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#MeToo: जब चीज़ें सत्यापित हों, तभी कुछ कहना चाहिए- सरोजनी अग्रवाल

Manali Rastogi

Manali RastogiBy Manali Rastogi

Published on 11 Oct 2018 7:38 AM GMT

#MeToo: जब चीज़ें सत्यापित हों, तभी कुछ कहना चाहिए- सरोजनी अग्रवाल
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मेरठ: सोशल मीडिया पर अपने उत्पीड़न के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने का औरतों का ज़रूरी अभियान #MeToo इस वक़्त अपने चरम पर है। अब तक इस अभियान की चपेट में फ़िल्म, मीडिया इंडस्ट्री और राजनीति से जुड़े कई लोग आ चुके हैं।

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न्यूज ट्रैक से बातचीत में बीजेपी की वरिष्ठ नेत्री एवं एमएलसी डॉ.सरोजनी अग्रवाल का इस मामले में नजरिया साफ है। उनका कहना है कि पुरुष-प्रधान देश में औरतों का उत्पीड़न कई सालों से जारी है। घर-बाहर हर जगह औरते शोषण का शिकार हो रही है और होती रही हैं।

अलबत्ता,सरोजनी अग्रवाल का यह भी कहना है कि ''हर मामले को सच मान लेना भी ग़लत है। क्योकि ऐसे तो बस एक ट्वीट कर किसी पर कुछ भी आरोप लगा सकते हैं। इसलिए यहां मामलों की जांच के बाद ही किसी को दोषी माना जा सकता है इससे पहले नही। यानी,जब चीज़ें सत्यापित हों, तभी कुछ कहना चाहिए.''

इस सवाल पर की ''#MeToo ज़रूरी अभियान है, लेकिन किसी व्यक्ति पर 10 साल बाद यौन शोषण का आरोप लगाने का क्या मतलब है? इतने सालों बाद ऐसे मामले की सत्यता की जाँच कैसे हो सकेगी? सरोजनी अग्रवाल कहती है,मानसिक उत्पीड़न के मामले में तो यह गलत है। लेकिन यौन शोषण मामले में इसको गलत नही माना सकता है क्योंकि हो सकता है कि उस समय पीड़िता डरी हुई हो अथवा अन्य किसी तरह के दबाव के कारण अपनी आवाज बुलन्द नही कर सकी हो।

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