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Khatauli Result: पुराने पैटर्न पर लौट रहा मुज़फ्फरनगर! क्या मुस्लिम-जाट-गुर्जर गठजोड़ ने बिगाड़ा बीजेपी का खेल?

Khatauli By Election 2022 में सपा-रालोद गठबंधन की जीत ने ये साबित कर दिया है कि, वेस्ट यूपी की राजनीति एक बार फिर करवट ले रही है। बीजेपी के लिए ये खतरे की घंटी है।

aman
Written By aman
Published on: 9 Dec 2022 9:38 AM GMT
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प्रतीकात्मक चित्र (Social Media)

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Khatauli By Election: उत्तर प्रदेश की खतौली विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में समाजवादी पार्टी-राष्ट्रीय लोकदल गठबंधन ने सफलता पाई। RLD प्रत्याशी मदन भैया (Madan Bhaiya) ने अपनी निकटतम प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनता पार्टी (BJP) की राजकुमारी सैनी (Rajkumari Saini) को 22 हजार से भी अधिक मतों से हराया। इस हार ने जहां बीजेपी को निराश किया, वहीं उससे ये सीट छीन भी ली। मदन भैया की जीत में एक बार फिर जाट-मुस्लिम गठजोड़ सफलता का प्रमुख सूत्र रही।

आपको बता दें, मुजफ्फरनगर जिले का इतिहास रहा है, यहां जब भी मुस्लिम-जाट गठजोड़ साथ आता है जीत तय मानी जाती है। इस बार भी ऐसा ही कुछ हुआ। मुजफ्फरनगर में इतिहास दोहराता नजर आ रहा है। रालोद प्रत्याशी मदन भैया यहां अपने नजदीकी प्रतिद्वंद्वी से 22 हजार मतों से विजयी रहे। विधानसभा चुनाव में ये आंकड़े कम नहीं है। ये बताते हैं कि, जिले में राजनीतिक समीकरण एक बार फिर बदल रहा है। अगर, ऐसा है तो ये बीजेपी के लिए खतरे की घंटी है। बीजेपी के मिशन 2024 में ये राह का रोड़ा बन सकती है।

क्या पुराने पैटर्न पर लौट रहा मुजफ्फरनगर?

खतौली विधानसभा उपचुनाव में रालोद प्रत्याशी मदन भैया को कुल97139 वोट मिले थे। वहीं भारतीय जनता पार्टी की राजकुमारी सैनी को74996 मत हासिल हुए थे। बीजेपी प्रत्याशी को 22143 मतों से हार का मुंह देखना पड़ा। रालोद कैंडिडेट ने बीजेपी से यह सीट छीन ली। इस जीत में एक बार फिर जाट और मुस्लिम गठजोड़ देखने को मिल रहा है। मदन भैया की जीत ने राजनीतिक विश्लेषकों के सिर पर बल डाल दिया है। वो सोचने को मजबूर हो गये हैं कि, क्या मुजफ्फरनगर अपने पुराने पैटर्न पर लौट रही है?

मुस्लिम-जाट गठजोड़ ने बदले थे समीकरण?

मुजफ्फरनगर जिले के इतिहास पर नजर डालें तो यहां जब भी मुस्लिम-जाट गठजोड़ हुआ है, जीत पक्की रही। ये पैटर्न लंबे समय से चलता आ रहा था। साल 2013 में यहां की राजनीति ने नई करवट ली। ये वही साल था जब मुज़फ्फरनगर में साम्प्रदायिक दंगे हुए। दंगों में दोनों सम्प्रदायों के बीच दूरियां बढ़ी। इन दूरियों ने यहां के राजनीतिक समीकरण को पलट दिया। इस बदलाव का परिणाम ये रहा कि जिले की सभी 6 विधानसभा सीटों पर बीजेपी ने कब्जा कर लिया। इस जिले की सभी सभी सीटों पर भगवा लहराया। समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस का यहां से पत्ता साफ हो गया।

RLD की मेहनत रंग लाई, कामयाब रहा फॉर्मूला

इस बिखराव का सबसे ज्यादा नुकसान रालोद को हुआ था। RLD प्रमुख चौधरी अजित सिंह इस बात को पूरी तरह समझ चुके थे। उन्होंने दोनों संप्रदायों के बीच की दूरियों को कम करने के बहुत प्रयास किए। मगर, आशा के अनुरूप सफलता नहीं मिली। रालोद का वो प्रयास अब सफल होता दिख रहा है। इस बार यूपी विधानसभा चुनाव में जिले की कुल 6 सीटों में से 4 पर रालोद का कब्ज़ा रहा। जबकि, जिले की शहर और खतौली विधानसभा सीट ही बीजेपी के पाले में जा पायी। इस बार, मदन भैया की जीत ने खतौली विधानसभा सीट भी रालोद की झोली में डाल दी। बीजेपी का समीकरण अब बिखरता नजर आ रहा है।

क्या है खतौली में वोटों का गणित?

खतौली विधानसभा सीट (Khatauli By Election 2022) पर करीब 3 लाख 12 हजार मतदाता हैं। इस सीट पर सबसे अधिक संख्या मुस्लिम वोटर्स की है। आंकड़ों की मानें तो यहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या करीब 90 हजार है। जबकि, दूसरे स्थान पर दलित वोटर्स हैं। यहां करीब 50 हजार दलित मतदाता हैं। इसके बाद सैनी और फिर गुर्जर मतदाताओं की बारी आती है। सैनी वोटर्स की संख्या तक़रीबन 35 हजार के आसपास है। जबकि, करीब 30 हजार गुर्जर मतदाता, 25 हजार जाट मतदाता और 12 हजार के करीब ब्राह्मण वोटर हैं। बीजेपी का उम्मीदवार जहां सैनी समाज से आता है वहीं सपा का कैंडिडेट गुर्जर समुदाय से है।

उपचुनाव में दिखा जातियों का वर्चस्व

यूपी विधानसभा चुनाव 2022 में खतौली में समीकरण तेजी से बदलते रहे। हालिया विधानसभा उपचुनाव में जातीय समीकरण हावी रहे। मदन भैया गुर्जर जाति से आते हैं। उनकी छवि जाने-माने गुर्जर नेता की रही है। मदन भैया हर वर्ष 22 मार्च को 'इंटरनेशनल गुर्जर दिवस' के रूप में मानते हैं। उनकी इस जीत में गुर्जर गांव का बड़ा रोल रहा है। आपको बता दें, मदन भैया मुजफ्फरनगर के पड़ोसी जिले गाजियाबाद के निवासी हैं। खतौली के लिए वो नए नेता हैं। बावजूद उनकी जीत ने जातियों का वर्चस्व दिखाया। गठबंधन द्वारा उपचुनाव में गुर्जर प्रत्याशी को मैदान में उतारना सफल रहा। नतीजा, अधिकांश गुर्जर मतदाता गठबंधन के खेमे में वोट डाले। दूसरी ओर रालोद प्रत्याशी होने के कारण जयंत चौधरी ने इस चुनाव में पूरी ताकत झों दी। सपा का साथ मुस्लिमों को पास लाने में कामयाब रहा।

त्यागी की नाराजगी भी पड़ी भारी

जयंत चौधरी के लिए जाट बिरादरी को साधना बड़ी चुनौती थी। जिले में बीजेपी के संजीव बालियान जाटों के बड़े नेता के रूप में उभरे हैं। उनकी मजबूत पकड़ के बावजूद जाट वोट बैंक बीजेपी से खिसका और रालोद गठबंधन के साथ हो गया। ये अलग बात है कि, जाट वोट का बीजेपी से खिसकना बड़े सवाल खड़े करता है। कहा जा रहा, चुनाव से ठीक पहले हुई पंचायत ने जाट मतों का ज्यादा प्रतिशत गठबंधन प्रत्याशी के पाले में कर गया। इस सब के बीच त्यागी समाज की नाराजगी का नुकसान भी बीजेपी प्रत्याशी को इस उपचुनाव में उठाना पड़ा।

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