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आस्था के कुंभ में विश्व कल्याण के लिए हो रही लक्षचण्डी महायज्ञ

दिव्य कुंभ भव्य कुंभ की शोभा बढ़ा रहा यह महायज्ञ त्रिवेणी क्षेत्र को ऋषियों एवं मुनियों के तपोभूमि की जीवंत कल्पना सा प्रतीत हो रहा है। एक तरफ जहां आस्था के संगम में लोग पुण्य की डुबकी लगा रहे हैं तो वहीं वैदिक मंत्र अन्त:करण को शुद्ध कर रहे हैं। जिससे लोगों में ऊर्जा का दोहरा संचार हो रहा है।

Shivakant Shukla

Shivakant ShuklaBy Shivakant Shukla

Published on 23 Jan 2019 6:37 AM GMT

आस्था के कुंभ में विश्व कल्याण के लिए हो रही लक्षचण्डी महायज्ञ
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आशीष पाण्डेय

कुंभ नगर: आस्था एवं श्रद्धा से जुड़े कुंभ के अनेक रूप देखने को मिल रहे हैं। इसी कड़ी में जब बुधवार को मेले की भव्यता एवं दिव्यता देखने को गाड़ी उठाई तो सीधे अरैल क्षेत्र के लिए रवाना हो गए। गाड़ी अरैल क्षेत्र में पहुंची ही थी कि दूर से ही वैदिक मंत्रों की गूंज सुनाई पड़ने लगी। मन को शुकून मिला तो फिर उसी हवन यज्ञ स्थल को देखने की जिज्ञासा में आगे चल पड़ा।

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जैसे ही त्रिवेणी तट के के समीप पहुंचा वहां सच्चा बाबा आश्रम का विशालकाय वैदिक आध्यात्मिक पण्डाल दिखा। जहां के गुरू स्वामी गोपाल जी महराज की देख रेख में एक हजार मूर्धन्य विद्वानो द्वारा संस्कृत में एक लाख दुर्गा शप्तशती पाठ एवं हवन यज्ञ का आयोजन चल रहा था। अन्दर पहुंचा तो वहां सैकड़ों की संख्या में बैठे विद्वानों के वैदिक मंत्रों को सुन आध्यात्म में रम गया और उस विशालकाय हवन वेदी के लिए के लिए बने पण्डाल में प्रवेश कर गया।

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मैं विशाल हवन वेदी के पास पहुंचा ही था कि माइक संभाने एक विद्वान ने सहसा टनक आवाज में कहा, रूकिए आप अंदर नहीं जा सकते। बाहर जाइए। इतना सुनते ही मन दुखी सा हो गया लेकिन तभी उक्त विद्वान ने बताया कि यह विशाल यज्ञ भारत को विश्व में एक समृद्ध शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित करने एवं देश में एकता व अखण्डता के साथ भाईचारे के लिए किया जा रहा है। जिससे भारत की वैदिक परंपरा से वसुधैव कुटुंबकम की कल्पना को सत्यापित किया जा सके। यह सुन आध्यात्मिक क्षेत्र में मन भी शांत हो गया।

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वहीं स्वामी जी ने बताया कि इस यज्ञ शाला में केवल सात्विक रूप में ही प्रवेश हो सकता है। जिसके लिए धोती कुर्ता का महत्व अधिक है। शुद्धता का भी विशेष महत्व होता है अन्यथा यज्ञ खण्डित हो जाता है। तभी यज्ञशाला के बाहर लगा एक बोर्ड देखा जिसमें लिखा था कि आप सभी का व्यवहार, काम, क्रोध, मन लोभ, मात्पर्म का न होकर दया, प्रेम, करूणा , भक्ति, मैत्री तथा शक्ति आदि स्वभाव के अन्तर्गत होना चाहिए। जिसे पढ़कर आध्यात्म की सरलता और उसकी दिव्यता का अनुभव हुआ।

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दिव्य कुंभ भव्य कुंभ की शोभा बढ़ा रहा यह महायज्ञ त्रिवेणी क्षेत्र को ऋषियों एवं मुनियों के तपोभूमि की जीवंत कल्पना सा प्रतीत हो रहा है। एक तरफ जहां आस्था के संगम में लोग पुण्य की डुबकी लगा रहे हैं तो वहीं वैदिक मंत्र अन्त:करण को शुद्ध कर रहे हैं। जिससे लोगों में ऊर्जा का दोहरा संचार हो रहा है।

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