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Lucknow Pitbull Case: डॉग लवर सावधान, आइए जाने क्यों जानलेवा बन रहा सोशल स्टेटस सिंबल

Side effects of Pets: हर जगह तरह तरह की बढ़िया विदेशी ब्रीड के कुत्ते लोगों के घरों में मिल जाएंगे। पिटबुल जैसी लड़ाकू नस्ल का शौक चल रहा है।

Yogesh Mishra
Written By Yogesh Mishra
Updated on: 19 July 2022 6:17 AM GMT
pitbull attack
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पिटबुल अटैक 

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Side effects of Pets: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के कैसरबाग इलाक़े में पिटबुल (Lucknow Pitbull Attack Case) प्रजाति के एक पालतू कुत्ते ने घर की मालकिन सुशीला त्रिपाठी को नोच खाया। अस्सी साल की सुशीला का बेटा अमित त्रिपाठी डॉगलवर है। अमित जिम ट्रेनर है। उसने घर में एक पिटबुल व दूसरा लेब्राडोर (labrador) पाल रखा था। इसके बाद तो हंगामा मच गया। कुत्ते को नगर निगम ले गया। इस घटना के बाद जितनी मुँह उतनी बातें निकलने लगीं। कुत्ते को अमित ने क्यों नहीं मार डाला? कुत्ते के प्रति अमित का प्रेम माँ के मरने के बाद भी क्यों बरकरार है? कुत्ते का क्या दोष? ये खास प्रजाति तो चालीस देशों में प्रतिबंधित है? यहाँ पालने कीअनुमति कैसे मिली? अमित को जेल जाना चाहिए? क्या कुत्ते की सजा हो सकेगी? कुत्ते की सजा सेक्या हल निकल पायेगा? अमित गोद लिया बेटा है, इसलिए उसने अपनी माँ को कुत्ते से मरवा डाला? पिटबुल का प्रयोग प्रायः मरने मरवाने के लिए होता है?

गुरुग्राम की मिलेनियम सिटी हो या लखनऊ (Lucknow Dog Attack) के मोहल्ले, हर जगह तरह की बढ़िया विदेशी ब्रीड के कुत्ते लोगों के घरों में मिल जाएंगे। अब तो ऐसे ऐसे कुत्ते अपने शहर में नजर आने लगे हैं, जो कभी विदेशीसिनेमा में दिखाई देते थे। जर्मन शेपर्ड या डॉबरमैन में अब लोगों को वो "क्लास" या शान नजर नहींआती। अब तो ल्हासा अप्सू, अलास्कन हस्की, पिटबुल, चिहुआ हुआ से कम में स्टेटस सिंबल नहीं बनता है। लैब्राडोर और गोल्डन रिट्रीवर (Golden Retriever) अब आम हो चले हैं। अब तो पिटबुल जैसी लड़ाकू नस्ल काशौक चल रहा है। जिन बेजुबानों के बारे में रत्ती भर पता नहीं है, जिनकी सिर्फ फोटो देखी हैं, उनको बस घर में पालना है।

ये न सिर्फ इन जानवरों पर अत्याचार है बल्कि खुद अपने, अपने परिवार और दूसरे लोगों के लिए एकखतरा व जोखिम बनाना है।

पेट डॉग (photo : social media )

कुत्तों की विदेशी नस्लों के प्रति सतही जुनून

दरअसल, शहरी भारतीयों में कुत्तों की विदेशी नस्लों के प्रति एक सतही जुनून सा हो गया है, जो हमारेसमाजशास्त्र के बारे में भी बहुत कुछ कहता है। सिर्फ देखादेखी में बहुत कुछ होता है। मिसाल के तौरपर जब वोडाफोन के विज्ञापनों में "पग" दिखाई देने लगा तब लोगों ने बिना यह जाने कि इस नस्ल कोपालने में क्या दिक्कतें हो सकती हैं, उन्हें खरीदना शुरू कर दिया। समझा जाता है कि आज भी हरसाल 50 हजार पग अवैध तरीके से भारत लाये जाते हैं।

सबसे ट्रेंडिंग नस्लों के मालिक होने की अंधी दौड़ में, लोग कुछ भी कर गुजरते हैं। कुत्तों के फर को शेवकरने से लेकर उन्हें एसी कमरों में कैद करके रखने तक।आजकल हस्की पालने का काफी फैशन है।ये नस्ल बर्फीले और बेहद ठंडे इलाकों में पाई जाती है। हस्की के फर कुदरती रूप से ऐसे होते हैं किमाइनस 52 डिग्री में भी उनको कुछ नहीं होता है। लेकिन लोग चेन्नई, दिल्ली और लखनऊ के 50 डिग्री के करीब पहुंचते मौसम में उनको पाल रहे रहे हैं, अपनी कारों में घुमा रहे हैं।

दिल्ली, नोएडा, मुंबई आदि शहरों में पालतू कुत्तों को सड़क पर परित्यक्त छोड़ देने की भी बहुतघटनाएं होती हैं। ऐसा करने वाले वे लोग होते हैं विदेशी नस्ल के कुत्ता पाल तो लेते हैं, लेकिन जबउसकी ढंग से देखभाल नहीं कर पाते तो उसको सड़क पर छोड़ देते हैं।

पेट डॉग (photo: social media )

पालतू जानवर रखने का क्रेज़ बढ़ रहा

दरअसल, भारत में पालतू जानवर रखने का क्रेज़ या ट्रेंड बहुत तेजी से बढ़ रहा है और इसके भविष्य मेंभी तेजी से बढ़ने की संभावना है। पिछले एक दशक में, कई लोगों ने अपनी डिस्पोजेबल आय में वृद्धिऔर शहरों के त्वरित विकास और विस्तार को देखा है। इन्हीं वजहों से लोगों का पालतू जानवरों केबारे में दृष्टिकोण बदला है। अब लोग पालतू जानवरों को परिवार के सदस्य के रूप में स्थान देते हैं।कई लोग ग्रहों के शमन के लिए भी कुत्ता पालते हैं। लाल किताब में बताया गया है कि संतान सुख मेंबाधा आने पर काला या काला सफ़ेद कुत्ता पालना चाहिए । कुत्ते को सनातन धर्म में यम का दूत कहागया है। कहा जाता है कुत्ते को भोजन देने से भैरव महाराज प्रसन्न होते है। काले कुत्ते को रोटीखिलाना, काला कुत्ता पालने से शनि व केतु का प्रभाव कम होता है। हालाँकि कुत्ते के रोने व भौंकने कोअपशकुन माना जाता है। आरंभ में मनुष्य ने अपनी सहायता के लिए कुत्ता पालना शुरू किया था।

कुत्ता कई किलोमीटर दूर तक की गंध सूंघ सकता है। 11-1600 साल पहले पश्चिमी यूरोप में भेड़ियोंको पालतू बनाने से शुरू हुआ था। Origins of the dog: domestication and early History में लिखा है कि इज़राइल में खुदाई के दौरान एक बुजुर्ग मानव व एक चार से पाँच महीने के उम्र केपिल्ले के अवशेष एक साथ दफ़्न मिले।

कुत्ते का वैज्ञानिक नाम Canis Lupus familiarise है। कुत्ता भेड़िया कुल की प्रजाति है। कुत्ते काऔसत जीवन बारह साल का ही होता है। सबसे ज़्यादा जीने वाले कुत्ते का नाम मैगी था। जो 29 सालपाँच महीने जिया। कुत्ते का ब्लड ग्रुप तेरह तरह का होता है। कुत्ते लाल व हरा रंग नहीं देख सकते हैं।कुत्ते की सूंघने की शक्ति इंसानों से एक हज़ार गुना ज़्यादा होती है। कुत्ते भी सपने देखते हैं। हर कुत्तोंके नोज़ प्रिंट अलग अलग होते हैं। कुत्ता 45,000 कंपन प्रति सेकेंड वाली आवाज भी सुन सकता है।जबकि मनुष्य केवल बीस हज़ार। कुत्ता दस अलग - अलग आवाज़ों में भौंक सकता है। कुत्ते कातापमान 100 से 120.5 फारेनहाइट के हीत होता है। चाकलेट खाने से कुत्ते की मौत तक हो सकतीहै। अंतरिक्ष में जो पहला जानवर गया था वह कुत्ता ही था। नाम लाइका था जो 3 नवंबर, 57 को भेजागया।

पूर्वोत्तर के ज़्यादातर राज्यों में कुत्ते का मीट खाया जाता है। नागालैंड में सबसे अधिक बिकता है।दीमापुर कुत्ते के मांस का सबसे बड़ा बाज़ार है। लोग हर साल तीस हज़ार कुत्ते चट कर जाते है। चीनके युलिन शहर में डॉग मीट फ़ेस्टिवल होता है। चीन, दक्षिण कोरिया व कई एशियाई देशों में कुत्ते कामांस खाने की परंपरा रही है।

पेट डॉग का क्रेज (फोटो: सोशल मीडिया )

पालतू जानवरों की देखभाल का बाजार

भारत में पालतू जानवरों की देखभाल का बाजार सालाना 13.9 फीसदी की दर से बढ़ रहा है, जिससे यह दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक बन गया है। अनुमान है कि भारत में यह उद्योग2025 तक 80 करोड़ डॉलर तक पहुंच जाएगा।

2023 के अंत तक अनुमानित 3 करोड़ 10 लाख पालतू कुत्तों के साथ भारत में कुत्ते सबसे लोकप्रियपालतू जानवर हो जायेगा। भारत में बिल्लियाँ दूसरे सबसे लोकप्रिय पालतू जानवर हैं। पालतू जानवररखने वालों में से 20 फीसदी के पास बिल्लियां हैं।

2021 में, भारत में 41 फीसदी लोगों के पास पालतू जानवर नहीं था।भारत में हर साल 600,000 पालतू जानवरों को गोद लिया जाता है।भारत में पालतू भोजन का बाजार 310 मिलियन डॉलर सेअधिक का है। भारत में पालतू पशु मालिक अपने पालतू जानवरों पर प्रति माह लगभग 4,000 रुपयेखर्च करते हैं।भारत में पशु चिकित्सा स्वास्थ्य बाजार का मूल्य 169 मिलियन डॉलर है और 2027 तक 186 मिलियन डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है।भारत में पालतू पशु की ग्रूमिंग करने वाले प्रतिमाह 10 से 25 हजार रुपए तक कमाते हैं। इस लिहाज़ से देखें को बाज़ार भले ही बड़ा हो। डॉग लवर्सकी संख्या भले बढ़ रही हो। पर इनकी देखभाल पर लगने वाला टाइम लोगों के पास नहीं है।

इन कारणों के चलते कुत्ते हो जाते हैं आक्रामक

आँकड़े बताते हैं कि शहरों में तक़रीबन पचास फ़ीसदी जनसंख्या फ़्लैटों में रहती है। जहां कई नस्ल के कुत्तों की ज़रूरतें पूरी नहीं हो सकती है। मेटिंग का अवसर भी कुत्तों को नहीं मिलता है। इन सब कारणों के चलते वे आक्रामक हो जाते हैं। ईरान में कुत्ता व बिल्ली पालने पर रोक है। आगे उसे अपराधबनाने पर भी काम हो रहा है। ईरान में कुत्तों के लिए भी जेल है। देखना है कि जिस पिटबुल ने अपनीमालकिन सुशीला त्रिपाठी को नोच खाया, जिसके चलते उनकी मौत हो गयी, उसका क्या होता है?

हां, कुत्ता पालने से पहले ये जरूर समझ लीजिएगा कि वह एक जीता जागता जीव है, कोई प्लास्टिकका खिलौना नहीं है। न वो कोई फोटो है कि घर में सजा लें। पालतू जानवर को इंसान की तरह हीदेखभाल की जरूरत होती है। क्या आप ये कर पाएंगे? या उसको भी अपने घर के बूढ़ों अशक्तों कीतरह नौकरों की जिम्मेदारी के हवाले कर देंगे?

Monika

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