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बिना मर्द के भी जिंदा रहता है औरत का वजूद : बेबी हलदर

raghvendra

raghvendraBy raghvendra

Published on 27 July 2018 8:26 AM GMT

बिना मर्द के भी जिंदा रहता है औरत का वजूद : बेबी हलदर
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चारू खरे

लखनऊ: कहते हैं, परिस्थितियां कभी अनुकूल नहीं होती उन्हें अनुकूल बनाना पड़ता है यानी जरूरी नहीं कि जिंदगी में हमेशा वही हो जो हम चाहते हैं। कभी-कभी वास्तविकता कल्पना से बेहद परे होती है। बावजूद इसके लगातार जिंदगी से जूझते रहना ही ‘संघर्ष’ कहलाता है। जब आपके जीवन में माता-पिता दोनों होते हैं तब आपको अपने भविष्य की परवाह नहीं होती लेकिन वहीं अगर खुद माता-पिता आपका साथ छोड़ दें तो सबसे पहले आपको अपना भविष्य ही अनिश्चित नजर आता है। लेकिन इन सबके बाद भी जो अपने हौसले को गिरने नहीं देते वही जिंदगी की जंग को जीत पाते हैं।

ऐसी ही एक महिला हैं बेबी हलदर जिन्हें संघर्ष की मिसाल कहा जा सकता है। एक गरीब परिवार में जन्मीं बेबी पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर की रहने वाली हैं। उनकी जिंदगी किसी भयावह फिल्मों की कहानियों से कम नहीं है। ‘अपना भारत’ से हुई बातचीत में उन्होंने बताया कि जब वह 4 साल की हुईं तो उनकी अपनी मां ने उनका साथ छोड़ दिया। 12 वर्ष की उम्र में बेबी का ब्याह करा दिया गया। इंतेहा ये कि शादी की रात ही पति ने उनका रेप किया। उनके 25 वर्ष सिर्फ पति की गालियां सुनकर बीते। दो बच्चों की मां बनने के बाद तंग आकर उन्होंने घर छोडऩे का फैसला किया और ट्रेन में टॉयलेट के पास बैठकर दिल्ली आ गईं। दिल्ली में उन्होंने प्रबोध कुमार (रिटायर्ड प्रोफेसर और महान लेखक प्रेमचंद के पोते) से मदद मांगी। उनके घर काम करते हुए उनकी जिंदगी ने मानो जैसे यू-टर्न ले लिया।

रो पड़े थे प्रबोध

बेबी ने अपनी जो कहानी लिखी, उसे पढ़ कर प्रबोध रो पड़े थे। उन्होंने इसका हिंदी में अनुवाद किया। इसके बाद किताब का प्रकाशन हुआ।

2002 में उनकी पहली किताब ‘आलो आंधारी’ नाम से आई। बाद में ये अंग्रेजी में प्रकाशित हुई। आज बेबी हलदर साहित्य की दुनिया का जाना-माना चेहरा हैं। वो कई देशों में भ्रमण कर चुकी हैं। उनकी किताबों का 24 भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है। वह दुनिया के कई हिस्सों में लिट्रेचर फेस्टिवल भी अटेंड कर चुकी हैं।

नहीं छोड़ी बाई की नौकरी

बेबी के बारे में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि एक मशहूर लेखिका हो जाने के बावजूद वो अब तक बाई का काम करती हैं। वह कहती हैं कि जिन्होंने मुझे काम दिया और लिखने के लिए मेरा हौसला बढ़ाया मैं उन्हें छोडक़र नहीं जाउंगी। बेबी कहती हैं ‘एक अकेली औरत’ भी उतनी ही सक्षम, मजबूत और धैर्यवान होती है जितनी की ‘पति’ के साथ, ऐसा सोचना कि, बिना मर्द के औरत का जीवन अस्तित्व विहीन है यह किसी मनुष्य की छोटी मानसिकता को दर्शाता है। बेबी कहती हैं कि महिलाएं आत्मनिर्भर बनें और अगर वह भी किसी हिंसा की शिकार हुई हैं तो इसके खिलाफ आवाज जरूर उठाएं। कभी हताश नहीं हों बल्कि एक नई उर्जा के साथ जिंदगी में आगे बढ़ें।

किताबों को हमेशा निहारती रहती थीं हलदर

बेबी हलदर बताती हैं, कि प्रबोध के घर साफ-सफाई करते-करते वह अक्सर बुक शेल्फ को निहारती रहती थीं। कभी-कभार तो वह बंगाली किताबों को उठाकर पढ़ती भी थीं। एक दिन प्रबोध ने बेबी को बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन की किताब देकर पढऩे को कहा। पूरी किताब पढऩे के बाद प्रबोध ने उनको खाली नोटबुक दी और अपनी कहानी लिखने को कहा।

पहले बेबी घबरा गईं थीं क्योंकि उन्होंने सिर्फ 7वीं क्लास तक ही पढ़ाई की थी, लेकिन जैसे ही वो लिखने बैठीं तो उनमें अलग ही उत्साह जाग उठा। वो बताती हैं, ‘जब मैंने हाथ में कलम थामा तो घबरा गई थी। मैंने तो स्कूली दिनों के बाद कभी पेन नहीं थामा था लेकिन जैसे ही मैंने लिखना शुरू किया तो मुझे वाकई अच्छा लगा। किताब लिखना मेरा सबसे अच्छा एक्सपीरियंस रहा।’

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राघवेंद्र प्रसाद मिश्र जो पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के बाद एक छोटे से संस्थान से अपने कॅरियर की शुरुआत की और बाद में रायपुर से प्रकाशित दैनिक हरिभूमि व भाष्कर जैसे अखबारों में काम करने का मौका मिला। राघवेंद्र को रिपोर्टिंग व एडिटिंग का 10 साल का अनुभव है। इस दौरान इनकी कई स्टोरी व लेख छोटे बड़े अखबार व पोर्टलों में छपी, जिसकी काफी चर्चा भी हुई।

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