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आधुनिक दौर में वेब दुनिया के माध्यम से वेदों की ओर बढ़ो: चिदानन्द

स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि योग किसी धर्म का नहीं बल्कि सभी के लिये है। सभी दीवारों को तोड़ने वाला और दरारों को भरने वाला है। योग सबके लिये है।

Shivakant Shukla

Shivakant ShuklaBy Shivakant Shukla

Published on 7 Feb 2019 1:06 PM GMT

आधुनिक दौर में वेब दुनिया के माध्यम से वेदों की ओर बढ़ो: चिदानन्द
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आशीष पाण्डेय,

कुंभ नगर: परमार्थ निकेतन शिविर प्रांगण में शिक्षा के भारतीयकरण पर एक संवाद का आयोजन किया गया। इस एक दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन माता ललिता देवी सेवाश्रम और परमार्थ निकेतन के संयुक्त तत्वाधान किया गया। जिसमें वैदिक शिक्षा और आधुनिक शिक्षा के विषय में संवादवार्ता हुयी।

इस कार्यक्रम का शुभारम्भ परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द, महामण्डलेश्वर स्वामी शरणानन्द , स्वामी यतीन्द्रानन्द सरस्वती , डा साध्वी भगवती सरस्वती, अनुराग शास्त्री, कन्हैया, साध्वी दीपा भारती , दिल्ली से आये विधायक कपिल मिश्रा, चासंलर व्यासा योग विश्वविद्यालय बैंगलोर प्रो सुब्रह्मण्यम, प्रोफेसर डी.पी. मिश्रा, डिपार्टमेंट आफ एयरोस्पेस इंजीनियरिंग, आई आई टी कानपुर, प्रो.के.एन.भट्ट, माननीय न्यायमूर्ति सुरोही, माननीय जस्टिस शम्भूनाथ श्रीवास्तव , भक्ति फेस्ट से श्रीधर और अन्य विशिष्ट अतिथियों ने दीप प्रज्जवलित कर किया।

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परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि वैदिक कालीन शिक्षा, गुरूकुल शिक्षा प्रणाली हुआ करती थी। इसमें दो तरह की शिक्षा प्रणाली परा और अपरा है। परा के अन्तर्गत भौतिक जीवन पद्धति और भावी जीवन से सम्बंधित शिक्षा दी जाती थी तथा अपरा के अन्तर्गत वेद, पुराण, शास्त्रों की शिक्षा दी जाती है। वैदिक शिक्षा, सांस्कृतिक दृष्टिकोण के साथ व्यक्तिगत विकास और चरित्र निर्माण का प्रशिक्षण भी प्रदान करती है।

आधुनिक शिक्षा ने हमें गूगल के माध्यम से सारी दुनिया का ज्ञान करा दिया, पर कहीं न कहीं हम अपने संस्कारों से, संस्कृति से, प्रकृति से और अपनी जड़ों से दूर होते चले गये। हमारे पास नॉलेज तो बहुत है परन्तु हम जीना भूल गये। विचारवान तो हुये परन्तु ज्ञान को कहीं पीछे छोड़ दिया। वेदों से, वेब की ओर तीव्रता से हमने कदम बढ़ाये जिसके परिणामस्वरूप वैज्ञानिक विकास तो किया पर कहीं न कहीं प्रकृति का विध्वंस भी किया। जिसका परिणाम आज हमारे पास न पीने के लिये स्वच्छ जल बचा, न ही स्वच्छ हवा है। अब समय वेदों की ओर लौटने का है। वेब दुनिया से वेदों की ओर बढ़ने का है। आईये वेदों की ओर चले। वेदों के मंत्र किसी पेपर की हैंडलाइन नहीं बल्कि हार्टलाइन को बनाते है। हम अपनी संस्कृति को जाने, जुड़े और जोड़ें। हमारी तो संस्कृति ही वसुधैव कुटुम्बकम् की है। बांटना, प्रसाद पैदा करता है और बटोरना, विशाद पैदा करता है।

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'सर्वे भवन्तु सुखिनः' ही हमारी वैदिक संस्कृति: स्वामी यतीन्द्रानन्द

स्वामी यतीन्द्रानन्द सरस्वती ने कहा कि सर्वे भवन्तु सुखिनः ही हमारी वैदिक संस्कृति है। आज की आधुनिक शिक्षा से संस्कार और संस्कृति निकल गयी है। हमें उसका समावेश करना होगा। सम्पूर्ण मानवता के लिये वैदिक शिक्षा अत्यंत आवश्यक है।

वेदों का संरक्षण और संवर्धन करना है तो संस्कृत भाषा को बचाना है: अनुराग शास्त्री

अनुराग शास्त्री ने कहा कि यदि वेदों का संरक्षण और संवर्द्धन करना है तो हमें संस्कृत भाषा को बचाना होगा। हमें किसी भी भाषा की निंदा नहीं करनी चाहिये। हमें वेदों को जनमानस तक पहुंचाना होगा। हमें अपना ध्यान समस्या पर नहीं बल्कि समाधान पर लगाना चाहिये। हमें संस्कार से युक्त शिक्षा को अपनाना होगा।

परमार्थ निकेतन शिविर में ज्ञान, भक्ति और कर्म का संगम है: चांसलर

चासंलर व्यासा योग विश्वविद्यालय बैंगलोर प्रो. सुब्रह्मण्यम जी ने कहा कि भारत भूमि योग की भूमि है। ज्ञान, भक्ति और कर्म का संगम ही योग है। यहां संगम के तट पर जिसप्रकार गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम हो रहा है। उसी प्रकार परमार्थ निकेतन शिविर में ज्ञान, भक्ति और कर्म का संगम देखा जा सकता है।

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प्रोफेसर डी.पी. मिश्रा, डिपार्टमेंट आफ एयरोस्पेस इंजीनियरिंग, आई आई टी कानपुर, ने अपने विचार व्यक्त करते हुये कहा, आज की शिक्षा लोगों को केवल सर्टिफिकेट दिलाती है। हमने अपने शिक्षा को छोड़कर पश्चिम की शिक्षा को अपना लिया है। वैदिक शिक्षा वेदों से प्राप्त होती थी। वेद का अर्थ ज्ञान है अर्थात भारत ज्ञान का दाता है।

साध्वी भगवती सरस्वती जी ने कहा कि मैने अमेरिका में सबसे अच्छे विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की परन्तु मैने भारत आकर यहां के संस्कारों और संस्कृति को जानने के बाद मुझे पता चला की वास्तविक शिक्षा क्या है। उन्होने शिक्षा के साथ संस्कारों की बात कहीं और कहा कि हमारे वेदों में सभी समस्याओं का समाधान है। वैदिक शिक्षा बच्चों को पुस्तकों से नहीं जोड़ती बल्कि स्वयं से जोड़ती है।

न्यायमूर्ति सुरोही, ने कहा मातायें अपने बच्चों को संस्कार अवश्य प्रदान करे। राष्ट्र का चरित्र, समाज के चरित्र और उस राष्ट्र में रहने वाले व्यक्तियों के चरित्र पर निर्भर करता है। हमें राष्ट्र चरित्र को जीवित करने की आवश्यकता है। स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने इस कार्यक्रम में उपस्थित सभी को प्रकृतिमय जीवन पद्धति अपनाने का संकल्प कराया। उन्होंने रविशंकर तिवारी , सभी प्रोफेसर और पत्रकारों को धन्यवाद देते हुये सभी का अभिनन्दन किया।

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साध्वी दीपा भारती ने कहा कि आधुनिक शिक्षा में नैतिकता और अध्यात्म के गुणों का समावेश करने पर हम अपने बच्चों में सम्पूर्ण विकास की नींव रख सकते है। सम्पूर्ण विश्व को वैदिक शिक्षा से जोड़ने से सुन्दर और शान्त विश्व का निर्माण कर सकते है। भारत की संस्कृति खण्डन करना नहीं बल्कि मण्डन करना बताती है। वेद स्वयं को जानने का मार्ग बताते है।

परमार्थ निकेतन शिविर, अरैल क्षेत्र सेक्टर 18 प्रयागराज में पर्यावरण को समर्पित श्रीमद्भागवत कथा चल रही है। कथा के तीसरे दिन संगम के तट पर भागवतकिंकर कथा व्यास अनुराग कृष्ण शास्त्री ने भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक जीवनचर्या और उपनिषदों के मर्म के विषय में अवगत कराया।

योग किसी धर्म का नहीं बल्कि सभी का है: चिदानन्द

परमार्थ निकेतन शिविर, अरैल क्षेत्र सेक्टर 18 प्रयागराज एक सप्ताह से चल रहे योग कुम्भ का समापन हुआ। योग शिविर के प्रथम चार दिनों तक योगगुरू स्वामी रामदेव, आध्यात्मिक गुरू रविशंकर, परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती का पावन सान्निध्य प्राप्त होता रहा।

आज प्रातःकाल 7:00 से 9:00 बजे तक मोरार जी देसाई संस्थान द्वारा योगाभ्यास, आसन, प्राणायाम, ध्यान कराया गया। प्रो. सुब्रमण्यम ने योग के मर्म के विषय में जानकारी प्रदान की। अरविन्द आश्रम से आये जोशी ने योग साधना पर अपना व्याख्यान दिया। दोपहर के सत्र में देश के विभिन्न प्रतिष्ठित योग संस्थानों से आये सभी योगाचार्यो को स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने सम्मानित किया।

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योगाचार्यो ने कहा कि वास्तव में कुम्भ की धरती प्रयाग में आकर हमने न केवल योग का अभ्यास कराया बल्कि विश्व विख्यात गुरूओं के पावन सान्निध्य में योग कर हमें अत्यंत शान्ति और आनन्द की अनुभूति प्राप्त हुयी। सभी योगाचार्यो ने प्रसनन्ता से परमार्थ निकेतन शिविर से विदा ली।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि योग किसी धर्म का नहीं बल्कि सभी के लिये है। सभी दीवारों को तोड़ने वाला और दरारों को भरने वाला है। योग सबके लिये है। भारतीय योग संस्थान के रवि शंकर तिवारी ने सभी का अभिनन्दन किया। योग कुम्भ के समापन अवसर पर मनमोहक योग सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

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