम दुश्मनी पर आधारित हैं।

यह बात ध्यान में रहनी चाहिए कि अपना राजनीतिक बर्चस्व बनाए रखने के लिए किसी एक वर्ग को दूसरे वर्ग के खि़लाफ़ भड़काना और बहुसंख्यकों की धार्मिक भावनाओं को अल्पसंख्यकों के खि़लाफ़ उत्तेजित करना, देश के साथ भलाई व वफ़ादारी नहीं है बल्कि खुली दुश्मनी है। आजकल जिस तरह छदम राष्ट्रवाद के नाम पर राष्ट्र की एकता को तोड़ा जा रहा है, उसको जमीयत उलेमा-ए-हिंद केवल मुसलमानों का ही नहीं बल्कि पूरे देश का भारी नुकसान मानती है और उसे देश की अखंडता व एकता के लिए बेहद ख़़तरनाक समझती है।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद की मज्लिसे मुंतज़िमा (प्रबंधक समिति) की यह बैठक सभी इंसाफ़ पसंद दलों, संगठनों और देश से प्रेम करने वाले नागरिकों से अपील करती है कि वे प्रतिक्रियावादी और भावनात्मक रवैया अपनाने के बजाए एकजुट होकर सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर चरमपंथी फासीवादी ताकतों का मुक़ाबला करें और मुल्क में आपसी भाई चारा, सहनशीलता और इंसाफ़ के तक़ाज़ों को पूरा करने के लिए हर सम्भव कोशिश करें।

अगर फ़ासीवादी संगठन और उनके हिमायती यह समझते हैं कि देश के मुसलमान इस ज़ुल्म के आगे घुटने टेक देंगे और अपनी प्यारे वतन में ग़ुलामी और ज़ुल्म की जंजीरों में जकड लिए जायेंगे, तो यह उनकी भूल है। भारत हमारा देश है, इसी में हम पैदा हुए, इसी में पले-बढ़े और इसी की मिट्टी में मिल जाएंगे। हमारे पूर्वजों ने न केवल अपने देश को स्थिर और मजबूत किया है बल्कि, इसकी हिफ़ाज़त के लिए अपने जीवन का बलिदान भी दिया है, इसलिए हम देश में मुस्लिम या किसी अन्य कमज़ोर वर्ग के साथ अन्याय और भेद्भाव को स्वीकार नहीं कर सकते।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद ख़ास तौर से मुस्लिम नौजवानों और छात्र संगठनों को सचेत करती है कि वे देश के दुश्मन अंदरूनी व बाहरी तत्वों के सीधे निशाने पर हैं, उन्हें निराश करने, भड़काने और गुमराह करने के लिए हर सम्भव तरीक़ा अपनाया जा रहा है। इससे निराश न हों, हौसले और समझदारी से काम लें और जमीअत उलेमा ए हिंद और इसके नेतृत्व पर भरोसा रखें।

इस्लामोफ़ोबिया की रोक थाम के विषय में प्रस्ताव

भारत में इस्लामोफ़ोबिया और मुस्लिम विरोधी उकसावे की घटनाएं बराबर बढ़ रही हैं। 'इस्लामोफ़ोबिया' सिर्फ धर्म के नाम पर शत्रुता ही नहीं; बल्कि इस्लाम के खिलाफ़ भय और नफ़रत को दिल व दिमाग़ पर हावी करने की मुहिम है, जो मानवाधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों के खि़लाफ एक विश्व व्यापी दुष्प्रयास है। इसके कारण आज हमारे देश को धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक इंतहापसंदी (अतिवाद) का सामना करना पड़ रहा है।

हमारा प्रिय देश इस तरह के दुष्प्रयासों से पहले कभी इतना प्रभावित नहीं हुआ था जितना अब हो रहा है। आज देश की सत्ता ऐसे लोगों के हाथों में आ गई है जो देश की सदियों पुरानी भाई चारे की पहचान को बदल देना चाहते हैं। उनके लिए हमारी साझी विरासत और सामाजिक मूल्यों का कोई महत्व नहीं है। उनको बस अपनी सत्ता ही प्यारी हैं। जमीयत उलेमा-ए-हिंद इस स्थिति पर अपनी गहरी चिंता ज़ाहिर करती है और निम्न उपाय अपनाने की ज़रूरत महसूस करती हैः

(1) 2017 में प्रकाशित लाॅ कमीशन की 267 वीं रिपोर्ट में सिफ़ारिश की गई है कि हिंसा पर उकसाने वालों को सज़ा दिलाने के लिए एक अलग कानून बनाया जाए और सभी कमज़ोर वर्गाें विशेषकर मुस्लिम अल्पसंख्यक वर्ग को सामाजिक और आर्थिक रूप से अलग-थलग करने के दुष्प्रयासों पर रोक लगाई जाए। इस सिफ़ारिश पर तुरंत क़दम उठाने की ज़रूरत है।

(2) सभी धर्मों, जातियों और क़ौमों के बीच आपसी सद्भाव, सहनशीलता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का संदेश देने के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रायोजित 'इस्लामोफोबिया की रोक थाम का अंतरराष्ट्रीय दिवस' हर साल 14 मार्च को मनाया जाए, और मानव गरिमा के सम्मान का स्पष्ट संदेश दिया जाए। हर प्रकार के नस्लवाद व धार्मिक भेद् भाव को मिटाने के लिए साझा संकल्प किया जाए।

(3) इस स्थिति से निपटने के लिए जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने "जस्टिस एंड एम्पावरमेंट इनीशिएटिव फाॅर इंडियन मुस्लिम्स'' (भारतीय मुसलमानों के लिए न्याय और अधिकारिता पहल) नाम से एक स्थायी विभाग बनाया है, जिसका मक़सद नाइंसाफ़ी और उत्पीड़न को रोकने और शांति और न्याय बनाए रखने की रणनीति विकसित करना है।

एक हक़ीक़त यह भी है कि यह लडाई केवल विभाग बना देने से नहीं जीती जा सकती। इसके लिए हर सतह पर लगातार कोशिशें करते रहने की ज़रूरत है, इसलिए जमीअत उलेमा-ए-हिंद अपनी सभी इकाइयों को तवज्जेह दिलाती है कि इस कोशिश का हिस्सा बनें और पूरी दिलचस्पी के साथ इसके कामों में हिस्सा लें।

अल्पसंख्यकों के शैक्षिक और आर्थिक अधिकारों पर विचार

शिक्षा के स्तर और आर्थिक रूप से भारतीय मुसलमानों की बदहाली किसी से ढकी छुपी नहीं है। इस बारे में सच्चर कमेटी की रिपोर्टें सच्चाई को बयान करती है। इस स्थिति के लिए जहां एक तरफ़ सरकारी नीतियां ज़िम्मेदार हैं, वहीं हम मुसलमानों का रवैया भी अनुचित और ग़ैर ज़िम्मेदारी का है।

जमीअत उलेमा-ए-हिंद की यह बैठक जहां एक तरफ़ केंद्र और राज्य सरकारों से आग्रह करती है कि वे मुसलमानों की तालीमी और आर्थिक हालत में सुधार लाने और रास्ते में आने वाली रुकावटों को दूर करने के लिए आवश्यक क़दम उठाएं, वहीं मुसलमानों से भी अपील है कि वे पूरी संजीदगी के साथ बच्चों की तालीम में और आर्थिक मैदान में आगे क़दम बढाएं। अपने बच्चों की तालीम व तरबीयत को अपने खाने-पीने से भी ज्यादा ज़रूरी समझें।

आज की इस बैठक का ख़ास संदेश यह है जहां तक हो सके लड़के-लड़कियों के लिए अलग-अलग बंदोबस्त किया जाए, ताकि उनके अक़ीदों और इस्लामी मूल्यों की हिफ़ाज़त की जा सके।

मुस्लिम औक़ाफ़ के संबंध में प्रस्ताव

जमीअत उलेमा-ए-हिंद की प्रबंधक कमेटी की यह बैठक वक़्फ़ संपत्तियों की हिफ़ाज़त में कोताही, उनकी आमदनियों के अनुचित इस्तेमाल और वक़्फ़ करने वालों की मंशा के मुताबिक मद्दों पर खर्च न होने पर अपनी चिंता को दोहराती है। देश की आज़ादी को लम्बा समय गुज़र जाने और हर तरह की कोशिशों और दावों के बावजूद वक़्फ़ जायदादों और उनकी आमदनियों की हिफ़ाज़त और वक़्फ़ करने वाले की मंशा के अनुसार उचित व सही खर्च की उचित व्यवस्था नहीं हो पाई है। इसके अलावा, वक़्फ़ की ऐसी बहुत सी संपत्तियां हैं जिन्हें सरकारों ने जबरन अपने क़ब्जे में ले रखा है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए जमीयत उलेमा-ए-हिंद की मुंतज़िमा कमेटी मुस्लिम औक़ाफ़ के बारे में निम्न मांगे करती हैः

(1) 1963 के वक़्फ़ एक्ट (36) में संशोधन कर के 1995 में एक धारा 107 जोड़ी गई थी, जिस के अनुसार वक़्फ़ संपत्तियों को सीमा अधिनियम, 1963 से छूट दी गई है। इस संशोधन का फ़ायदा उसी समय होता जब इसको पिछली तारीखों से लागू किया जाता क्योंकि अदालतों में अधिकांश केस पुराने अवैध क़ब्ज़ों के हैं। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के अनुसार लिमिटेशन एक्ट से यह छूट 1996 से पहले की संपत्ति विवादों पर लागू नहीं होती। इसलिए सख़्त ज़रूरत है कि कानून में संशोधन कर के इसे पिछली तारीखों से लागू माना जाए ताकि जो वक़्फ़ जायदादें इससे पहले से अवैध क़ब्ज़े में हैं धारा 107 उन सभी पर लागू हो सके।

(2) सभी राज्यों में वक़्फ़ संपत्तियों को पुराने किराया क़ानूनों से मुक्त किया जाए। (ताकि किरायों में उचित बढ़ोतरी हो सके।)

(3) जिन क्षेत्रों के लिए वक़्फ़ बोर्ड अभी तक नहीं बने हैं, उनके लिए तुरंत वक़्फ़ बोर्ड बनाए जाएं। जिन वक़्फ़ बोर्डाें में अधिकारियों और अन्य स्टाफ़ के पद खाली हैं, उनको तुरंत भरने के लिए उचित नियुक्तियाँ की जाएं। वक़्फ़ बोर्ड के सभी कार्यालयों में एक फुल टाईम सीईओ नियुक्त किया जाए। तथा आई ए एस और आई पी एस की तर्ज़ पर वक़्फ़ बोर्डाें के लिए भी एक विशेष 'भारतीय वक़्फ़ सेवा' (इंडियन वक़्फ़ केडर) की स्थापना की जाए।

(4) वक़्फ़ विकास निगम, जो कि आर्थिक रूप से पिछड़े मुसलमानों के आर्थिक विकास के लिए स्थापित किया गया था, उसे तुरंत सक्रिय किया जाए और उसके उद्देश्यों को हासिल करने के लिए सभी सम्भव कदम उठाये जाएं और जल्दी से जल्दी 'कार्यवाही रिपोर्ट' (ए.टी.आर.) जारी की जाए।

(5) जमीअत उलेमा-ए-हिंद की यह बैठक मांग करती है कि वक़्फ़ बोर्डों़ के तहत और पुरातत्व विभाग के तहत जो मस्जिदें वीरान पड़ी हैं, जिन में नमाज़ें नहीं हो रही हैं, उनको तुरंत पाबंदियों से मुक्त करके नमाज़ों के लिए खोला जाए और जिन मस्जिदों में नमाज़ होती रही है उनमें नमाज़ से न रोका जाए।

(6) एसजीपीसी की तर्ज़ पर वक्फ बोर्ड को एक स्वायत्त संस्था बनाया जाय।

(7) औक़ाफ़ के बारे में सच्चर कमेटी की रिपोर्ट संसद में पेश की जाए और उसकी सिफ़ारिशों को लागू करने के लिए उचित क़दम उठाए जाएं।

(8) राज्य सरकारें वक़्फ़ बोर्ड की सभी इकाइयों को सक्रिय करंे और नए मार्गदर्शक नियमों के तहत तमाम मस्जिदों, मज़ारों, इमाम बाड़ांे और अन्य वक़्फ़ संपत्तियों का नया सर्वेक्षण कराएं। सर्वेक्षण में निम्नलिखित आँकड़े एकत्र किए जाएंः

(1) कितने औक़ाफ़ का इंतज़ाम मुस्लिम प्रबंधकों के हाथ में है? (2). कितने औक़ाफ़ व्यक्तिगत कब्जे में हैं? (3) कौन कौन सी वक़्फ़ जायदादें गै़र-मुस्लिमों के कब्जे हैं? (4) उन वक़्फ़ जायदादों का ब्योरा जो केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के क़ब्ज़े में हैं? (5) हर वक़्फ़ जायदाद का अनुमानित मूल्य, मौजूदा उपयोग और आय आदि का ब्योरा?

राज्यों के मुख्यमंत्री महोदयों से निवेदन है कि वे अपने राज्य के हर वक़्फ़ बोर्ड के अध्यक्ष को जल्द से जल्द सर्वेक्षण पूरा करने का निर्देश दें।

(9) जमीअत उलेमा-ए-हिंद का यह अधिवेशन सभी मुसलमानों, विशेष रूप से औक़ाफ़ के मुतवल्लियों और इंतज़ामिया कमेटियों से अपील करता है कि वे औक़ाफ़ की हिफ़ाज़त में अपनी शरई जिम्मेदारियों को पूरा करें और उनको हर तरह की वित्तीय हेराफेरी और साधनों को नुकसान से बचाने के लिए हर संभव प्रयास करें।

सद्भावना मंच को मजबूत करने पर विचार

जमीअत उलेमा-ए-हिंद के संविधान की धारा (8) "सामाजिक सेवा" के अनुसार, 2 सितंबर 2019 को आयोजित जमीयत की मुंतज़िमा कमेटी की बैठक में कम से कम 11 सदस्यों का "जमीयत सद्भावना मंच" बनाने का फैसला किया गया था। तय किया गया था मंच के आधे सदस्य गैर-मुस्लिम होंगे। इस मंच में जमीयत के सरगर्म मिम्बरान के अलावा धर्म या क़ौम के भेद-भाव के बिना स्थानीय ज़िम्मेदार व्यक्तियों को शामिल किया जाना तय हुआ था और यह भी तय हुआ था कि मंच की मीटिंग हर माह बुलाई जाएगी जिसमें अपने वतनी भाइयों की शिरकत को यकीनी बनाया जाएगा और जमीयत के दस्तूर की धारा (8) में दिये गये निर्देशों के अनुसार निम्न संयक्त अमली कदम उठाए जाएंगे।

(1) विभिन्न धार्मिक संप्रदायों के लोगों की संयुक्त बैठक करना।

(2) आम नागरिकों की ज़रूरतों को पूरा करने की कोशिश करना।

(3) मज़दूर भाइयों, किसानों और पिछड़े लोगों की सेवा करना।

(4) यतीमों, बेवाओं और मजबूर लोगों की मदद करना।

(5) नवयुवकों को नशे की आदत और नैतिक भटकाव से बचाने के लिए मिल-जुल कर प्रयास करना।

(6) संवेदनशील धार्मिक मुद्दों (जैसे गौरक्षा, धर्म स्थलों में लाउडस्पीकर का उपयोग, त्योहारों के मौक़े पर सार्वजनिक जगहों का इस्तेमाल) आदि की समस्या कहीं हो तो उसका शांतिपूर्ण समाधान खोजना।

(7) पर्यावरण संरक्षण जैसे वृक्षा रोपण, जल संरक्षण और गंदगी से इलाके को साफ रखने के लिए सामुहिक प्रयास करना।

मौजूदा विशेष परिस्थितियों में यह सम्मेलन जमीयत उलेमा के ज़िम्मेदारों का ध्यान इस आंदोलन को मज़बूत करने और अपने इलाक़ों में जमीयत सद्भावना मंच की कमेटियां बनाने का आह्वान करता है।

जमीअत उलेमा-ए-हिन्द ऐलान करती है कि वह दुर्भावना फैलाने वाले व्यक्तियों और समूहों के दुषप्रभाव का निवारण करने के लिए देश भर में कम से कम 1,000 से अधिक स्थानों पर 'सद्भावना संसद' आयोजित करेगी जिसमें सभी धर्मों के प्रभावशाली लोगों को आमंत्रित किया जाएगा ।

(8) इस्लामी शिक्षाओं के बारे में फैलाए जा रहे भ्रमों को दूर करने और इस्लाम धर्म छोड़ने की रोक थाम पर विचार

जमीअत उलेमा-ए-हिंद की प्रबंधक कमेटी महसूस करती है कि आज कल मुसलमानों और इस्लाम के बारे में जो ग़लत व निराधार बातें फैलाई जा रही हैं उनका दुष्प्रभाव न केवल इंसाफ़ पसंद और साफ़ सुथरे विचारों वाले देशवासियों पर पड़ रहा है बल्कि हमारी नई पीढ़ी पर भी हो़ रहा है। यह ग़लत धारणाएं ख़ास तौर पर महिलाओं के साथ व्यवहार, आतंकवादी घटनाओं और कट्टरता के नाम पर फैलाई जा रही हैं।

इसलिए हमारी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है कि इस्लामी शिक्षाओं के बारे में ग़लत धारणाओं को दूर करने का प्रयास करें। विशेष रूप से इस्लामी आदेशों, उसूलों, विश्वासों और कानूनों के खि़लाफ़ मीडिया के प्रभावी माध्यम से जो दुष्प्रचार किया जा रहा है, उसका और इस्लामी आन्दोलनों के चरित्र हनन के अभियान का समझदारी व शालीनता से जवाब देना आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है।

इस संबंध में, निम्नलिखित क़दमों की तुरंत ज़रूरत हैः

(1) सोशल मीडिया पर ऐसे संक्षिप्त संदेश पोस्ट करें जो इस्लाम के गुणों और मुसलमानों के सही पक्ष को उजागर करें।

(2) नई शिक्षा पाने वालों के दिमागों में पनपने वाले नास्तिकता के विचारों को दूर करने के लिए उनके स्वभाव और स्तर के मुताबिक सामग्री उपलब्ध कराई जाए और समय-समय पर उनके साथ बेठकें की जाएं।

(3) सीरते रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के विषय पर इस्लामी क्विज़ मुक़ाबले आयोजित करना और उनमें सभी धर्मों और वर्गों के छात्रों को शामिल करना।

आज का यह अधिवेशन ख़ास तौर से जमीअत उलेमा-ए-हिन्द के ज़िम्मेदारों से और सभी दीनी मदरसों, मिल्ली व दीनी तंज़ीमों से इस मामले में ख़ास चैकसी व सावधानी बरतने और इस्लाम की सेवा में अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करने का आग्रह करता है।

फलिस्तीन और इस्लामी जगत के संबंध में प्रस्ताव

जमीअत उलेमा-ए-हिंद के मज्लिस मुंतज़िमा की यह बैठक फिलिस्तीन में इजराइली हिंसक कार्यवाहियों और अल-अक़्सा मस्जिद में नमाज़ियों के साथ मारपीट पर गहरी चिंता ज़ाहिर करती है। हिंसक रवैया और बडे पैमाने पर मानव अधिकारों का उल्लंघन इजराइल की शिनाख़्त बन गया है। निहत्थे और कमजोर फिलिस्तीनियों और उनके बच्चों की हत्या इस आतंकी व शैतानी शासन की विशेषता बन गई है। यह रवैया उसकी विस्तारवादी सोच का प्रतीक है कि पांच मिलियन से अधिक फिलिस्तीनी बेघर कर दिए गए हैं और उनपर अत्याचार जारी रखे हुए है।

जमीअत उलेमा-ए-हिंद अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आग्रह करती है कि लंबे समय से जारी इस उत्पीड़न को रोकने के लिए तत्काल निम्न कदम उठाए जाएंः

(1) संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1860 (2009) के अनुसार, इजराइल को गाज़ा की 15 साल से जारी नाकाबंदी को तुरंत हटाने और क्रॉसिंग पॉइंट खोलने के लिए बाध्य किया जाए।

(2) संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2334 (2016) के अनुसार, इज़राइल को पूर्वी यरुशलम समेत वेस्ट बैंक में नई यहूदी बस्तियां बसाने की सभी कार्यवाहियों को रोक देने का निर्देश दिया जाए।

(3) इजराइल को अपने कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्रों में अत्याचारों, मानव अधिकारों के उल्लंघनों और अरब नागरिकों के खि़लाफ़ सैनिक बल के बेजा इस्तेमाल, विध्वंसकारी कार्यवाहियों, जबरन निष्कासन, हत्या और दूसरे अंतरराष्ट्रीय नियमों की अनदेखी के लिए जवाबदेह बनाया जाए।

(4) अल-अक्सा मस्जिद में नमाज़ियों के बिना रोक-टोक आने जाने को सुनिश्चित किया जाए और उस पर से इजराइली क़ब्ज़ा जल्द से जल्द समाप्त हो।

(5) एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना को यक़ीनी बनाया जाए और इज़राइल को संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का पालन करने और क़ब्ज़े वाले अरब क्षेत्रों को ख़ाली करने के लिए बाध्य किया जाए।

(6) भारत ने हमेशा और हर मंच पर फिलिस्तीनियों के संघर्ष और एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की बनाए जाने का समर्थन किया है। हमारे देश की एक महान परंपरा यह रही है कि उसने जबरी कब्ज़े करने और उपनिवेश बनाने वाली शक्तियों का विरोध किया है। हम उम्मीद करते हैं कि मौजूदा भारत सरकार इस परंपरा को जारी रखेगी।

(7) जमीअत उलेमा-ए-हिंद की यह बैठक फ़िलीस्तीन के अलावा इस्लामी दुनिया के अन्य देशों विशेष रूप से सीरिया और यमन की स्थिति पर दुख और चिंता ज़़ाहिर करती है, और मुस्लिम देशों के शासकों से यह अपील करती है कि पूरी संवेदनशीलता और दर्दमन्दी के साथ परिस्थितियों को महसूस करें और अपनी जिम्मेदारियों को सही तौर से अदा करें।

पर्यावरण संरक्षण से संबंधित प्रस्ताव

हमारे जीवन में सफ़ाई सुथराई का बड़ा महत्व है, जिसके बिना किसी सभ्य समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती। दुनिया के सभी धर्मों और प्राचीन सभ्यताओं ने सफ़ाई पर ख़ास ध्यान दिया है। इस्लाम में पाकी व सफ़ाई को आधे ईमान का दर्जा हासिल है। ज़मीन के कुदरती वातावरण में बराबर गिरावट, मौसमों में बदलाव और असंतुलित तरक़्क़ी की वजह से मौजूदा और आगे आने वाली नस्लों के मानव अधिकारों यहां तक कि जीने का अधिकार भी भारी दबाव और ख़तरे में हैं। इस परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए जमीअत उलेमा ए हिंद जागरूक नागरिकों को आकृष्ट करती है कि वो,

(1) खुद की सफाई, अपने घर और घर के बाहर वाले हिस्से की सफाई, अपनी व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन का अंग बनाएं।

(2) मस्जिद के इमाम, वक्ता और प्रतिष्ठित लोगों की नैतिक जिम्मेदारी है कि वो इस पैग़ाम को आम करें कि, गंदगी सिर्फ गंदगी नहीं हजारों बीमारियों की जड़ है।

(3) वायु प्रदूषण से बचने के लिए ऑक्सीजन पार्क और बड़ी संख्या में वृक्ष रोपण समय की मांग है। इसी तरह पानी भी प्रकृति की अमूल्य धरोहर है जिस से सभी का जीवन जुड़ा हुआ है। हमें ये सोचने की ज़रूरत है कि हम पानी को किस तरह से बचाएं। खास तौर पर धार्मिक संगठन स्वयं को मिसाल के तौर पर पेश करें। मस्जिदों और इबादत गाहों में ऐसा सिस्टम अपनाया जाना चाहिए कि बिला वजह पानी का इस्तेमाल न हो।

श्रद्धांजलि प्रस्ताव

जमीअत उलेमा ए हिन्द की प्रबंधन समिति का यह सम्मेलन देश और विदेश में प्रमुख इस्लामी विद्वानों की मृत्यु पर शोक प्रकट करता है और उनकी मगफिरत की दुआ करता है। हाल ही में हमने जिनको खोया है उनमें, जमीअत उलेमा ए हिंद के अध्यक्ष हज़रत मौलाना सय्यद मुहम्मद उस्मान साहब मंसूरपूरी, जमीअत के दो उपाध्यक्ष हज़रत मौलाना मुफ्ती खैरुल इस्लाम और हज़रत मौलाना अमानुल्लाह कासमी, हज़रत मौलाना मुफ्ती सईद अहमद पालनपुरी शैखुल हदीस और प्रधानाध्यापक दारुल उलूम देवबंद, मौलाना अब्दुल खालिक संभली उप प्रबंधक दारुल उलूम देवबंद, मौलाना सैयद मोहम्मद वली रहमानी जनरल सेक्रेटरी आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, डा अबू सलमान शाहजहांपुरी, मौलाना अनवर आलम खलीक अमीनी, शिक्षक दारुल उलूम देवबंद, मौलाना जाबिर कासमी अध्यक्ष जमीअत उलेमा ए हिंद उड़ीसा, मौलाना अब्दुल अहद क़ासमी अध्यक्ष जमीअत उलेमा सहरसा बिहार, मौलाना इलियास साहब बाराबंकवी शैखूल हदीस जामिया कशिफुल उलूम, मरकज निजामुद्दीन, मौलाना निजामुद्दीन, सदस्य शूरा, दारुल उलूम देवबंद, मौलाना रफीक अहमद कासमी जमाअत ए इस्लामी हिंद, अहमद पटेल, मौलाना कल्बे सादिक, वालिदा मोहतरमा मौलाना अंजर शाह मसऊदी साहब, मौलाना निसार अहमद कासमी, शिक्षक दारुल उलूम इस्लामिया बस्ती, मौलाना अबू बक्र कासमी, नाजिम ए आला जमीअत उलेमा झारखंड, महमूदुल जफर रहमानी रामपुर, मौलाना शब्द अहमद कासमी, उपाध्यक्ष जमीअत उलेमा राजस्थान, वालिदा मुफ्ती जकावत हुसैन साहब।

Bishwa Maurya

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